जानिए कौन हैं भ्रष्टाचार के आरोपी मृत्युंजय मिश्रा और उनसे जुड़े 4 बड़े विवाद, हर सरकार के थे चहेते
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक मृत्युंजय और सौ अफसाने। कुछ ऐसी ही कहानी है आयुर्वेद विवि के निलंबित कुलसचिव डॉ. मृत्युंजय मिश्रा की। लेक्चरर पद पर तैनाती से लेकर आयुर्वेद विवि के कुलसचिव पद तक मिश्रा हर सरकार के चहेते और विवादित भी रहे।
वे जहां भी गए, विवाद उनका पीछा करते गए। वे इसे बड़े गर्व से स्वीकारते थे और कहते भी थे कि मैं क्या करूं, मेरा वीनस ही कुछ ऐसा है। दीगर बात यह भी है कि सोमवार के घटनाक्रम को छोड़ दें तो आज तक उनके खिलाफ कोई आरोप न तो साबित हो पाया और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई।
लेक्चरर के पद पर तैनाती के बाद से ही डॉ. मृत्युंजय मिश्रा तमाम वित्तीय अनियमितताओं और घपले-घोटालों को लेकर चर्चित रहे। सबसे पहले चकराता और त्यूणी महाविद्यालयों में प्राचार्य के दोहरे प्रभार से चर्चा में आने वाले मिश्रा एक ही शैक्षिक सत्र में दो-दो डिग्रियां हासिल करने को लेकर सवालों के घेरे में आए थे।
उसके बाद उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में 2007 में कुलसचिव के तौर पर नियम विरुद्ध नियुक्ति और उत्तर पुस्तिकाओं की खरीद से लेकर नियुक्तियों तक में गड़बडियां करने के आरोप लगे। इसी तरह आयुर्वेद विवि में भी उनका कार्यकाल विवादित रहा।
यहां भी उनकी नियुक्ति पर सवाल उठे। लेकिन वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए विवि एक्ट में संशोधन करवाने में कामयाब रहे। विवि में रहते उन पर तमाम अनियमितताओं व नियुक्तियों में गड़बड़ी के आरोप लगे।
मिश्रा जितने विवादित हुए, उनकी पहुंच बढ़ती चली गई। उन्हें अपर स्थानिक आयुक्त भी बनाया गया। लेकिन बाद में सचिवालय से संबद्ध भी किया गया। आज तक के विवादों में एक भी मामले में न तो उनके खिलाफ आरोप साबित हुए और न ही कोई कार्रवाई हुई। पूरे कार्यकाल में एक बार शासन में संबद्ध हुए। एक बार निलंबित हुए और अब विजिलेंस के हाथों गिरफ्तार हुए हैं।
तकनीकी विवि : उत्तर पुस्तिका खरीद सहित कई विवाद
वर्ष 2009 में तकनीकी विवि में हुई समूह ग की भर्ती परीक्षाओं पर विवाद पैदा हुआ। इसी साल जल विद्युत निगम में सहायक अभियंता और अवर अभियंता के पदों पर भर्ती परीक्षा में पारदर्शिता न बरतने के आरोप लगने के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई। इसी दौरान मेडिकल की प्रवेश परीक्षा उत्तराखंड प्री मेडिकल टेस्ट (यूपीएमटी) का आयोजन यूटीयू ने कराया। इसका रिजल्ट एक बार जारी करने के कुछ दिन बाद ही विवि ने रिवाइज कर दिया था। इस पर भी शासन ने चेताया कि भविष्य में एक ही बार रिजल्ट जारी होगा। यहां कुलसचिव के उनके कार्यकाल के अंतिम दिनों में उनके ऊपर 84 लाख रुपये की उत्तर पुस्तिका खरीद में घोटाले का आरोप लगा।
हालांकि बाद में कोई सबूत न मिलने के चलते यह आरोप साबित नहीं हो पाया। वर्ष 2010 में मिश्रा पर सरस्वती प्रेस देहरादून द्वारा उत्तर पुस्तिकाओं की आपूर्ति के क्रम में 50 लाख रुपये की धोखाधड़ी किए जाने के आरोप में रायपुर थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया था लेकिन बाद में पुख्ता सबूत न मिलने पर इस मामले में एफआर लगा दी गई थी। विवाद बढ़ने के बाद मृत्युंजय मिश्रा को वापस उनके मूल उच्च शिक्षा विभाग में भेज दिया गया। लेकिन वे दोबारा आयुर्वेद विवि में कुलसचिव बनने में कामयाब रहे।
आयुर्वेद विवि : भर्ती पर राजभवन से रहा टकराव
आयुर्वेद विवि में पहुंचने के बाद सबसे पहले मृत्युुंजय मिश्रा ने ऋषिकुल और गुरुकुल कॉलेजों को विवि का हिस्सा बनवाया। इसके बाद उनका कार्यकाल विवादों में आना शुरू हो गया। विवि में निर्माण से लेकर टेंडर और नियुक्तियों में वे विवादों में घिरे रहे।
