फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Himalaya Day is on 9th September Uttarakhand understands utility and importance of Himalayas very well

हिमालय दिवस: हिमालयी राज्यों के दिल की धड़कन...आज हिमालय के साथ दृढ़ता से खड़े होने का दिन, पढ़ें ये खास लेख

Mon, 09 Sep 2024 07:58 AM IST
रेनू सकलानी अनूप वाजपेयी
अनूप वाजपेयी Published by: रेनू सकलानी Updated Mon, 09 Sep 2024 07:58 AM IST
सार

हिमालय दिवस देश-दुनिया की जुबान पर कुछ वर्षों से ही चढ़ा है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर बीते पांच-छह वर्षों से हिमालय के सरोकार पर चर्चा और बचाने का संकल्प मजबूत हुआ है।

विज्ञापन
Himalaya Day is on 9th September Uttarakhand understands utility and importance of Himalayas very well
हिमालय - फोटो : amar ujala

विस्तार

हिमालय की उपयोगिता और महत्व को उत्तराखंड बखूबी समझता है। पहाड़ के लोग हमेशा से हिमालय की दृढ़ता कैसे कायम रहे इसे लेकर दृढ़ रहे हैं। उन्हें जन्म से पर्यावरण के साथ संतुलन साधने का अभ्यास जो है। नदियों की अविरलता और निर्मलता का अहसास है। उनके लिए निर्जन हिमालय तप का साधन है।

विज्ञापन


जंगल और पहाड़ उसके देवता हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड के लिए हिमालय के मायने दुनिया से अलग हैं। हिमालय भले ही दुनिया के लिए जल मीनार, तीसरा ध्रुव और किसी के मस्तक का ताज हो सकता है, लेकिन हिमालयी राज्यों के दिल की धड़कन है।
विज्ञापन


दुनिया के देशों के लिए विश्व पर्यावरण दिवस प्रकृति की छेड़छाड़ से उपजे उन तमाम मानवीय चिंताओं को उठाने का दिवस और माध्यम है, लेकिन हिमालय दिवस हर लिहाज से हिमालयी राज्यों के ज्यादा करीब है। हिमालय को लेकर उत्तराखंड की चिंता नई नहीं है। हिमालय सिर्फ सुदूर डटकर खड़े रहकर सभ्यता की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि पहाड़ के जनजीवन, स्वास्थ्य, कृषि से सीधा जुड़ाव है। प्रकृति को बचाए और बनाए रखने के साथ हिमालयी राज्यों को प्रतिकूल मौसम से भी सुरक्षित बनाए है।

विज्ञापन
विज्ञापन

हिमालय के गुणगान का दिन
शायद इसीलिए उत्तराखंड ने एक दिन चुना है हिमालय के गुणगान के लिए। हिमालय दिवस देश-दुनिया की जुबान पर कुछ वर्षों से ही चढ़ा है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर बीते पांच-छह वर्षों से हिमालय के सरोकार पर चर्चा और बचाने का संकल्प मजबूत हुआ है। उत्तराखंड इकलौता राज्य है, जहां से हिमालय दिवस की अवधारणा ने सत्तर के दशक में जोर पकड़ा और लगातार पैरवी में जुटा हुआ है। 1973 में जिस तरह 24 सौ पेड़ बचाने के लिए गौरादेवी आगे आईं और कुछ अन्य महिलाओं के साथ उन्हें कटने से बचा लिया।

वहीं, सुंदर लाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गोविंद सिंह रावत आदि ने उस दौर में हिमालय की रक्षा के लिए प्रयास किए, जब दुनिया आने वाले खतरे से अनभिज्ञ थी। इस दौर में भी हिमालय पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन के अनिल जोशी आदि कई नाम हैं, जो नई पीढ़ी को आने वाले खतरों के प्रति सचेत कर रहे हैं।

अनदेखे खतरों को समझने और समझाने का प्रयास
संस्थाएं हिमालय दिवस के बहाने हर साल मानवता के भविष्य के खतरों, चिंताओं और मुद्दों से दुनिया को रूबरू करा रही हैं। राज्य ने 2014-15 में हिमालय दिवस को अधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी। तब से यहां की सरकारें, सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं हिमालय दिवस में छुपे गूढ़ अर्थ के साथ हिमालय से जुड़े अनदेखे खतरों को समझने और समझाने का प्रयास कर रही हैं।

ये सच है छोटे से प्रयास ने हिमालयी राज्यों को आने वाले खतरों प्रति सचेत और एकजुट कर दिया है, लेकिन अभी तालमेल का अभाव स्पष्ट दिखता है। कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के पास जरूरी आंकड़े और पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। हिमालय के करीब वनस्पति के बदलाव, मौसम के खतरे, आपदा की पूर्व चेतावनी, उपग्रह से तस्वीरें आदि महत्वपूर्ण पहलुओं पर बहुत काम किया जा रहा, लेकिन तालमेल और जानकारियां साझा न होने से प्रयास बिखरे से दिखते हैं।

 

चमकदार ग्लेशियरों का बिखराव

उत्तराखंड में राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं में वाडिया इंस्टीट्यूट, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, आईआईटी रुड़की, इंडियन रिमोट सेंसिंग, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, ज्यूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय वन्य जीव संस्थान, फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद आदि हिमालय को और अधिक करीब से समझने, वहां लगातार हो रहे बदलाव और दुष्प्रभावों पर अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में जलवायु के बदले मिजाज, चमकदार ग्लेशियरों का बिखराव और अन्य खतरों के साथ संस्थाओं की जांच-पड़ताल का दायरा भी बढ़ता जा रहा है।

ये भी पढ़ें...Wolf Attack:  आसान शिकार, आदत और हालात से भेड़िये बन जाते हैं जान के दुश्मन...1997 की घटना थी बेहद डरावनी

संवेदनशील उपकरणों से लैस तकनीकी लैब से निकल रहे निष्कर्ष, विषम परिस्थितियों में जमीनी पड़ताल, शोधपत्रों में खंगाली गई जानकारियों का भंडार हैं। साल में एक बार ही सही, हिमालय दिवस पर विशेषज्ञों के तर्क, विचार और सलाह आने वाले खतरों से चेता रहे हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है आमजन की भागीदारी। समय है संस्थाओं के वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा देकर इस दिन को जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी के रूप में भी याद रखें।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed