{"_id":"5bc618ccbdec22695c1f5055","slug":"15397091026-karnpryag-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी तक पहुंच रही है घेस की जड़ी बूटी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी तक पहुंच रही है घेस की जड़ी बूटी
Updated Tue, 16 Oct 2018 10:33 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
देवाल। चमोली जिले के घेस गांव में उत्पादित जड़ी-बूटी आज अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी तक पहुंच रही है। इनका प्रयोग दवाइयों के बनाने में हो रहा है। घेस में कुटकी, कूट, अतीस, जटामासी सहित कई प्रकार की जड़ी-बूटी का बड़े रूप में उत्पादन किया जाता है, जिस कारण घेस गांव राज्य का प्रथम जड़ी-बूटी उत्पादन गांव बन गया है। किसान इसकी खेती से प्रति वर्ष लाखों की आमदनी कर रहे हैं।
घेस गांव के किसानों ने अपनी पारंपरिक खेती से हटकर जड़ी-बूटी का कृषिकरण किया और आज यहां 300 से अधिक परिवार विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूूटी की खेती करते हैं। वर्ष 2001 से यहां पर जड़ी-बूटी की खेती शुरू की गई। ग्रामीणों को गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर के उच्च शिखरीय पादप केंद्र और जड़ी बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर की ओर से प्रशिक्षण और पौध दिए गए। ग्रामीणों ने इनका उत्पादन किया और वर्ष 2005 में पहली बार दिल्ली और रामनगर की कंपनियों को कुटकी बेची। बेहतर परिणाम मिलने पर ग्रामीणों ने अतीस, कूट और गंदरायण की खेती की। काफी मात्रा में जड़ी-बूटी का उत्पादन होने पर देश-विदेश के व्यापारी यहां पहुंच कर हैप्रेक और जड़ी बूटी शोध संस्थान के माध्यम से किसानों से इसे खरीद रहे हैं। घेस के किसान केशर बिष्ट ने बताया कि वर्ष 2001 में गांव के 5 लोगों ने जड़ी-बूटी के उत्पादन की शुरुआत की। आज 300 से अधिक परिवार इसकी खेती कर रहे हैं। जड़ी-बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक प्रो. सीपी कुनियाल ने बताया कि जड़ी-बूटी संस्थान की ओर से किसानों को नर्सरी, कलेक्शन आदि के लिए सहायता दी गई है। वर्ष 2015 में 4 लाख, 2016 में 4.5 लाख, वर्ष 2017 में 12 लाख की सहायता दी गई है। उत्पादित जड़ी-बूटी को रामनगर, हल्द्वानी के साथ अमेरिका, जर्मनी और इंग्लैंड के व्यापारी को भी बेचा जा रहा है। जड़ी-बूटी का उपयोग जीवन रक्षक दवाईयां बनाने में प्रयोग किया जाता है। उच्च शिखरीय पादप केंद्र श्रीनगर के वैज्ञानिक डा. विजय कांत पुरोहित का कहना है कि घेस गांव में कई प्रकार की जड़ी-बूटी का उत्पादन किया जाता है। पादप केंद्र की ओर से किसानों को सहायता और मार्ग दर्शन दिया जाता है।
घेस गांव के किसानों ने अपनी पारंपरिक खेती से हटकर जड़ी-बूटी का कृषिकरण किया और आज यहां 300 से अधिक परिवार विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूूटी की खेती करते हैं। वर्ष 2001 से यहां पर जड़ी-बूटी की खेती शुरू की गई। ग्रामीणों को गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर के उच्च शिखरीय पादप केंद्र और जड़ी बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर की ओर से प्रशिक्षण और पौध दिए गए। ग्रामीणों ने इनका उत्पादन किया और वर्ष 2005 में पहली बार दिल्ली और रामनगर की कंपनियों को कुटकी बेची। बेहतर परिणाम मिलने पर ग्रामीणों ने अतीस, कूट और गंदरायण की खेती की। काफी मात्रा में जड़ी-बूटी का उत्पादन होने पर देश-विदेश के व्यापारी यहां पहुंच कर हैप्रेक और जड़ी बूटी शोध संस्थान के माध्यम से किसानों से इसे खरीद रहे हैं। घेस के किसान केशर बिष्ट ने बताया कि वर्ष 2001 में गांव के 5 लोगों ने जड़ी-बूटी के उत्पादन की शुरुआत की। आज 300 से अधिक परिवार इसकी खेती कर रहे हैं। जड़ी-बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक प्रो. सीपी कुनियाल ने बताया कि जड़ी-बूटी संस्थान की ओर से किसानों को नर्सरी, कलेक्शन आदि के लिए सहायता दी गई है। वर्ष 2015 में 4 लाख, 2016 में 4.5 लाख, वर्ष 2017 में 12 लाख की सहायता दी गई है। उत्पादित जड़ी-बूटी को रामनगर, हल्द्वानी के साथ अमेरिका, जर्मनी और इंग्लैंड के व्यापारी को भी बेचा जा रहा है। जड़ी-बूटी का उपयोग जीवन रक्षक दवाईयां बनाने में प्रयोग किया जाता है। उच्च शिखरीय पादप केंद्र श्रीनगर के वैज्ञानिक डा. विजय कांत पुरोहित का कहना है कि घेस गांव में कई प्रकार की जड़ी-बूटी का उत्पादन किया जाता है। पादप केंद्र की ओर से किसानों को सहायता और मार्ग दर्शन दिया जाता है।
विज्ञापन