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...तो पसंदीदा शराब बॉटलिंग फर्मों के लिए उत्तराखंड में हुआ ये खेल?

Sat, 17 Dec 2016 02:39 AM IST
संजय त्रिपाठी/अमर उजाला, देहरादून
संजय त्रिपाठी/अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 17 Dec 2016 02:39 AM IST
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Excise policy change second time in two months.
harish rawat

उत्तराखंड में शराब की तस्करी रोकने और क्वालिटी को बेहतर करने के लिए किए गए सख्त नियमों को एक महीने के भीतर पलटकर रख दिया गया। बीते दो माह के भीतर बॉटलिंग प्लांट के लिए उत्तराखंड की आबकारी नीति में दो बार संशोधन किए गए।

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संशोधन में वो तमाम नियम-शर्तें गायब कर दी गईं, जिससे बॉटलिंग प्लांट लगाना हर किसी के लिए थोड़ा मुश्किल था। यही नहीं दूसरे संशोधन के दस दिन के भीतर दो अलग-अलग फर्मों को बाटलिंग प्लांट का लाइसेंस भी जारी कर दिया गया। कभी शराब बिक्री के तरीके तो कभी होलोग्राम के बाद अब बाटलिंग प्लांट की स्थापना में मिली असाधारण छूट को लेकर फिर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं।
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इस मामले में आखिरी संशोधन की अधिसूचना 23 नंवबर 2016 को सचिव आबकारी सीएस नपलच्याल ने जारी की है। राज्य स्थापना के बाद से प्रदेश में शराब की बिक्री और अन्य कामकाज उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम के तहत किए जा रहे थे।

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ये बना था नियम

Excise policy change second time in two months.
alcohol - फोटो : demo pic

इसमें तमाम कमियों को देखते हुए राज्य की कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2012 में उत्तराखंड राज्य की अलग आबकारी नीति निर्धारित की। इस नीति के बिंदु 33(ख) में बाटलिंग प्लांट की स्थापना के लिए भी कुछ नियम बनाए गए थे। इसके तहत प्लांट लगाने के लिए सख्त नियम बनाए गए कि आवेदक को प्रदेश में कम से कम पांच वर्ष से स्थापित होना चाहिए।

इसके अलावा उसे कम से कम तीन राज्यों में अपने ब्रांड की बिक्री का अनुभव हो। साथ ही बीते तीन सालों में उसने कम से कम दो लाख पेटी प्रतिवर्ष शराब का उत्पादन किया हो।

विभाग के सूत्रों के मुताबिक ये तीन शर्तें इसलिए रखी गईं थी, जिससे प्रतिष्ठित व्यक्ति या फर्म ही आवेदन कर सकें। कुल मिलाकर मामला गुणवत्ता पूर्ण और तस्करी मुक्त शराब की बिक्री की मंशा से जुड़ा था।

प्लांट के लिए महीने भर में दो बार बदला जीओ

Excise policy change second time in two months.
शराब - फोटो : demo pic

इसी आधार पर प्रदेशभर में तमाम बॉटलिंग प्लांट स्थापित भी हुए। मगर इसी बीच 17 अक्टूबर को आबकारी विभाग ने इन नियम-शर्तों में तब्दीली का शासनादेश जारी कर दिया। इसके तहत यह प्रावधान भी कर दिया गया कि आवेदनकर्ता फर्म या व्यक्ति या उसकी साझेदार कंपनी किसी अन्य व्यक्ति या कंपनी के साथ अनुबंध करके अपने ब्रांड की भराई के लिए प्लांट स्थापित कर सकता है।

इस शासनादेश में तीन राज्यों का अनुभव, पांच साल राज्य में स्थापित होने और दो लाख पेटी वाले नियम हटा दिए गए। इस आदेश को जारी हुए अभी एक माह बीता ही था कि 23 नवंबर में इसमें फिर बदलाव किया गया और यह प्रावधान किया कि आवेदन अन्य किसी भी कंपनी या फर्म के ब्रांड की भराई कर सकेगा।

यही नहीं इस संशोधन के महज दस दिन में हल्द्वानी और दिल्ली को दो फर्मों को देवप्रयाग और भीमताल में बॉटलिंग प्लांट के लिए लाइसेंस भी जारी कर दिया गया। यह पूरी जल्दबाजी तमाम सवाल खड़े कर रही है। 

आखिर पहाड़ों पर क्यों लगा रहे बॉटलिंग प्लांट ?

Excise policy change second time in two months.
शराब - फोटो : people killed of Toxic alcohol

मैदानी क्षेत्रों के बजाय पहाड़ों पर बॉटलिंग प्लांट लगाने की वजह किसी को समझ में नहीं आ रही है। ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार समेत अन्य मैदानी इलाकों में शराब की बॉटलिंग पहाड़ों के मुकाबले सस्ती पड़ेगी, क्योंकि यहां भराई के लिए आवश्यक माल के परिवहन की कीमत कम आएगी।

सूत्रों की मानें तो पहाड़ों पर प्लांट की निगरानी करना उतना आसान नहीं है, जितना मैदानों में है। ऐसे में चोरी का माल निकालना और शराब की गुणवत्ता से समझौता करना आसान होगा। उधर, देवप्रयाग में बॉटलिंग प्लांट का विरोध करने वाले कैबिनेट मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी भी अब इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे हैं।

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