इस सीमा से पहली बार कोई CM लड़ेगा चुनाव
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आजादी के 66 साल बीतने के बाद पहली दफा कोई मुख्यमंत्री चीन और नेपाल की सीमा से सटे अभावग्रस्त इलाके से चुनाव लड़ रहा है।
चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री के सामने दो-दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे इलाके से पलायन रोकना, सड़क, स्कूल, अस्पताल की सुविधा बढ़ाना चुनौती होगी।
वीवीआईपी सीट का दर्जा प्राप्त कर चुका धारचूला राज्य बनने से पहले डीडीहाट विधानसभा सीट का हिस्सा रहा है। 1985 से पहले इस सीट में कांग्रेस का दबदबा रहा। 1985 से 1995 तक डीडीहाट सीट में उक्रांद का कब्जा रहा। 1996 में भाजपा यह सीट जीती।
सीएम को रोक पाना आसान नहीं
राज्य बनने के बाद धारचूला अलग विधानसभा सीट बनी तो पहले दो चुनाव वनराजि समुदाय के निर्दलीय गगन रजवार ने जीते। 2012 में धारचूला से कांग्रेस के हरीश धामी विधायक चुने गए।
धामी ने 10 जून 2014 को अपने पद से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए धारचूला से चुनाव लड़ने का रास्ता साफ किया।
अभी विधानसभा उप चुनाव में 22 दिन का समय शेष है लेकिन मुख्यमंत्री को जीत से रोक पाना विपक्षियों के लिए आसान नहीं दिखाई देता। मुख्यमंत्री के धारचूला से विधायक बनने के बाद उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ होगा।
इन समस्याओं से जूझना होगा सीएम को
चौदांस घाटी के सिर्खा, सिर्दांग, रूंग, तीज्या, बाबला, माकम कैलास, कुरीला, सुनारसौंग, दारमा, व्यास घाटी के तमाम गांवों के साथ ही मुनस्यारी के नामिक, मिलम आदि क्षेत्र में आज तक सड़क नहीं पहुंच पाई है।
सड़क, अस्पताल, स्कूलों की सुविधा न होने के कारण चीन और नेपाल की सीमा से सटे धारचूला विधानसभा क्षेत्र के गांवों से पलायन हो रहा है।
हिमखोला के पूर्व प्रधान उमेद सिंह कहते हैं कि यह बात अत्यंत चिंतनीय है कि शिक्षा और रोजगार के लिए बच्चों और जवानों का पलायन हो रहा है। गांव में महिलाएं और बूढ़े, बुजुर्ग रह गए हैं।
खूबसूरत इलाके पर्यटकों की पहुंच से बाहर
धारचूला विधानसभा क्षेत्र में आदि कैलास, ऊं पर्वत, नारायण आश्रम के साथ ही पंचाचूली, हीरामणि, नामिक ग्लेशियर जैसे कई रमणीक क्षेत्र हैं लेकिन सुविधा न होने से यह इलाके पर्यटकों की पहुंच से बाहर हैं। इलाके के लोगों को पर्यटन का लाभ नहीं मिल रहा है।
करते रहते हैं चुनाव बहिष्कार
वर्ष 2012 में विकास के मुद्दे पर नामिक के लोगों ने विधानसभा चुनाव का बहिष्कार किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में धारचूला विधानसभा क्षेत्र के सुमदुंग, बादनीधार, जौलढूंगा में चुनाव बहिष्कार के चलते नाममात्र की वोटिंग हुई लेकिन फिर भी इन इलाकों के विकास का खाका खिंचता नहीं दिखता।
कब तक सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल के मुद्दे पर चुनाव बहिष्कार करेंगे, यह अहम सवाल है।