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लोगों ने लिया झूला, चरखी का आनंद
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ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर
महाशिवरात्रि पर शुरू हुए बाड़वाला मेले के दूसरे दिन मंगलवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण मेले का लुत्फ उठाने पहुंचे। ग्रामीणों ने खरीदारी करने के साथ ही झूला और चरखी का आनंद लिया। मेले को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला।
वहीं, दूरदराज के क्षेत्रों से आई महिलाओं ने दैनिक उपयोग की वस्तुओं के साथ शृंगार की सामान खरीदा। क्षेत्र के पर्वतीय अंचलों में लंबे समय से मेलों के आयोजन की परंपरा रही है। यहां लगने वाले मेले मौज-मस्ती और खरीदारी करने तक ही सीमित नहीं रहते। बल्कि, इन मेलों का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी होता है। लंबे समय से मेले सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का माध्यम भी रहे हैं। हालांकि, बदलते दौर में मेलों का स्वरूप भी बदला है। बाड़वाला शिव मंदिर के समीप लगने वाला महाशिवरात्रि मेला कुछ समय पूर्व तक रिश्तों को जोड़ने के लिए विख्यात था। बाताया जाता है कि यहां क्षेत्रीय युवा अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनकर मंदिर में शादी करते थे। बदलते दौर में इस परंपरा में कुछ बदलाव आया है, लेकिन अभी भी ग्रामीण परिवेश के लोग मेले में एक दूसरे से मेलजोल और आपसी सौहार्द बढ़ाते नजर आ जाते हैं। मंगलवार को मेले में उमड़ी ग्रामीण महिला, पुरुषों और बच्चों की भीड़ ने जमकर खरीदारी की। बच्चों और महिलाओं ने झूले और चरखी का आनंद लेने के साथ ही चाट, चाऊमीन का भी लुत्फ उठाया।
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महाशिवरात्रि पर शुरू हुए बाड़वाला मेले के दूसरे दिन मंगलवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण मेले का लुत्फ उठाने पहुंचे। ग्रामीणों ने खरीदारी करने के साथ ही झूला और चरखी का आनंद लिया। मेले को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला।
वहीं, दूरदराज के क्षेत्रों से आई महिलाओं ने दैनिक उपयोग की वस्तुओं के साथ शृंगार की सामान खरीदा। क्षेत्र के पर्वतीय अंचलों में लंबे समय से मेलों के आयोजन की परंपरा रही है। यहां लगने वाले मेले मौज-मस्ती और खरीदारी करने तक ही सीमित नहीं रहते। बल्कि, इन मेलों का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी होता है। लंबे समय से मेले सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का माध्यम भी रहे हैं। हालांकि, बदलते दौर में मेलों का स्वरूप भी बदला है। बाड़वाला शिव मंदिर के समीप लगने वाला महाशिवरात्रि मेला कुछ समय पूर्व तक रिश्तों को जोड़ने के लिए विख्यात था। बाताया जाता है कि यहां क्षेत्रीय युवा अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनकर मंदिर में शादी करते थे। बदलते दौर में इस परंपरा में कुछ बदलाव आया है, लेकिन अभी भी ग्रामीण परिवेश के लोग मेले में एक दूसरे से मेलजोल और आपसी सौहार्द बढ़ाते नजर आ जाते हैं। मंगलवार को मेले में उमड़ी ग्रामीण महिला, पुरुषों और बच्चों की भीड़ ने जमकर खरीदारी की। बच्चों और महिलाओं ने झूले और चरखी का आनंद लेने के साथ ही चाट, चाऊमीन का भी लुत्फ उठाया।
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