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लाखों कांवड़ियों का आश्रय तो घाट ही हैं
Updated Mon, 26 Jun 2017 10:43 PM IST
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कौशल सिखौला
हरिद्वार।
श्रावण मास के कांवड़ मेले के लिए प्रशासन व्यवस्थाएं करने में जुटा है। हालांकि कांवड़ियों को ठहराना पूरी तरह निजी क्षेत्र के जिम्मे है। गंगा मैया का सहारा न हो तो लाखों करोड़ों कांवड़ियों को ठहरने की जगह न मिले। गंगा मैया के घाटों पर प्रशासन की ओर से कोई व्यवस्था कांवड़ियों के लिए नहीं की जाती। अलबत्ता इन घाटों पर ही लाखों कांवड़िये अपनी रात बिताते हैं।
विभिन्न कुंभ मेलों के दौरान यहां गंगा घाटों का विस्तार होता जा रहा है। इस समय करीब मिलाकर 30 किलोमीटर लंबे घाट मौजूद हैं। यह सभी घाट पक्के हैं और यहां प्रकाश की व्यवस्था भी है। हरिद्वार के सभी आश्रय स्थल भर जाने के बाद गंगा के घाट कांवड़ियों का सहारा बनते हैं। सप्तसरोवर से पंतद्वीप होते हुए लालजी वाला, रोडीबेलवाला तथा कनखल के लंबे चौड़े घाट कांवड़ियों के काम आते हैं। विशेष रूप सें पंतद्वीप और रोडीबेलवाला मैदानों के घाटों पर सर्वाधिक भीड़ ठहरती है। इसके अलावा बैरागी द्वीप के घाटों पर डाक कांवड़िये विश्राम करते हैं। नीलधारा पर जहां-जहां घाट है वहां गंगा के दोनों ओर कांवड़ियों के विश्राम स्थल बनते हैं। हरिद्वार से मुरादनगर तक लगाए जाने वाले अधिकांश सेवा शिविर गंगा नहर के किनारे लगाए जाते हैं। इसी प्रकार चंडीघाट से बिजनौर तक जाने वाली नीलधारा के किनारे पर भी जगह-जगह सेवा शिविर लगते हैं। अफसोस की बात यह है कि इस पूरे क्षेत्र में बाजार तो खुल जाते हैं पर साफ सफाई का प्रबंध गंगा भरोसे है। रात के समय सफाई कर्मी घाटों और मैदानों का कूड़ा उठाकर उसी गंगा के हवाले कर देते है, जिससे कांवड़िये गंगाजल भरने आए हैं। ये घाट लाखों कांवड़ियों को आश्रय प्रदान कर प्रशासन का आधा जिम्मा उठाते हैं। गंगा पार के क्षेत्र ही नहीं गंगा की इस पार के घाट भी कांवड़ियों के लिए बहुत काम आते हैं। हरकी पैड़ी से गऊ घाट तक सुभाष घाट के लंबे चौड़े प्लेटफार्म तक करीब एक लाख कांवड़िये अपनी रात बिताकर इस घाट को विशाल विश्रामालय में बदल देते हैं।
उत्तरी हरिद्वार के सर्वानंद घाट, भूमाघाट, अग्रसैन घाट, पावनधाम घाट, ज्वालापुर स्थित विश्वकर्मा घाट, कबीर घाट, दुर्गा घाट, गणेश घाट, बिरला घाट, सीता घाट, रविदास घाट आदि भी लाखों कांवड़ियों के काम आते हैं। खुले आसमान के नीचे रात बिताने वाले कांवड़िये इन्हीं घाटों और मैदानों अपनी कांवड़ सजाते हैं और गरीब कांवड़िये बाजार से कच्चा सामान लेकर कांवड़ तैयार करते हैं। कांवड़ियों को गंगा मैया का बड़ा सहारा है। बस एक ही परेशानी है कि रात में यदि वर्षा हो जाए तो बेचारे बेवस कांवड़िये शहर की ओर भागकर दुकानों के शेड में रात बिताते हुए दिखाई पड़ते हैं। हालांकि पर्याप्त स्थान न होने से बहुत से कांवड़िये भीगते हुए ही रात गुजारते हैं।
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घाट और मैदान तो हैं पर न शौचालय न पेयजल
हरिद्वार (ब्यूरो)। कांवड़ मेले के दौरान लाखों कांवड़ियों के लिए गंगा के मैदान ही विशाल शौचालय बन जाते हैं। जिसे जहां जगह मिले वह रात के अंधेरे में निवृत हो जाते हैं। पानी उपलब्ध नहीं होने पर स्वच्छ होने के लिए गंगाजल का ही प्रयोग होता है। दुर्भाग्य देखिए कि इसी गंगा से कांवड़ भरना कांवड़ियों की मजबूरी है। प्रशासन की ओर से कुछ ही स्थानों पर लाखों कांवड़ियों के लिए टाट के आठ-दस शुष्क शौचालय बना दिए जाते हैं। यहां भी पानी का प्रबंध नहीं होता। कांवड़ियों की भीड़ देखते हुए हरिद्वार के विभिन्न घाटों और अनेक मैदानों में कम से कम 10 हजार अस्थायी शौचालय चाहिए। ऐसा प्रबंध मेला प्रशासन की ओर से कुंभ मेलों के अवसर पर किया जाता है। कांवड़ मेले के दौरान तो लाखों कांवड़ियों के लिए बामुश्किल तमाम 100 या 150 शौचालय भी पूरे क्षेत्र में बन पाते हैं। जहां तक अस्थायी पेयजल स्टैंड का सवाल है आठ-दस जगह ही पानी की व्यवस्था की जाती है। गर्मी के मौसम में चलने वाली कांवड़ यात्रा में कम से कम पांच हजार नलों की जरूरत लंबे चौड़े मेला मैदानों में पड़ती है। प्रशासन इसके लिए बजट न होने का बहाना कर दोनों हाथ ऊपर उठा देता है।
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हरिद्वार।
श्रावण मास के कांवड़ मेले के लिए प्रशासन व्यवस्थाएं करने में जुटा है। हालांकि कांवड़ियों को ठहराना पूरी तरह निजी क्षेत्र के जिम्मे है। गंगा मैया का सहारा न हो तो लाखों करोड़ों कांवड़ियों को ठहरने की जगह न मिले। गंगा मैया के घाटों पर प्रशासन की ओर से कोई व्यवस्था कांवड़ियों के लिए नहीं की जाती। अलबत्ता इन घाटों पर ही लाखों कांवड़िये अपनी रात बिताते हैं।
विभिन्न कुंभ मेलों के दौरान यहां गंगा घाटों का विस्तार होता जा रहा है। इस समय करीब मिलाकर 30 किलोमीटर लंबे घाट मौजूद हैं। यह सभी घाट पक्के हैं और यहां प्रकाश की व्यवस्था भी है। हरिद्वार के सभी आश्रय स्थल भर जाने के बाद गंगा के घाट कांवड़ियों का सहारा बनते हैं। सप्तसरोवर से पंतद्वीप होते हुए लालजी वाला, रोडीबेलवाला तथा कनखल के लंबे चौड़े घाट कांवड़ियों के काम आते हैं। विशेष रूप सें पंतद्वीप और रोडीबेलवाला मैदानों के घाटों पर सर्वाधिक भीड़ ठहरती है। इसके अलावा बैरागी द्वीप के घाटों पर डाक कांवड़िये विश्राम करते हैं। नीलधारा पर जहां-जहां घाट है वहां गंगा के दोनों ओर कांवड़ियों के विश्राम स्थल बनते हैं। हरिद्वार से मुरादनगर तक लगाए जाने वाले अधिकांश सेवा शिविर गंगा नहर के किनारे लगाए जाते हैं। इसी प्रकार चंडीघाट से बिजनौर तक जाने वाली नीलधारा के किनारे पर भी जगह-जगह सेवा शिविर लगते हैं। अफसोस की बात यह है कि इस पूरे क्षेत्र में बाजार तो खुल जाते हैं पर साफ सफाई का प्रबंध गंगा भरोसे है। रात के समय सफाई कर्मी घाटों और मैदानों का कूड़ा उठाकर उसी गंगा के हवाले कर देते है, जिससे कांवड़िये गंगाजल भरने आए हैं। ये घाट लाखों कांवड़ियों को आश्रय प्रदान कर प्रशासन का आधा जिम्मा उठाते हैं। गंगा पार के क्षेत्र ही नहीं गंगा की इस पार के घाट भी कांवड़ियों के लिए बहुत काम आते हैं। हरकी पैड़ी से गऊ घाट तक सुभाष घाट के लंबे चौड़े प्लेटफार्म तक करीब एक लाख कांवड़िये अपनी रात बिताकर इस घाट को विशाल विश्रामालय में बदल देते हैं।
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उत्तरी हरिद्वार के सर्वानंद घाट, भूमाघाट, अग्रसैन घाट, पावनधाम घाट, ज्वालापुर स्थित विश्वकर्मा घाट, कबीर घाट, दुर्गा घाट, गणेश घाट, बिरला घाट, सीता घाट, रविदास घाट आदि भी लाखों कांवड़ियों के काम आते हैं। खुले आसमान के नीचे रात बिताने वाले कांवड़िये इन्हीं घाटों और मैदानों अपनी कांवड़ सजाते हैं और गरीब कांवड़िये बाजार से कच्चा सामान लेकर कांवड़ तैयार करते हैं। कांवड़ियों को गंगा मैया का बड़ा सहारा है। बस एक ही परेशानी है कि रात में यदि वर्षा हो जाए तो बेचारे बेवस कांवड़िये शहर की ओर भागकर दुकानों के शेड में रात बिताते हुए दिखाई पड़ते हैं। हालांकि पर्याप्त स्थान न होने से बहुत से कांवड़िये भीगते हुए ही रात गुजारते हैं।
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घाट और मैदान तो हैं पर न शौचालय न पेयजल
हरिद्वार (ब्यूरो)। कांवड़ मेले के दौरान लाखों कांवड़ियों के लिए गंगा के मैदान ही विशाल शौचालय बन जाते हैं। जिसे जहां जगह मिले वह रात के अंधेरे में निवृत हो जाते हैं। पानी उपलब्ध नहीं होने पर स्वच्छ होने के लिए गंगाजल का ही प्रयोग होता है। दुर्भाग्य देखिए कि इसी गंगा से कांवड़ भरना कांवड़ियों की मजबूरी है। प्रशासन की ओर से कुछ ही स्थानों पर लाखों कांवड़ियों के लिए टाट के आठ-दस शुष्क शौचालय बना दिए जाते हैं। यहां भी पानी का प्रबंध नहीं होता। कांवड़ियों की भीड़ देखते हुए हरिद्वार के विभिन्न घाटों और अनेक मैदानों में कम से कम 10 हजार अस्थायी शौचालय चाहिए। ऐसा प्रबंध मेला प्रशासन की ओर से कुंभ मेलों के अवसर पर किया जाता है। कांवड़ मेले के दौरान तो लाखों कांवड़ियों के लिए बामुश्किल तमाम 100 या 150 शौचालय भी पूरे क्षेत्र में बन पाते हैं। जहां तक अस्थायी पेयजल स्टैंड का सवाल है आठ-दस जगह ही पानी की व्यवस्था की जाती है। गर्मी के मौसम में चलने वाली कांवड़ यात्रा में कम से कम पांच हजार नलों की जरूरत लंबे चौड़े मेला मैदानों में पड़ती है। प्रशासन इसके लिए बजट न होने का बहाना कर दोनों हाथ ऊपर उठा देता है।