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आपदा के बाद सरखेत गांव में ठहर गया वक्त, नहीं हुआ गांव में कोई विकास कार्य

Thu, 01 Aug 2019 02:28 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 01 Aug 2019 02:28 PM IST
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After the disaster no development work in dehradun sarkhet village
सरखेत गांव - फोटो : अमर उजाला

बांदल घाटी में बसे गांव सरखेत में वर्षों से वक्त ठहरा हुआ है। पांच साल पहले यहां आई बाढ़ के बाद गांव के हालत लगभग जस के तस हैं। न सड़क बनी और न अन्य विकास कार्य हुए। लोगों की तमाम मांगों को प्रशासन ने अनसुना कर दिया। मुआवजे के रूप में सरकार ने भी उनसे मजाक किया। करोड़ों की जमीन गंवा बैठे किसानों को चंद रुपयों का चेक थमा दिया गया। पांच साल पहले आई बाढ़ को याद कर सरखेत के लोग आज भी सिहर उठते हैं।...

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सरखेत के पूर्व प्रधान चमन दास के पास लगभग तीन बीघा जमीन थी। नदी किनारे पक्का मकान था। 15 अगस्त 2014 को बांदल नदी की बाढ़ में उनका सब कुछ बह गया। सरकार से मिला मुआवजा भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने में खत्म हो गया। अब हालात ये हैं कि चमन दास जंगल में झोंपड़ी बनाकर रहते हैं। यूं तो सर्किल रेट के आधार पर उनकी जमीन की कीमत लगभग दो करोड़ है, लेकिन मुआवजा मिला महज 2700 रुपये। मकान के बदले उन्हें एक लाख रुपये दिए गए। चमन सिंह बताते हैं कि यह पैसा सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने में ही खत्म हो गया।
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आज तक नहीं बन पाई सड़क
आपदा में तबाह हुआ मालदेवता सिल्ला क्यारा मोटर मार्ग का एक हिस्सा आज तक नहीं बन पाया है। मार्ग पर जगह जगह कार्य प्रगति पर है के बोर्ड लगे हैं, लेकिन काम कहीं नहीं दिखता। इस गांव की भूमि के सर्किल रेट भी इसी टूटे फूटे मार्ग के आधार पर तय होते हैं। दरअसल, दो साल पहले इस मार्ग का निर्माण शुरू हुआ था। लेकिन यहां के प्राकृतिक हालातों को देखकर ठेकेदार काम बीच में ही छोड़ भाग खड़ा हुआ।
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इन्वेस्ट पर सर्किल रेट का ‘ब्रेक’
प्रशासन सरखेत गांव से राजस्व जुटाना तो चाहता है लेकिन यहां विकास नहीं कराना चाहता। आपदा के बाद से ही यहां पर हर साल जमीन के सर्किल रेट में बढ़ोतरी की जा रही है। वर्तमान में सर्किल रेट 70 लाख रुपये बीघे से भी ज्यादा है। इसी वजह से यहां कोई निवेशक नहीं आता। सरखेत निवासी करण कोटियाल ने बताया कि आपदा के बाद से बहुत कम लोग खेती कर रहे हैं। उन्हें फिर बाढ़ आने का डर रहता है। वे अपनी जमीनें बेचकर शहर में कामधंधा शुरू करना चाहते हैं। लेकिन, सर्किल रेट ज्यादा होने से कोई यहां जमीन खरीदने को ही तैयार नहीं है। कुछ दिन पहले हरियाणा के एक निवेशक ने एक रिजॉर्ट बनाने की योजना बनाई थी। छह बीघा भूमि के लिए उसने लोगों को कुछ एडवांस भी दिया था। लेकिन सर्किल रेट का पता चलाते ही उसने हाथ खींच लिए।

चार सालों में नहीं हुई एक भी रजिस्ट्री
बीते चार सालों में सरखेत में एक भी रजिस्ट्री नहीं हुई है। ग्रामीणों ने प्रशासन को यहां के सर्किल रेट कम करने की मांग भी की थी। ग्रामीण गोविंद कोटवाल ने बताया कि वे लगातार इस मांग को उठा रहे हैं, लेकिन आज तक सुनवाई नहीं हो सकी है।


नदी पार 90 फीसदी कम हैं दाम
बांदल नदी के एक ओर सरखेत गांव है तो दूसरी ओर टिहरी का इलाका लगता है। टिहरी में इस जगह के सर्किल रेट प्रति हेक्टेयर के हिसाब से हैं। यहां का यदि हिसाब लगाएं तो दाम लगभग सात लाख रुपये प्रति बीघा हैं। ऐसे में नदी के उस पार तो खूब निवेश हो रहा है, लेकिन सरखेत के लोग वहीं के वहीं हैं। 

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