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उद्पाल्टा और कुरोली गांव में हुआ गागली युद्ध
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उद्पाल्टा गांव में पाइंता पर्व के बाद पंचायती आंगन में नृत्य करते लोग।
- फोटो : VIKAS NAGAR
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रानी-मुन्नी के श्राप से मुक्ति और पश्चाताप के लिए उद्पाल्टा और कुरोली गांव के लोगों ने सदियों पुरानी मान्यता का निवर्हन करते हुए दशहरा के दिन करीब एक घंटे तक आपस में गागली युद्ध किया। इसके बाद दोनों गांव के लोगों ने एक-दूसरे को गले मिलककर पाइता पर्व की बधाइंया दी।
सैकड़ों लोगों ने दो सगी बहनों की घास-फूस की प्रतिमा को कुएं में विसर्जित किया। सुबह थाती-माटी(गांव का मूल स्थान) और गांव के कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा की गई।
मालूम हो कि जौनसार बावर हमेशा से ही अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए पहचाना जाता रहा है। दशहरा के दिन जब पूरा देश रावण के पुतले का दहन कर असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की जीत का जश्न मना रहा होता है तब उसी दिन जौनसार बावर के उत्पाल्टा और कुरोली के गांव में रहने वाले लोग पश्चाताप की आग में आपस में गागली युद्ध कर रहे होते हैं। इस युद्ध में किसी की भी हार-जीत नहीं होती है। मंगलवार को भी दशहरा पर्व पर ग्रामीणों ने सैकड़ों सालों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए पहले दो सगी बहनों रानी और मुन्नी के प्रतीक स्वरूप घास-फूस की प्रतिमा को क्याणी डांडा स्थित कुएं में ढोल-दमाऊ की थाप के साथ विसर्जित किया।जिसके बाद लोगों ने गागली(अरबी) के डंठल एक-दूसरे पर फेंके। करीब एक घंटे तक युद्ध के बाद लोगों ने पायता पर्व की एक-दूसरे को बधाई दी। महिलाओं और पुरुषों ने सामूहिक हारूल, तांदी, रासो और झेंता नृत्य किया। इस अवसर पर खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय, गजेंद्र सिंह राय, जालम सिंह राय, पूरण सिंह राय, हरी सिंह, श्याम सिंह राय, गुलाब सिंह राय, रणवीर सिंह राय, दयाल सिंह राय, धन सिंह, सतपाल राय, अनील राय, विक्रम सिंह राय आदि मौजूद रहे।
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गांव में जुड़वा बहनों के जन्म होने तक होगा युद्ध
किवदंतियों के अनुसार करीब 400 साल पहले रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें थी। दोनों एक साथ कुएं पर पानी भरने जाती थी। एक दिन रानी की कुएं में गिरने से मौत हो गई। लोगों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को दोषी ठहराया। इससे खिन्न होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। जिसके बाद गांव में अजीब वाक्ये होने लगे। लोगों जब गांव में हो रहे हादसों को लेकर महासू देवता के माली के पास गए तो उन्होंने बताया कि गांव पर रानी-मुन्नी का श्राप लगाया हआ है। जिससे बचने के लिए दोनों बहनों की घासफूस की प्रतिमाओं को दशहरे के दिन कुएं में विसर्जित करने की बात कही। तब से उद्पाल्टा गांव में पाइंता पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई। लोग दशहरे के दिन पश्चाताप स्वरूप गागली युद्ध करते हैैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव में दशहरे के दिन दो कन्याओं का जन्म नहीं हो जाता, तब तक यह परंपरा जारी रहेगी ताकि, गांव को किसी अनहोनी से बचाया जा सके।
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सैकड़ों लोगों ने दो सगी बहनों की घास-फूस की प्रतिमा को कुएं में विसर्जित किया। सुबह थाती-माटी(गांव का मूल स्थान) और गांव के कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा की गई।
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मालूम हो कि जौनसार बावर हमेशा से ही अपनी विशिष्ट संस्कृति के लिए पहचाना जाता रहा है। दशहरा के दिन जब पूरा देश रावण के पुतले का दहन कर असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की जीत का जश्न मना रहा होता है तब उसी दिन जौनसार बावर के उत्पाल्टा और कुरोली के गांव में रहने वाले लोग पश्चाताप की आग में आपस में गागली युद्ध कर रहे होते हैं। इस युद्ध में किसी की भी हार-जीत नहीं होती है। मंगलवार को भी दशहरा पर्व पर ग्रामीणों ने सैकड़ों सालों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए पहले दो सगी बहनों रानी और मुन्नी के प्रतीक स्वरूप घास-फूस की प्रतिमा को क्याणी डांडा स्थित कुएं में ढोल-दमाऊ की थाप के साथ विसर्जित किया।जिसके बाद लोगों ने गागली(अरबी) के डंठल एक-दूसरे पर फेंके। करीब एक घंटे तक युद्ध के बाद लोगों ने पायता पर्व की एक-दूसरे को बधाई दी। महिलाओं और पुरुषों ने सामूहिक हारूल, तांदी, रासो और झेंता नृत्य किया। इस अवसर पर खत स्याणा राजेंद्र सिंह राय, गजेंद्र सिंह राय, जालम सिंह राय, पूरण सिंह राय, हरी सिंह, श्याम सिंह राय, गुलाब सिंह राय, रणवीर सिंह राय, दयाल सिंह राय, धन सिंह, सतपाल राय, अनील राय, विक्रम सिंह राय आदि मौजूद रहे।
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गांव में जुड़वा बहनों के जन्म होने तक होगा युद्ध
किवदंतियों के अनुसार करीब 400 साल पहले रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें थी। दोनों एक साथ कुएं पर पानी भरने जाती थी। एक दिन रानी की कुएं में गिरने से मौत हो गई। लोगों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को दोषी ठहराया। इससे खिन्न होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। जिसके बाद गांव में अजीब वाक्ये होने लगे। लोगों जब गांव में हो रहे हादसों को लेकर महासू देवता के माली के पास गए तो उन्होंने बताया कि गांव पर रानी-मुन्नी का श्राप लगाया हआ है। जिससे बचने के लिए दोनों बहनों की घासफूस की प्रतिमाओं को दशहरे के दिन कुएं में विसर्जित करने की बात कही। तब से उद्पाल्टा गांव में पाइंता पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई। लोग दशहरे के दिन पश्चाताप स्वरूप गागली युद्ध करते हैैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव में दशहरे के दिन दो कन्याओं का जन्म नहीं हो जाता, तब तक यह परंपरा जारी रहेगी ताकि, गांव को किसी अनहोनी से बचाया जा सके।