थोड़ा तोल मोल के बोल: राजनीति में भाषा की गंदगी और सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत के बिगड़े बोल...पढ़ें ये खास लेख
उत्तराखंड विधानसभा के अंदर पूर्व मंत्री प्रेम चंद अग्रवाल के कहे एक शब्द ने पूरे राज्य में तूफान ला दिया। वहीं अब हरिद्वार के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुंह से निकला एक शब्द समाज के एक वर्ग को नागवार गुजर रहा है।
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ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोए, कबीर दास जी के आपा खोए का मतलब बिल्कुल स्पष्ट है मान और अहंकार का त्याग करके ऐसे शब्दों में अपनी बात रखें कि औरों के साथ-साथ स्वयं को भी खुशी मिले। नए दौर में बोल मीठे नहीं बिगड़ गए हैं। वचन कटु नहीं, अब अभद्र हो गए हैं।
लोग बोलते समय आपा खो रहे हैं और उनके आपा का अर्थ कबीर के दोहे को मुंह चिढ़ा रहा है। ऐसा ही इन दिनों देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति में भी दिखाई-सुनाई दे रहा है। शब्दों के बाण जहरबुझे हैं जो राजनीति की शुचिता को विषाक्त कर रहे हैं।
संसदीय लोकतंत्र में राजनीति ही सर्वोपरि है। अगर राजनीति में भाषा की गंदगी इसी तरह उछलती रही तो झक सफेद पोशाक वाले राजनेताओं पर लगने वाले दाग अच्छे नहीं लगेंगे। सत्तापक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ नेता शब्दों की मर्यादा को इसी तरह लांघते रहेंगे तो उनकी आने वाले पीढ़ी विरासत में ऐसा शब्दकोश पा जाएगी, जिससे संसदीय और असंसदीय भाषा का अंतर मिट जाएगा।
कह सकते हैं कि बदलते समाज में कोई भाषा की शुचिता का पालन नहीं कर रहा तो राजनेताओं से ही अपेक्षा क्यों करें। राजनेताओं से इसलिए क्योंकि वे समाज का रोल मॉडल हैं, उनकी कही बात समाज में नफरत और घृणा घोल सकती है और उनके समझाने का असर बड़े विवादों को भी शांत कर देता है।
प्रेम चंद अग्रवाल के कहे एक शब्द ने पूरे राज्य में ला दिया तूफान
राज्य में हाल के कुछ बयानों को देखें तो समाज पर सीधा असर डाल गए। उत्तराखंड विधानसभा के अंदर पूर्व मंत्री प्रेम चंद अग्रवाल के कहे एक शब्द ने पूरे राज्य में तूफान ला दिया। उनका अभद्र शब्द संसदीय कार्यवाही का हिस्सा भी नहीं है, लेकिन उन्हें इसी के चलते मंत्री पद त्यागने पर मजबूर होना पड़ा। उन्होंने अपने एक अभद्र शब्द को मिटाने के लिए राज्य के लोगों के सामने कई आत्मीय तर्क रखे और संवेदनाओं को छूने वाले शब्दों की झड़ी लगा दी, लेकिन अपने एक शब्द को छिपा नहीं सके।
पूर्व मुख्यमंत्री और धर्मनगरी हरिद्वार के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुंह से निकला एक शब्द समाज के एक वर्ग को नागवार गुजर रहा है। उनके कहने का अर्थ और भावना भले ही बड़ा शिकार करने की रही हो, लेकिन जिस अधिकारी के लिए उन्होंने अभद्र शब्द का इस्तेमाल किया, उसे सभ्य समाज कतई स्वीकार नहीं कर सकता। अधिकारी भ्रष्ट हो सकते हैं उनसे अच्छा कौन जान सकता है, लेकिन अधिकारी के लिए इस्तेमाल उनका शब्द समाज में जीरो टॉलरेंस है। एक अधिकारी से उनकी नाराजगी के एक शब्द ने एक जाति को नाराज कर दिया। उनके एक शब्द ने नौकरशाही और राजनेताओं के रिश्तों को भी तल्ख बना दिया।
शब्द बेलगाम रहे
कई सरकारों में मंत्री रहे हरक सिंह रावत भी उन नेताओं में शामिल हैं, जिनके शब्द बेलगाम रहे हैं। हाल ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के लिए उन्होंने तंजिया लहजे में जिस शब्द का इस्तेमाल किया, वह असहज करने वाला था। उनके परिवार का एक सदस्य भाजपा में है। हरक सिंह कहते भी हैं कि दोनों प्रमुख पार्टियों के नेता उनके घर आते रहे हैं ऐसे में उनका शब्द मीडिया की सुर्खियां तो बटोर सकता है, लेकिन घर में तैयार हो रही नई राजनीतिक पीढ़ी को रास नहीं आएगा। वहीं प्रेमचंद मामले में भाजपा अध्यक्ष का विपक्ष के नेताओं को सड़क छाप कह देना भी न्यायोचित नहीं हो सकता।
पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की कुर्सी भी उनके फटी जींस पर बयान के चलते गई। उनके संस्कार के तर्क नई पीढ़ी ने स्वीकार नहीं किया। पूर्व विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन भी पहाड़ को लेकर दिए विवादित बयान के बाद एक बार भाजपा से निष्कासित हो चुके। हाल ही चैंपियन और विधायक उमेश कुमार के घमासान में जो वीडियो वायरल हुए उनकी भाषा को सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। यह देवभूमि की प्रतिष्ठा को भी तार-तार करता है। वहीं राज्य के नेताओं के करीब एक दर्जन ऐसे वीडियो और ऑडियो वायरल हुए हैं, जिनमें प्रयोग किए गए शब्द और भाषा समाज को नामंजूर हैं।
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राजनीति में कटाक्ष और तंज कसने की परंपरा हमेशा रही है, लेकिन शब्द अभद्र और अश्लील नहीं होते थे। किसी राजनेता के मुंह से कटु वचन निकल भी गए तो माफी मांग ली या फिर ठीकरा मीडिया पर फोड़ दिया कि उनके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया। अब बचने की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं, कदम-कदम पर मीडिया है जो जस का तस दिखा और सुना रहा है, इसलिए तोल-मोल के बोलिए।