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दिवाली के अगले दिन कांडा में लगेगा मंजूघोष मेला
Updated Tue, 06 Nov 2018 09:32 PM IST
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श्रीनगर। विकासखंड कोट के कांडा स्थित मंजूघोषेश्वर महादेव मंदिर में दिवाली के अगले दिन (8 नवंबर) से दो दिवसीय मंजूघोष मेला शुरू होगा। परंपरानुसार 8 नवंबर को छोटा कांडा और 9 नवंबर को बड़ा कांडा मेला लगेगा।
श्रीनगर से करीब 13 किलोमीटर दूर कांडा में हर साल दिवाली के दूसरे दिन दो दिवसीय (बड़ा व छोटा कांडा) मंजूघोष मेला लगता है। कांडा गांव में मंजूघोष, महाकाली व मंजूदेवी मंदिर स्थित हैं। इस मेले में दूर दराज से श्रद्धालु निशाण लेकर पहुंचते हैं। मंजूघोष मेला कांडा मेला नाम से प्रसिद्ध है। पहले यहां पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी, लेकिन डेढ़ दशक पहले यह प्रथा बंद हो गई। अब यहां केवल निशाण (देवताओं के प्रतीक चिन्ह) चढ़ते हैं।
मंजूघोष महादेव मंदिर कामदाह डांडा पर स्थित है। शिव पुराण के अनुसार इस पर्वत पर भगवान शंकर ने घोर तपस्या की थी। कामदेव ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए फूलों के वाण चलाकर उनके अंदर कामशक्ति को जागृत किया था। इसके बाद भगवान शंकर ने क्रोधित होकर कामदेव को भष्म कर दिया। तबसे इस पर्वत को कामदाह पर्वत कहा जाता है। जो कालांतर में कांडा हो गया। वहीं एक और अन्य कथा प्रचलित है कि मंजू नाम की एक अप्सरा ने शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी। मंजू पर श्रीनगर का राजा कोलासुर मोहित हो गया। जब वह अपने मकसद में सफल नहीं हुआ, तो उसने भैंस का रुप धारण कर ग्रामीणों पर हमला कर दिया। मंजूदेवी को यह सहन नहीं हुआ। उसने महाकाली का रुप धारण कर कोलासुर का वध कर दिया। तब से कांडा मेला मनाया जाता है।
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श्रीनगर से करीब 13 किलोमीटर दूर कांडा में हर साल दिवाली के दूसरे दिन दो दिवसीय (बड़ा व छोटा कांडा) मंजूघोष मेला लगता है। कांडा गांव में मंजूघोष, महाकाली व मंजूदेवी मंदिर स्थित हैं। इस मेले में दूर दराज से श्रद्धालु निशाण लेकर पहुंचते हैं। मंजूघोष मेला कांडा मेला नाम से प्रसिद्ध है। पहले यहां पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी, लेकिन डेढ़ दशक पहले यह प्रथा बंद हो गई। अब यहां केवल निशाण (देवताओं के प्रतीक चिन्ह) चढ़ते हैं।
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मंजूघोष महादेव मंदिर कामदाह डांडा पर स्थित है। शिव पुराण के अनुसार इस पर्वत पर भगवान शंकर ने घोर तपस्या की थी। कामदेव ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए फूलों के वाण चलाकर उनके अंदर कामशक्ति को जागृत किया था। इसके बाद भगवान शंकर ने क्रोधित होकर कामदेव को भष्म कर दिया। तबसे इस पर्वत को कामदाह पर्वत कहा जाता है। जो कालांतर में कांडा हो गया। वहीं एक और अन्य कथा प्रचलित है कि मंजू नाम की एक अप्सरा ने शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी। मंजू पर श्रीनगर का राजा कोलासुर मोहित हो गया। जब वह अपने मकसद में सफल नहीं हुआ, तो उसने भैंस का रुप धारण कर ग्रामीणों पर हमला कर दिया। मंजूदेवी को यह सहन नहीं हुआ। उसने महाकाली का रुप धारण कर कोलासुर का वध कर दिया। तब से कांडा मेला मनाया जाता है।
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