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कुछ तो गड़बड़ है GMVN में...उठ रहे सवाल
नलिनी गुसाईं/अमर उजाला,देहरादून
Updated Thu, 03 Mar 2016 11:44 PM IST
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गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) में इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। यह कहना वहां काम करने वाले कर्मचारियों का है।
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इन लोगों की माने तो घाटे में होने की वजह से निगम के पास कर्मचारियों को देने के लिए वेतन के पैसे नहीं हैं, दूसरी ओर अपने चहेतों को एडजस्ट करने की तैयारी चल रही है।
इन्हें देने के लिए निगम के पास 70-70 हजार रुपये की सैलरी भी है। मालूम हो कि समूह ग की भर्ती भले ही लोक सेवा आयोग से होती है लेकिन क्लास-1 की भर्ती सीधे तौर पर कराने की तैयारी है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है।
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जीएमवीएन में अंदरखाने दो डीजीएम की नियुक्ति की तैयारी चल रही है। फाइल शासन पहुंच चुकी है। सूत्रों की माने तो इन दोनों में से एक तो पहले ही नियम में कार्यरत है।
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उन्हें हुनर से रोजगार के संयोजक का काम दिया गया और इन्हें पांच-दस नहीं बल्कि 80 हजार रुपये सेलरी दी जाने लगी। इसके अलावा निगम में बैठने के लिए उन्हें कमरा भी दिया गया है।
कुछ दिन पहले इन्हें पर्यटन सलाहकार बना दिया गया और सेलरी एक लाख रुपये कर दी गई। अब इन्हीं को डीजीएम के पद पर नियुक्त करने की तैयारी हो रही है।
एक ओर कुछ हजार रुपये वेतन पाने वाला चपरासी तक आयोग के माध्यम से परीक्षा देकर निगम में पहुंचता तो दूसरी ओर इस तरह सेटिंग और गेटिंग का खेल करने वाले सीधे बड़ी पोस्ट पर पहुंच जाते हैं।
सूत्रों की माने तो विभाग ने इस संबंध में एक छोटा सा विज्ञापन देने की तैयारी कर ली है। इतनी बड़ी पोस्ट के लिए कोई लिखित परीक्षा नहीं रखी जा रही है बल्कि सीधे इंटरव्यू कराकर नियुक्ति देने की तैयारी है।
आबकारी काम छिनने से पहले से नाराज चल रहे निगम के कर्मचारी इस प्रकरण से भड़के हुए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि निगम को फायदा पहुंचाने के लिए इसकी प्रॉपर्टी को पीपीपी मोड पर दिया जा रहा है।
कर्मचारियों को कई महीनों से वेतन तक नहीं मिला है। ऐसे में एक डीजीएम के लिए 5600 रुपये का ग्रेड पे यानी 70 हजार रुपये सेलरी देना कहां तक जायज है।
निगम में कुछ प्रोफेशनल लोगों की जरूरत है। यही वजह है कि डीजीएम रखे जाने की तैयारी है लेकिन फिलहाल शासन के कार्मिक विभाग से यह पूछा गया है कि क्या ऐसे डीजीएम रखे जा सकते हैं। यदि इस पर जवाब न में आया तो आयोग के माध्यम से ही भर्ती होगी।
-सी रविशंकर, एमडी, जीएमवीएन
पहले भी हो चुके ऐसे मामले
वर्ष 2010 में भी इसी तरह दो डीजीएम और चार आरएम रखे गए। अखबार में छोटा सा विज्ञापन देकर चार दिन के अंदर सभी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई।
इस पर निगम के कर्मचारी संगठनों ने खूब नाराजगी जताई। आखिरकार निगम प्रबंधन को अपना फैसला बदलना पड़ा और सबको बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा।