10वीं पास मीनाक्षी ने रची पांच करोड़ की साजिश
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मासूम सी दिखने वाली 20 साल की मीनाक्षी का दिमाग जुर्म की राह पर जमकर चला। देहरादून के हर्षित अपहरण कांड में वह हर चाल में सबसे आगे रही।
हर्षित को उठाने से लेकर फिरौती की रकम मांगने तक में उसका अहम रोल रहा। पकड़े जाने पर भी वह पुलिस को यह कहकर गुमराह करती रही कि छेड़छाड़ का सबक सिखाने के लिए हर्षित को उठाया था। मारपीट के बाद छोड़ दिया गया।
हर्षित अपहरण कांड में अब तक सामने आई कहानी के अनुसार दसवीं पास मीनाक्षी ही मास्टर माइंड की भूमिका में रही। अपहरण से पहले इंजीनियर एंकलेव में रेकी से लेकर हर्षित के अपहरण तक में उसका खास रोल रहा।
अक्सर नौकरी की चाह में हरिद्वार से दून आने के कारण वह भौगोलिक स्थिति से वाकिफ थी। पिता संजय बालियान के दिमाग में जब जुर्म का कीड़ा जागा तो बेटी और बेटे आशीष ने उसका साथ देने की हामी भरी।
इसके बाद साइट पर काम करने वाले सरनजीत को विश्वास में लिया गया। पांचवें अपहर्ता डेनियल से संजय की दोस्ती सीएमआई अस्पताल में बीवी की भर्ती के दौरान हुई थी।
अपहरण में इस्तेमाल की ब्वॉयफ्रेंड की कार
हर्षित को बेहोश करने के लिए डेनियल को साजिश में शामिल किया गया था। शिकार के रूप में राज्य निर्माण निगम के इंजीनियर के बेटे को चुना गया। अपहरण में इस्तेमाल करने के लिए मीनाक्षी ने अपने ब्वॉयफ्रेंड की कार को लिया। पांच दिन तक मीनाक्षी ने डेनियल के साथ रेकी की।
अपहरण वाले दिन भी हर्षित को रोककर मीनाक्षी ने सवाल किया कि अंग्रेजी वाले टीचर का मकान कहां है? उसने हर्षित से लिफ्ट मांगी और उसकी स्कूटी पर बैठ गई।
जीएमएस रोड के पास सुनसान में फोन करने के बहाने स्कूटी को रुकवाया। इसी बीच पीछे से आए मीनाक्षी के साथियों ने छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए हर्षित को कार में डाल लिया। डेनियल ने नशे का इंजेक्शन लगाकर हर्षित को बेहोश कर दिया।
यहां से हर्षित को कार से सीधे ठिकाने पर ले जाया गया। इस दौरान सरनजीत उसके साथ रहा। ट्रेन से फिरौती की रकम ले जाते समय हर्षित के पिता के साथ मीनाक्षी हर्रावाला में ट्रेन में सवार हुई।
हालांकि ट्रेन में सीओ सिटी मनोज कात्याल सादी वर्दी में गिरिश तायल के पास ही थे। ट्रेन में मोबाइल से मीनाक्षी तायल के लोकेशन की जानकारी लगातार साथियों को देती रही।
हर्षित को दिए थे 200 रुपए
फिरौती की रकम मिलने के बाद रिहाई के समय हर्षित को 200 रुपए दिए गए थे, ताकि वह घर पहुंच सके। मुक्त होने के बाद हर्षित ने अपनी मां के मोबाइल पर फोन किया, जो पिता के पास था। हर्षित के सकुशल घर पहुंच जाने के बाद पुलिस ने अपहर्ताओं पर अपना शिकंजा कस दिया।
साजिश सुनियोजित फिर भी बदल गया शिकार
राज्य निर्माण निगम के इंजीनियर के बेटे के बजाए मुजफ्फरनगर में तैनात बीएसएनएल अधिकारी के बेटे को उठाने की चूक कैसे हो गई? यह सवाल जरूर कचोट रहा है।
वह भी उस स्थिति में जब पांच दिन तक उसकी रेकी की गई। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि यदि अपहर्ता हर्षित के परिजनों से परिचित नहीं थे तो ट्रेन में मीनाक्षी ने उन्हें कैसे पहचान लिया।
ऐसे कई सवालों के जवाब साफ नहीं हो सके हैं। यह तो तय है कि अपहरण सुनियोजित था। इसके लिए बाकायदा बीस दिन से तानाबाना बुना जा रहा था।
संजय बालियान इस इंजीनियर की कार का कुछ दिन चालक रहा है। इस कारण घर की लोकेशन से भी वाकिफ था। ऐसे में शिकार को पहचानने में चूक कैसे हो गई?
हर्षित शनिवार को रुटीन में बाहर नहीं आया था। हर्षित तो दूसरी बार अचानक वहां पहुंचा था। रिचार्ज कराने के बाद एक बार तो वह घर पहुंच गया था, लेकिन रिचार्ज का एसएमएस नहीं आने पर बहन ने उसे दुकान पर भेजा था।
उसी समय हर्षित को अगवा किया गया। आरोपी और पीड़ित पक्ष दोनों का जुड़ाव मुजफ्फरनगर से है। अपहर्ताओं का बार-बार यह कहना कि गलती से हर्षित को उठाया गया है, गले नहीं उतर रहा है। इस चूक की सटीक वजह न तो पुलिस और न ही बदमाश बता सके। यह तो साफ होना चाहिए था कि चूक कहां से हुई।
पुलिस और परिजन दावा कर रहे है कि मीनाक्षी और हर्षित के बीच किसी तरह का कोई संपर्क नहीं था। घटना वाली रात ट्यूशन टीचर का घर दिखाने के बहाने मीनाक्षी हर्षित को ले गई थी।