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निजाम ना सही, संगठन की कमान ही सही
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 07 Sep 2015 01:37 PM IST
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अगले साल उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए पहलवानी कर रहे भाजपा के दावेदार सुस्त पड़े नजर आ रहे हैं।
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यह सुस्ती अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ शुरू हुई, लेकिन खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। शाह के आने के बाद यह बात तो तय हो गई कि मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष के लिए अब पहले की तरह रार नहीं होगी। जिसके नाम का ऐलान होगा, वही सिकंदर बनेगा।
बस यह तय होने के बाद कई दिग्गज सुसुप्त अवस्था में चले गए। बेमौके ही खम ठोंकने वाले कई पहलवान आजकल राजनीतिक परिदृश्य से एकदम गायब हैं। कभी सरकार को उखाड़ने की बात करते थे, आजकल पता नहीं हिमालय की कंदराओं में कहां तप कर रहे है।
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अब इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि यदि मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिलती है तो प्रदेश अध्यक्ष का ओहदा ही मिल जाए। कम से कम संगठन के मुखिया बनने पर पहचान का संकट तो नहीं होगा।
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