Engineer's Day: उत्तराखंड में लोनिवि और सिंचाई विभाग ने चुनौती स्वीकार की, सफलता की नई इबारत लिखी
टिहरी बांध की झील पर बना डोबरा चांठी पुल से लेकर मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना शामिल है। इन योजनाओं के पूरा होने से लोगों की सुविधाओं में इजाफा हुआ।
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राज्य बनने के बाद लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग के इंजीनियरों ने कई योजनाओं की चुनौती को स्वीकार किया और सफलता की नई इबारत लिखी। इनमें टिहरी बांध की झील पर बना डोबरा चांठी पुल से लेकर मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना शामिल है। इन योजनाओं के पूरा होने से लोगों की सुविधाओं में इजाफा हुआ।
टिहरी बांध पर एक झूला पुल बनाने की योजना पर करीब 18 साल पहले कदम बढ़े थे, लेकिन पुल की लंबाई समेत अन्य चुनौती थी। पुल के हिस्सों को जोड़ा कैसे जाए, यह बड़ा सवाल था। इस पुल से निर्माण से जुड़े सेवानिवृत्त चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर एसके राय कहते हैं कि पहले इसके निर्माण का काम सिंचाई विभाग को दिया गया, बाद में इसे लोक निर्माण विभाग को सौंपा गया।
कुछ निर्माण हुआ फिर इसे रोक दिया गया और विशेषज्ञ संस्थानों से तकनीकी राय लेने को कहा गया। आखिर में दक्षिण कोरिया की कंपनी के सहयोग से पुल का निर्माण किया गया। 725 मीटर लंबा पुल सिंगल स्पान पर बना है, यह अपने तरह का पहला पुल था। इसके बनने से हजारों लोगों को फायदा हुआ।
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इस पुल का लोकार्पण वर्ष 2021 में हुआ था। लोनिवि विभागाध्यक्ष दीपक यादव के मुताबिक, इतनी ऊंचाई और लंबाई का एशिया का संभवत: यह अपने तरह का पहला पुल है। पुल को बनाना बहुत चुनौतीपूर्ण था। पुल की रिडिजाइन कराई गई थी। प्रोजेक्ट के दौरान एक इंजीनियर की मृत्यु भी हो गई थी।
मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना
उत्तरकाशी में मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना-2 का भी अपना इतिहास है। सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता संजय शुक्ल के मुताबिक, योजना का खाका एकीकृत यूपी के समय खींचा गया, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ। उस समय बिजली की काफी मांग हो रही थी, ऐसे में 2001 में मनेरी बांध बनाने का काम शुरू करने का फैसला किया गया। इसमें 75 प्रतिशत से अधिक सिविल वर्क होता है। उस काम की जिम्मेदारी सिंचाई विभाग को दी गई। उस समय वह प्रभारी अधिशासी अभियंता के तौर पर तैनात थे। शुक्ल के मुताबिक, यह काम आसान नहीं था। 16 किमी सुरंग, बैराज निर्माण और जहां पर टरबाइन लगनी थी, वहां का सिविल वर्क सिंचाई विभाग को करना था। चुनौती को स्वीकार करने के साथ काम शुरू किया गया। काम के दौरान कई लोगों की जान भी गई, लेकिन हौंसला बना रहा। आखिरकार वर्ष 2008 में काम पूरा हुआ। इससे 304 मेगावाट बिजली का उत्पादन का रास्ता साफ हुआ। इस योजना को बाद में यूजीवीएनएल को हस्तांतरित किया गया।
चारधाम परियोजना ने बदली तस्वीर
चारधाम परियोजना से राज्य में विकास को नई गति मिली। 889 किमी लंबी योजना के तहत गढ़वाल के साथ कुमाऊं में भी निर्माण कार्य हुआ। इसके निर्माण के दौरान भी कई चुनौतियां आईं। राष्ट्रीय राजमार्ग के मुख्य अभियंता दयानंद कहते हैं कि बदरीनाथ मार्ग पर ऋषिकेश से आगे कौड़ियाला के पास नदी का पानी मार्ग पर आ जाता था, इससे आवागमन प्रभावित होता था। ऐसे में नदी के समानांतर पुल बनाने का फैसला किया गया। अधिशासी अभियंता भृगुनाथ द्विवेदी कहते हैं कि 560 मीटर पुल बनाया जाना था, पर चुनौती यह थी कि नदी का जलस्तर दो बार बढ़ता था। एक बारिश में और दूसरा गर्मी में जब बर्फ पिघलती थी। ऐसे में काम करने में समस्या आ रही थी। सुरक्षा को लेकर भी चिंता थी। दूसरी तरफ खड़ी चट्टान थी, उसे काटा भी नहीं जा सकता था। इसके अलावा ट्रैफिक भी चलाना था। ऐसे में पुल के डिजाइन में बदलाव किया गया फिर पुल का काम पूरा हो सका।