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गंगा किनारे वाले क्षेत्रों में बढ़ रहे गॉल ब्लैडर कैंसर के मरीज, पीछे है यह वजह

Tue, 29 May 2018 11:12 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 29 May 2018 11:12 AM IST
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gallbladder cancer in ganga river bank area public
gangotri

गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा के किनारे वाले क्षेत्रों (गैंगेटिक बेल्ट) में रहने लोगों में गाल ब्लैडर कैंसर तेजी से फैल रहा है।

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ऐसा गंगा के पानी में आर्सेनिक, कैडमियम, शीशा, मैग्नीज, मरकरी जैसे खतरनाक तत्वों की अधिकता के कारण हुआ है। इलाहाबाद स्थित रीजनल कैंसर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों की ओर से किए गए सर्वे में इसका खुलासा हुआ है। 
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विशेषज्ञों के अनुसार, गैंगेटिक बेल्ट में गंगा के पानी में आर्सेनिक, कैडमियम, शीशा, मैगनीज, मरकरी जैसे खतरनाक तत्व अधिक मात्रा में घुल गए हैं। इसके अलावा गंगा के किनारे उगने वाली फसलों में अंधाधुंध छिड़के जाने वाले खतरनाक कीटनाशकों के कारण भी गंगा और भूमिगत जल प्रदूषित हुआ है। इससे गैंगेटिक बेल्ट के लोगों में गाल ब्लैडर कैंसर (पित्त की थैली में कैंसर) तेजी से फैल रहा है।
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कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जीवनदायिनी ‘गंगा’ को प्रदूषित होने से बचाया नहीं गया तो भविष्य की तस्वीर भयावह होगी। रीजनल कैंसर इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ डॉ. राधा घोष का कहना है कि संस्थान में पिछले पांच साल में इलाज कराने पहुंच रहे मरीजों में हर तीसरा मरीज गाल ब्लैडर कैंसर जूझ रहा है। इनमें मरीजों में ज्यादातर गैंगेटिक बेल्ट में शामिल कानपुर इलाहाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर, पटना आदि शहरों एवं आसपास के हैं। दुखद यह है कि गाल ब्लैडर कैंसर पता मरीजों को चौथे चरण में चल पा रहा है। इससे इलाज में काफी मुश्किल पेश आ रही है।  

संवेदनशील इलाकों में चलाया जा रहा जागरूकता अभियान

gallbladder cancer in ganga river bank area public
Gangotri National Park
डॉ. राधा घोष के मुताबिक, गाल ब्लैडर कैंसर के प्रति जागरूकता के लिए विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) और रीजनल कैंसर इंस्टिट्यूट की ओर से अभियान शुरू किया गया है। अभियान के दौरान पॉपुलेशन बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री फॉर गाल ब्लैडर के तहत आंकड़े जुटाए जाएंगे। आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कैंसर से निपटने की रणनीति तय की जाएगी।

गंगोत्री से ही प्रदूषित हो रही गंगा
गंगा के पानी को लेकर शोध करने वाले रसायनशास्त्री डॉ. प्रमोद शर्मा के अनुसार गंगा अपने उद्गम स्थल गंगोत्री से ही प्रदूषित हो रही है। शर्मा ने उत्तरकाशी, विष्णु प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग, देव प्रयाग, नंद प्रयाग और टिहरी समेत कई स्थानों पर नदी जल पर शोध किया है। अध्ययन में पाया गया है कि नदियों के जल में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और डिजाल्व आक्सीजन (डीओ) का प्रतिशत बेहद कम है। उत्तराखंड में नदियों का डीओ औसतन 14 से लेकर 15 मिलीलीटर प्रति लीटर होना चाहिए जो महज छह मिलीलीटर प्रति लीटर है।

नदी व भूमिगत जल में बढ़ रही खतरनाक रसायनों की मात्रा
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं रसायन शास्त्री प्रो. राकेश भूटानी के अनुसार, गंगा नदी के किनारे बसे शहरों में इलेक्ट्रोप्लेटिंग, माइनिंग, पेंट इंडस्ट्री, पेपर मिल्स, थर्मल पावर प्लांट, स्टील प्लांट, चमड़ा उद्योग समेत कई औद्योगिक इकाइयों की वजह से इन क्षेत्रों की नदियों एवं भूमिगत जल में खतरनाक रसायनों की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। बकौल प्रो. राकेश भूटानी गंगा की सेहत हरिद्वार में तो ठीक है लेकिन कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना जैसे शहरों में औद्योगीकरण को चलते गंगा की स्थिति बहुत खराब है।
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