{"_id":"9365720e6677aa18d1f6d3ae82dade48","slug":"high-level-committee-in-uttarakhand","type":"story","status":"publish","title_hn":"उच्च स्तरीय कमेटी, मतलब अफसरों की मौज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उच्च स्तरीय कमेटी, मतलब अफसरों की मौज
बिशन सिंह बोरा/अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 04 Feb 2014 04:31 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने जूनियर हाईस्कूल शिक्षकों की समस्याओं के निस्तारण के लिए उच्चस्तरीय कमेटी बनाने की बात कही है, यानी विभागीय अफसरों को फिर सैर का मौका मिलने वाला है।
नहीं, नहीं! सरकार या शिक्षा मंत्री की मंशा पर सवाल नहीं है, लेकिन पिछला अनुभव कुछ यही इशारा करता है।
अफसर करते हैं देश भर में दौरा
दरअसल, वर्ष 2011 में भी जूनियर शिक्षकों के लिए सरकार ने उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी। तब इस कमेटी में शामिल अफसरों ने स्थिति के आकलन के नाम पर हिमाचल, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों का दौरा किया।
दावा था कि इन राज्यों में जूनियर शिक्षकों के लिए लागू नियमों, व्यवस्थाओं के आधार पर प्रदेश में भी जरूरी निर्णय लिए जाएंगे। लेकिन सैर से लौटने के बाद इस कमेटी का क्या हुआ, शिक्षकों को दो साल बाद भी पता नहीं चला है।
विज्ञापन
जबकि कमेटी को दौरे के बाद दो सप्ताह में रिपोर्ट देनी थी। यही वजह है कि शिक्षक इस बार मंत्री के कमेटी बनाने की बात पर खफा हैं।
इसलिए है आंदोलन
प्रदेश में वर्ष 2009-10 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान शुरू होने के बाद जूनियर शिक्षकों की परेशानियां बढ़ीं। जूनियर हाईस्कूलों का उच्चीकरण शुरू हुआ तो शिक्षकों को एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे स्कूलों में भेजा जाने लगा।
दूसरी ओर, स्कूल बंद होने लगे तो इस संवर्ग के शिक्षकों का भविष्य भी अधर में आ गया। ऐसे में शिक्षक लंबे समय से संवर्ग को एलटी घोषित करने या हाईस्कूलों को यथावत चलाने की मांग पर आंदोलनरत हैं।
इनका है कहना
विभागीय जानकारी के मुताबिक पिछली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय को सौंप दी थी। निदेशालय ने भी प्रस्ताव शासन को भेजा, लेकिन अब तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई है।
-सतीश घिल्डियाल प्रांतीय मीडिया प्रभारी जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ
कमेटी का सीधा मतलब है झूठा आश्वासन। हमें झूठे वादे नहीं, बल्कि समस्याओं का ठोस निस्तारण चाहिए। मंत्री आए जरूर, लेकिन झुनझुना थमाकर चले गए।
-रमेश सिंह रावत, संयुक्त मंत्री बागेश्वर
विज्ञापन
नहीं, नहीं! सरकार या शिक्षा मंत्री की मंशा पर सवाल नहीं है, लेकिन पिछला अनुभव कुछ यही इशारा करता है।
अफसर करते हैं देश भर में दौरा
दरअसल, वर्ष 2011 में भी जूनियर शिक्षकों के लिए सरकार ने उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी। तब इस कमेटी में शामिल अफसरों ने स्थिति के आकलन के नाम पर हिमाचल, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों का दौरा किया।
विज्ञापन
दावा था कि इन राज्यों में जूनियर शिक्षकों के लिए लागू नियमों, व्यवस्थाओं के आधार पर प्रदेश में भी जरूरी निर्णय लिए जाएंगे। लेकिन सैर से लौटने के बाद इस कमेटी का क्या हुआ, शिक्षकों को दो साल बाद भी पता नहीं चला है।
विज्ञापन
जबकि कमेटी को दौरे के बाद दो सप्ताह में रिपोर्ट देनी थी। यही वजह है कि शिक्षक इस बार मंत्री के कमेटी बनाने की बात पर खफा हैं।
इसलिए है आंदोलन
प्रदेश में वर्ष 2009-10 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान शुरू होने के बाद जूनियर शिक्षकों की परेशानियां बढ़ीं। जूनियर हाईस्कूलों का उच्चीकरण शुरू हुआ तो शिक्षकों को एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे स्कूलों में भेजा जाने लगा।
दूसरी ओर, स्कूल बंद होने लगे तो इस संवर्ग के शिक्षकों का भविष्य भी अधर में आ गया। ऐसे में शिक्षक लंबे समय से संवर्ग को एलटी घोषित करने या हाईस्कूलों को यथावत चलाने की मांग पर आंदोलनरत हैं।
इनका है कहना
विभागीय जानकारी के मुताबिक पिछली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय को सौंप दी थी। निदेशालय ने भी प्रस्ताव शासन को भेजा, लेकिन अब तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई है।
-सतीश घिल्डियाल प्रांतीय मीडिया प्रभारी जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ
कमेटी का सीधा मतलब है झूठा आश्वासन। हमें झूठे वादे नहीं, बल्कि समस्याओं का ठोस निस्तारण चाहिए। मंत्री आए जरूर, लेकिन झुनझुना थमाकर चले गए।
-रमेश सिंह रावत, संयुक्त मंत्री बागेश्वर