विवि में करीब 200 पदों पर होने वाली भर्ती पर राजभवन ने रोक लगाई तो मिश्रा का टकराव सीधे राजभवन से हो गया। राजभवन ने सख्ती दिखाई तो शासन ने भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी। इसके बाद किसी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटाखटाया तो हाईकोर्ट ने परीक्षा आयोजित करा उसका परिणाम न्यायालय में जमा कराने को कहा। परीक्षा हो गई लेकिन भर्तियां नहीं हो पाई।
इसके बाद मिश्रा का विवाद तत्कालीन कुलपति प्रो. एसपी मिश्र के साथ हो गया। इस बीच एसपी मिश्र की जन्मतिथि गलत होने की बात खुली तो उन्हें यहां से जाना पड़ा। विवि के हर्रावाला स्थित मुख्य परिसर में हॉस्टल, कैंटीन, वैधशाला का टेंडर एक ही गुट को देने का भी आरोप लगा।
पीपीपी मोड पर चलने वाली वैधशाला के कर्मचारियों को भी गलत ढंग से विवि में अटैच करने की बात सामने आई। आयुष विभाग से होने वाली निरीक्षण में इन कर्मचारियों को विवि का कर्मचारी दिखाया गया। विवाद बढे़ तो सरकार ने मृत्युंजय मिश्रा को फिर विवि से हटा दिया। इसके बाद उनकी नई तैनाती दिल्ली में अपर स्थानिक आयुक्त के तौर पर की गई।
अपर स्थानिक आयुक्त : स्टिंग को लेकर हुआ विवाद
दिल्ली में मृत्युंजय मिश्रा के अपर स्थानिक आयुक्त पद पर तैनात रहते हुए ज्यादा विवाद तो नहीं हुए लेकिन हाल ही में सामने आए स्टिंग ऑपरेशन के मामले में उनका भी नाम उछला। स्टिंग में जो मुकदमा दर्ज कराया गया, उसमें मिश्रा आपराधिक साजिश के नामजद आरोपी हैं। हालांकि इस मामले में गिरफ्तारी पर फिलहाल हाईकोर्ट ने स्टे दिया हुआ है।
यह हैं ताजा विवाद
मृत्युंजय मिश्रा को अप्रैल 2018 में अपर स्थानिक आयुक्त पद से हटाकर दोबारा आयुर्वेद विवि में कुलसचिव पद पर तैनात किया गया। यहां पहुंचते ही उन्होंने प्रभारी कुलसचिव डॉ. राजेश कुमार को तत्काल पद से हटाने सहित कई आदेश जारी कर दिए। कुलपति तैनाती के दौरान उपलब्ध नहीं हुए तो मिश्रा ने खुद ही चार्ज ग्रहण कर लिया। लेकिन, वे एक दिन ही टिक पाए। विवादों के चलते उन्हें शासन में अटैच कर दिया गया। इसके बाद इस आदेश के खिलाफ मिश्रा हाईकोर्ट गए।
हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। नवंबर माह में मिश्रा इस आदेश की कॉपी लेकर सीधे विवि में चार्ज ग्रहण करने पहुंच गए। विवि परिसर का गेट बंद कर दिया गया। मिश्रा दिनभर गेट पर खड़े रहे और इसके बाद लौट गए। इसी दौरान कुलपति ने शासन को पत्र भेजकर कहा कि मिश्रा यहां पद पर रहते हुए विजिलेंस और एसआईटी की जांच प्रभावित कर सकते हैं। लिहाजा उन्हें निलंबित किया जाए। इस आधार पर शासन ने मिश्रा को आयुर्वेद विवि कुलसचिव पद से निलंबित कर दिया। फिलहाल मिश्रा निलंबित चल रहे थे और उनके खिलाफ विजिलेंस व एसआईटी जांच चल रही थी।
इसके अलावा, विवि में मई 2016 में 65 लाख रुपये के फर्नीचर और चिकित्सकीय उपकरणों की खरीद के मामले में सीजेएम कोर्ट ने मिश्रा सहित तीन लोगों पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए। अदालत ने विवि को फ र्नीचर और उपकरणों की आपूर्ति करने वाली फर्म के प्रोपराइटर के प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया था। आरोप है कि विवि के मुख्य परिसर में बीएएमएस की मान्यता के लिए सीसीआईएम के निरीक्षण के समय मौखिक आदेश पर ही यह सामान ले लिया गया था लेकिन भुगतान नहीं किया गया। इस मामले में कोर्ट के आदेश पर पुलिस हर्रावाला स्थित परिसर में मौजूद चिकित्सालय से सामान जब्त कर चुकी है। मामले में अभी पुलिस की कार्रवाई चल रही है।
हर सरकार में चहेते, हर सरकार में विवादित
मृत्युंजय मिश्रा को हर सरकार में चहेता माना जाता रहा है। हर सरकार में वह विवादित भी माने जाते रहे। बताते हैं कि अफसरों के बीच उनकी ऐसी पकड़ है कि जब भी कोई फाइल हिलती है तो उन्हें उसकी जानकारी मिल जाती है। शासन के कई बड़े अफसरों के साथ उनकी जान-पहचान भी काफी चर्चित रही।