'पापा ने हमें बेटा बनाया, हमने धर्म निभाया'
उन आंखों में आंसू थे। आंसू सिर से पिता का साया छिन जाने के दर्द के। परिवार का सहारा खत्म होने के गम के। लेकिन इन आंसुओं के बीच कहीं चमक भी थी हौसले और जज्बे की।
हौसला कि अब अकेली रह गई मां को संभालना है। जज्बा कि पापा ने जो सपने देखे थे, उन्हें पूरा करना है। और आंसुओं को हरा जब यह जज्बा आगे बढ़ा तो बेटी होने की वजह से उनके कदम थमे नहीं।
बात हो रही है सर्कुलर रोड निवासी स्मिता और ज्योतिका बंसल की। उनके पिता रिटायर्ड प्रधानाचार्य किशोर कुमार बंसल (57) का लंबी बीमारी के बाद बुधवार को निधन हो गया।
रूढ़ियों, परंपराओं के विपरीत उन्होंने पिता के अंतिम संस्कार की क्रिया खुद निभाई। दोनों कहती हैं, ‘पापा ने हमें कभी बेटी नहीं समझा। अपना बेटा बनाया तो हमने भी अपना धर्म निभाया।’
पापा के सपनों को पूरा करना लक्ष्य
बंसल को कोई बेटा नहीं था केवल दो बेटियां हैं। लेकिन ताउम्र उन्होंने स्मिता और ज्योतिका को बेटों से कम नहीं समझा। पढ़ाई-लिखाई हो या कोई और मसला, पिता ने कभी बेटियों के कदम बांधने की कोशिश नहीं की।
बृहस्पतिवार को ज्योतिका ने पिता को मुखाग्नि दी और अब क्रिया पर बैठी हैं। कारमन स्कूल में 12वीं की छात्रा ज्योतिका ने बताया कि पापा हमेशा कहते थे कि मेरा छोटा बेटा आईपीएस अफसर बनेगा। अब उनका यह सपना पूरा करना है।
दूसरी ओर, बड़ी बेटी स्मिता पिता के निधन के बाद घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाने के लिए तैयार नजर आई। मेरठ से बीटेक कर रही स्मिता ने कहा कि पापा की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। लेकिन हम दोनों टूट जाते तो मां को कौन संभालता।
स्मिता ने कहा कि पापा उन्हें बेहतरीन इंजीनियर के तौर पर देखना चाहते थे। अब उनका लक्ष्य पापा के इस अरमान को पूरा करना है।
...तो लड़ पड़ते थे बंसल
रूंधे गले से ज्योतिका और स्मिता की मां सुषमा बंसल ने बताया कि कई बार लोग उन्हें और पति को कहते कि दो बेटियों के साथ एक बेटा होना भी जरूरी है।
बंसल ऐसा कहने वालों से झगड़ पड़ते। कहते मेरी बेटियां बेटे से कम नहीं। सुषमा ने बताया कि वह हमेशा कहते थे, मुझे मुखाग्नि मेरे दोनों बेटे देंगे। बंसल ने अपनी अंतिम इच्छा भी यही जाहिर की थी।
बेटियों को बचाने कूद पड़े थे आग में
पापा की याद करते हुए स्मिता एक वाकया बताते हुए फफक पड़ी। बताया कि एक बार वह, ज्योतिका और मां सुषमा शादी में गए थे। घर में पापा अकेले थे। रात ढाई बजे अचानक ड्राइंग रूम में आग लग गई। दोनों बेटियां वहीं सोती थीं।
गहरी नींद में सोए पापा ने धुआं देखा तो भूल गए कि बेटियां घर पर नहीं हैं। बच्चियों को बचाने के लिए वे आग में कूद गए। रोते हुए स्मिता ने बताया कि इस हादसे में उनके पापा का बायां पैर बुरी तरह जल गया। कुछ समय बाद इसी पैर पर पैरालिटिक अटैक पड़ा और आखिर इसे काटना पड़ा।
स्मिता ने कहा कि तब पापा उन्हें बचाने आग में कूदे थे, लेकिन किस्मत का खेल देखिए कि आज हमें उन्हें आग देनी पड़ी।