केदारनाथ आपदाः आज भी जख्म ताजे हैं...
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रुद्रप्रयाग-केदारनाथ मार्ग पर अगस्त्यमुनि, विजयनगर और सेमी जैसे कई कस्बे हैं, जहां बीती 16-17 जून की आपदा से पहले चारधाम यात्रा के दौरान पांव रखने तक की जगह नहीं मिलती थी।
बाशिंदे दाने-दाने को मोहताज
अब ये कस्बे उजाड़ हैं और इनके बाशिंदे दाने-दाने को मोहताज। मंदाकिनी ने इन्हें उजाड़ दिया और अब बसने के लिए जगह ही नहीं मिल रही है। रुद्रप्रयाग से तिलवाड़ा मार्ग पर आगे बढ़ें तो अगस्त्यमुनि, विजयनगर और चंद्रापुरी जैसे कई कस्बे आपको गुप्तकाशी तक मिल जाएंगे।
हर कस्बे में टूटे-फूटे मकान देखने को मिलते हैं। दुकानों में हल्की चहल-पहल है पर कस्बों की सूरत और सीरत उजाड़ सी नजर आती है। केदारयात्रा के इस खास पड़ाव में छोटे-मोटे शहर और बाजार भी हैं। जरूरत की हर चीज को समेटे हुए यहां ग्रामीणों की भी दुकानें हैं। लेकिन अब आपदा ने सबकुछ उजाड़ कर इनके सामने अजब धर्म संकट खड़ा कर दिया है।
गांव जा नहीं सकते और यहां रह नहीं सकते। पलायन करके दून, हरिद्वार की ओर रुख करें तो आजीविका का क्या होगा। मुसीबत यह भी है कि यहां सुरक्षित जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं। पांच नाली जमीन का बाजार भाव करीब 10 लाख रुपए है।
कुल सात लाख का पैकेज रेडीमेड मकान बनाने के लिए है और जमीन के भाव इससे कहीं अधिक हैं। एक बार जल विद्युत परियोजना बना रही एक कंपनी से बात हुई थी। यह कंपनी सीएसआर (सामाजिक दायित्व निर्वहन) के तहत मकान बनाकर देने को तैयार हुई। इसके बाद सरकार से जाने क्या बात हुई कि कंपनी अब पुल और सड़क बनाने की ही बात कर रही है।
- अजेंद्र अजय, पदाधिकारी केदार पुनर्वास संघर्ष समिति
कुछ भी हो नहीं छोड़ेंगे केदारघाटी
आपदा से कराह रही केदारघाटी के लोग भले ही जिंदगी से जंग लड़ रहे हों, लेकिन जड़ों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
पहाड़ छोड़ने को नहीं तैयार
गोंदार, चोमासी और भ्यूंदार जैसे गांव विस्थापन के लिए तो तैयार हैं पर पहाड़ छोड़ने के लिए नहीं। इन लोगों का साफ कहना है कि गांव जैसी हवा और पानी भला और कहां मिलेगा।
जाहिर है कि गांव का अपनी मिट्टी से जुड़ा रहने का यह जज्बा उत्तराखंड सरकार के विस्थापन के सरल फॉर्मूले को धराशायी कर सकता है। आपदा के बाद नदी के कटाव के चलते केदारघाटी के दर्जनों गांव विस्थापन के लिए मजबूर हैं, लेकिन आजीविका के सवाल से जूझने के बावजूद ये गांव पहाड़ छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
गोंदार के निवर्तमान प्रधान भगत सिंह पंवार के मुताबिक 60 के दशक में गांव में सिर्फ 35 परिवार थे। इस समय गांव में करीब 902 परिवार हैं। मदमहेश्वर घाटी में जिस जगह गोंदार इस समय बसा हुआ है, उससे करीब एक किलोमीटर दूर मूल गांव था।
कुछ मीटर दूर जाना भी मुश्किल
