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Pauri Garhwal: हिमालयी आपदाओं को ध्यान में रखकर बनी इमारतें, इन खास तथ्यों को किया गया शामिल

Fri, 26 Sep 2025 12:46 PM IST
रेनू सकलानी मुकेश चंद्र आर्य, संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
मुकेश चंद्र आर्य, संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी Published by: रेनू सकलानी Updated Fri, 26 Sep 2025 12:46 PM IST
सार

पहाड़ों में बने पुराने मकान प्राकृतिक आपदाओं से काफी हद तक सुरक्षित रहे। इसके पीछे स्थल चयन (नदी, गदेरों से दूरी) से लेकर निर्माण सामग्री का खासा योगदान है। पर्वतीय क्षेत्रों में भवन निर्माण की शैली टिकाऊ के साथ ही प्राचीन कला और विज्ञान का बेजोड़ नमूना था। सीमांत क्षेत्रों के मकानों को जलवायु के अनुरूप बनाया जाता था।

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Buildings built with Himalayan disasters in mind pauri Garhwal Uttarakhand news
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

मजबूत निर्माण के लिए स्थापत्य शैली, टिकाऊ निर्माण सामग्री, मजबूत व लचीली निर्माण तकनीक का समावेश जरूरी है। जैसे कि केदारनाथ मंदिर हिमालय में बाढ़ के बावजूद सुरक्षित है। पौड़ी स्थित जीबी पंत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान घुड़दौड़ी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. सरीष चंद्रवंशी की मानें तो प्राचान दौर में निर्माण कार्य से उत्पन्न हुआ दबाव भूमि की वहन क्षमता से अधिक नहीं होता था।

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घरों के निर्माण का आकार सीमित था जबकि दो संरचनाओं के बीच की दूरी अधिक थी। वर्तमान में बड़े ढांचों (बहुमंजिला इमारतें) का निर्माण शुरू हुआ। कंक्रीट का घनत्व भी पहाड़ों में प्रयुक्त पारंपरिक निर्माण सामग्री से अधिक है। नतीजा पहाड़ों की ढीली मिट्टी पर अत्यधिक दबाव पड़ने लगा है।
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प्राचीन समय में इन तथ्यों को किया गया शामिल
-स्थापत्य शैली, निर्माण सामग्री, स्थान की वैज्ञानिकता को शामिल किया गया था।
-प्राचानी समय में नवदुर्गा, नागर, द्रविड़ और वेसर शैली जैसी पारंपरिक स्थापत्य शैलियां बहुत संतुलित और मजबूत थी।
-निर्माण सामग्री में ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, संगमरमर, चुना-गारा का प्रयोग होता था जो कि समय के साथ और भी मजबूत होती गई। जबकि उत्तराखंड/हिमालय क्षेत्र में सही प्रकार की लकड़ी जो दीमक व -आर्द्रता प्रतिरोधी का प्रयोग होता था।
-निर्माण तकनीकी, जिसमें पत्थरों को बिना सीमेंट के इंटरलॉक किया जाता था। जिससे भूकंप में लचीलापन रहता था और इमारत गिरती नहीं थी।
-केंद्र-सरेखण का -संतुलन, भारी गुंबदों या मंडपों को इस तरह रखा जाता था, जिससे पूरी इमारत संतुलित रहे।
-स्थान का चयन, वास्तु और भूगर्भीय अध्ययन के आधार पर होता था। मिट्टी की जांच, पानी की उपलब्धता व पर्यावरणीय कारकों पर विशेष कार्य होते थे।

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