इस तीसरी दुनिया में नहीं पहुंची कोई सरकार
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नामिक को प्रकृति भरपूर सौंदर्य लुटाया है लेकिन आजादी के 66 साल भी हुक्मरां ने कुछ नहीं दिया। यहां तक आते-आते सरकारी ‘सहूलियतों की नदियां’ सूख जाती हैं। गांव बड़ा वोटबैंक नहीं है इसलिए संसद का कोई भी प्रत्याशी यहां कभी वोट मांगने नहीं आया।
641 आबादी वाले नामिक के बाशिंदे राष्ट्रीय योजनाओं के लाभ से भी वंचित हैं। 65 असहाय लोगों को एक साल से पेंशन भी नहीं मिली है। हां, ग्रामीणों से वोट लेने की तैयारी जरूर हो गई है।
नामिक उत्तराखंड का सबसे ऊंचाई पर स्थित मतदान केंद्र है। यहां 362 वोट हैं। मतदान की तैयारी हो गई है। स्कूल (पोलिंग बूथ) की साफ-सफाई हो गई है। अमर उजाला की टीम 27 किमी का पैदल रास्ता तय करके नामिक ग्लेशियर के नीचे बसे कुमाऊं के इस अंतिम गांव में पहुंची। इसके बाद तिब्बत शुरू हो जाता है।
छह माह तक बर्फ से ढका रहता है गांव
पिथौरागढ़ के द्वालीगाड़ (विर्थी) से 27 किमी की पैदल चलकर जब समुद्र तल से 2700 मीटर ऊंचे नामिक पहुंचते हैं तो इसके सिर पर हिमालय की छत, बुरांस समेत तमाम पौधों में खिले रंग-बिरंगी फूल स्वर्ग की अनुभूति कराते हैं।
वहीं अक्तूबर से मार्च तक बर्फ से ढके रहने वाले इस गांव में दुश्वारियां भी कम नहीं है।
आजादी के बाद से अब तक मात्र दो महिलाओं के प्रसव सरकारी अस्पताल में हुए हैं। 2009 में पहला सुरक्षित प्रसव जिला महिला चिकित्सालय में तत्कालीन ग्राम प्रधान तुलसी जैमियाल का हुआ। सरकारी अस्पताल में पहला जन्म लेने का रिकार्ड बनाने वाली दीक्षा आज 5 साल की है।
आपदा के दौरान दुनिया से कट गया था गांव
2013 की आपदा में नामिक के सारे रास्ते बंद हो गए थे। 6 जुलाई 2013 को गांव के दुर्गा सिंह की पत्नी नीमा देवी को प्रसव पीड़ा उत्पन्न हुई, तब अमर उजाला के प्रयास से नीमा देवी को नामिक से हेलीकॉप्टर के जरिए जिला मुख्यालय ले जाया गया।
नवजात बच्चे का स्वास्थ्य खराब होने के कारण उसे एक महीने तक सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी में वेंटिलेटर में रखना पड़ा था।
गांव में पोलियो ड्रॉप पिलाने भी कोई नहीं आता। ग्राम प्रधान के पति शिक्षक भगवान सिंह जैमियाल नामिक के बच्चों को पोलियो की ड्राप पिलाते हैं। नंदा देवी कन्या धन योजना के तहत दो पुत्रियों के जन्म पर मिलने वाली 5000 रुपये की आर्थिक सहायता भी यहां किसी को नहीं मिली।
खुद ही बिजली बनाते हैं लोग
2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने जूनियर हाईस्कूल का हाईस्कूल में उच्चीकरण किया, लेकिन शिक्षक, स्टाफ के पद सृजित नहीं किए। यहां तैनात एकमात्र सहायक अध्यापक जूनियर के साथ ही हाईस्कूल की कक्षाएं संचालित कर रहा है।
सड़क, स्वास्थ्य, उच्चशिक्षा, संचार सुविधा से महरूम इस इलाके में प्रधान के घर पर बीएसएनएल का सेटेलाइट फोन लगा है। कभी-कभार उससे ही बाहरी दुनिया में बात हो पाती है।
यहां बिजली परियोजना तो है मगर उसका संचालन गांव के लोगों को ही करना पड़ता है। आपदा के बाद 9 महीने तक बिजली गुल रही। ग्रामीणों को खुद ही इसकी मरम्मत करनी पड़ी।
आज भी यहां के लोग तीसरी दुनिया में रहते हैं। जहां तक कोई नहीं पहुंचता है।
पर अमर उजाला पहुंचता है यहां
यहां सरकारी अमला और इमदाद बेशक न पहुंचे मगर पाठकों का प्रिय अखबार अमर उजाला जरूर पहुंचता है। इससे लोग देश-प्रदेश और दुनिया की हलचलों से वाकिफ होते हैं।
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18 अप्रैल को अमर उजाला की टीम नामिक पहुंची तो कक्षा दो तक पढ़ी गांव की 71 वर्षीय उदिमा देवी 17 अप्रैल का अखबार पढ़ रही थीं।