लोगों को खतरा महसूस हुआ तो दूसरी जगह पनाह ले ली। लेकिन अब उनके लिए गांव से कुछ मीटर दूर जाना भी मुश्किल हो रहा है। दरअसल 1982 में केदारनाथ संरक्षित क्षेत्र घोषित हो गया था और लोगों को गांव से बाहर एक निर्माण करने से पहले वन विभाग से मंजूरी लेनी होती है।
आपदा की गोद में उत्तराखंड
दूसरी तरफ उत्तराखंड सरकार केदारनाथ आपदा के बाद भी यह तय नहीं कर पाई है कि अति संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं और इन क्षेत्रों में नुकसान को कम करने के लिए क्या किया जाएगा।
इसरों ने तैयार किया था मैप
यह काम इसरो ने किया था और इसके लिए बाकायदा अति संवेदनशील क्षेत्रों का मैप तैयार किया था। इसरों ने वर्ष 2000 में उत्तराखंड और हिमाचल के करीब 2000 किलोमीटर के यात्रा रूट का मैप तैयार किया था। इस मैप में यह साफ-साफ दर्शाया गया था कि यात्रा रूट पर कौन-कौन से अति संवेदनशील क्षेत्र हैं।
केदारनाथ आपदा में 2000 जगह पर भूस्खलन हुआ
खास बात यह भी रही कि वर्ष 2000 के बाद की प्रदेश में आई आपदा से यह भी जाहिर हुआ कि ये मैप सटीक हैं। मसलन केदारनाथ आपदा के दौरान ही करीब 2000 जगह पर भूस्खलन हुआ।
इनमें से करीब 1600 स्थान वे हैं जिनके बारे में मैप में बहुत हद तक स्पष्ट कर दिया गया था कि यह अति संवेदनशील क्षेत्र हैं। हद तो यह है कि केदारनाथ की आपदा के बाद भी अतिसंवेदनशील स्थानों के मानचित्रों को ठंडे बस्ते में ही रखा गया है।
अब केंद्रीय योजना आयोग की संस्तुति पर इस मैप को अपडेट किया जा रहा है। पर आपदा प्रबंधन में मैप के उपयोग को लेकर शायद ही कोई सुगबुगाहट हो।
किस-किस यात्रा मार्ग के है लैंड हैजार्ड जोनेशन मैप
ऋषिकेश-रुद्रप्रयाग-चमोली-बदरीनाथ
रुद्रप्रयाग-ऊखीमठ-केदारनाथ
चमोली-ऊखीमठ
ऋषिकेश-उत्तरकाशी-गंगोत्री-गौमुख
पिथौरागढ़-खेला-माल्पा
डलहौजी-चंबा-भरमौर
शिमला-बिलासपुर-कुल्लु-मनाली
शिमला-रामपुर-सराहन-सुमधो
इस मार्ग से शुरू की जा सकती है केदारनाथ यात्रा
16-17 जून की आपदा के बाद पुनर्वास की तरह ही पर्यावरण पर्यटन भी केदारघाटी में मदद की इंतजार में है।
चौमासी और मदमहेश्वर से केदारनाथ ट्रैक अब क्षेत्र के लोगों के लिए उम्मीद की तरह है। इसके उलट स्थिति यह है कि चौमासी के ही कई युवा ट्रैक रूट का नक्शा लेकर पिछले कई सालों से भटक रहे हैं पर इनको निराशा ही हाथ लगी है।
सोनप्रयाग के पास से 22 किलोमीटर का ट्रैक
जून माह की आपदा से पहले केदारनाथ का रास्ता गौरीकुंड से होकर जाता था। पर आपदा ने गौरीकुंड पहुंचने का रास्ता भी बंद किया और गौरीकुंड से रामबाड़ा होकर केदारनाथ पहुंचने का रास्ता भी। अब कोशिश सोनप्रयाग के पास से करीब 22 किलोमीटर का ट्रैक कर केदारनाथ पहुंचने की है।
लोक निर्माण विभाग इस काम में जुटा हुआ है और अप्रैल तक पैदल मार्ग तैयार हो जाने का दावा भी किया जा रहा है। हालांकि इस ट्रैक को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं। पहले का 14 किलोमीटर का रास्ता मंदाकिनी नदी के एक किनारे से था और अब यह दूसरे किनारे से है।
इस नए ट्रैक में खड़ी चढ़ाई का सामना भी लोगों को करना पड़ सकता है। दूसरी और चौमासी गांव के ही कई युवा चौमासी से केदारनाथ के ट्रैक को ज्यादा आसान मान रहे हैं। इनका कहना है कि यह ट्रैक बुग्यालों के बीच से होकर जाता है और नदी से दूर भी है।
इस ट्रैक का इस्तेमाल गांव के लोग खुद भी करते रहे हैं और केदारघाटी में इस बार की भारी बरसात से भी इस ट्रैक को कोई नुकसान नहीं हुआ। चौमासी के ही सतीश तिंदौरी के मुताबिक वे पिछले पांच साल से इस ट्रैक को अपनाए जाने के लिए कोशिश कर रहे हैं पर सफलता नही मिल पाई।
दिखाई दिया केदारघाटी में आपदा का असल रूप
आपदा के छह माह बाद भी केदारघाटी में जिंदगी ठहरी हुई सी है। ऐसा लग रहा है मानो आपदा भी यहीं ठहर गई हो।
छह माह पहले जून के आखिर में जब मैं गुप्तकाशी आया था, तब यहां सरकारी अफसरों, गैर सरकारी संगठनों से जुड़े लोगों और पीड़ितों का जमावड़ा था। अफरातफरी थी। अब गुप्तकाशी शांत है। लेकिन दर्द अब भी वही है।
कैसे चलेगी आगे की जिंदगी
तब मदद के लिए बढ़े हाथ भी अब वहां नहीं हैं। भविष्य के प्रति उपजी लोगों की चिंताएं अब और बढ़ गई हैं। आपदा से बेरोजगार लोगों को समझ में नहीं आ रहा कि आगे की जिंदगी कैसे चलेगी।
जून की आपदा के बाद गुप्तकाशी तक पहुंचाने वाला घनसाली-मयाली मार्ग एकमात्र रास्ता था। इस सड़क से गुप्तकाशी तक के लिए 35 किमी की दूरी तय करने में वाहन से मुझे तब तीन घंटे लगे थे और रविवार, 29 दिसंबर को भी। सड़क की हालत जून जैसी ही है।
भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ जाएंगी
गौरीकुंड से कुछ किलोमीटर पहले तक की सड़क ही बन पाई है। संपर्क मार्गों की बात छोड़ ही दी जाए तो बेहतर। लोग चिंतित हैं कि अगली बरसात में इन बदहाल मार्गों पर भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ जाएंगी।
संपत्ति के नुकसान की भरपाई अब भी बाकी है। गुप्तकाशी से करीब 10 किलोमीटर दूर गढतरा, देवसाल, रुद्रपुर, नारायणकोटी जैसे कई गांव हैं, जिन्होंने 16-17 जून को केदारघाटी की आपदा का सीधे सामना किया था। ये गांव यात्रा रूट के आसपास ही हैं।
छह माह बाद भी इन गांवों के लोगों को नहीं पता कि आगे क्या होगा। इन गांवों की आजीविका केदार यात्रा पर ही निर्भर है। इन्हें नहीं लगता कि सड़कों की जैसी हालत है, अगले सीजन में भी जिंदगी चलाने लायक कमाई हो पाएगी।
क्षतिग्रस्त भवन दे रहे हादसे को न्योता
जलप्रलय के छह माह बाद भी केदारनाथ राजमार्ग खतरनाक बना हुआ है। कई स्थानों पर सड़क के ऊपर लटके भवन हादसे को न्योता दे रहे हैं। प्रशासन की ओर से लटके भवनोँ को हटाने की प्रक्रिया चलाई गई थी, लेकिन यह अभियान भी आधे में ही रुक गया।