{"_id":"5b6b24e64f1c1b923e8b5d95","slug":"15337484467-karnpryag-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बेनीताल की वादियों में आज भी मौजूद है बाबा के आंदोलन की आहट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बेनीताल की वादियों में आज भी मौजूद है बाबा के आंदोलन की आहट
Updated Wed, 08 Aug 2018 10:44 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
कर्णप्रयाग। बेनीताल को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित करने और गैरसैंण को प्रदेश की राजधानी बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी की मांग आज तक पूरी नहीं हो पाई। बाबा की स्मृति में बेनीताल में स्मारक और नैनीताल हाईवे से बेनीताल के लिए जाने वाले मोटर मार्ग पर स्मृति द्वार बनाकर इतिश्री कर ली गई। सरकार उन्हें अब याद करे या न करे लेकिन बेनीताल और कर्णप्रयाग के लोग उनकी याद में मेले का आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
वर्ष 1993 में राज्य आंदोलन के लिए सेना की नौकरी छोड़ने वाले मोहन सिंह पौड़ी जिले के बठोली गांव के रहने वाले थे। 2 जुलाई 2004 से बेनीताल में आंदोलन शुरू करने वाले मोहन सिंह ने राज्य की विभिन्न समस्याओं के लिए करीब नौ से अधिक बार आंदोलन किया। इसके लिए मोहन सिंह को बाबा की उपाधि मिली। दसवीं बार बेनीताल के टोपरी उड्यार में बेनीताल को पर्यटक स्थल घोषित करने और गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग के लिए बाबा भूखहड़ताल पर बैठे थे। बाबा मोहन उत्तरखंडी ने कहा था कि राज्य आंदोलन जिस भावना के लिए हुआ, वह भावना गैरसैंण में बसी है। मांग के समर्थन में 37 दिनों तक भूख हड़ताल के बाद आठ अगस्त 2004 को प्रशासन ने बाबा मोहन उत्तराखंडी को उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया, लेकिन अस्पताल में बाबा की मौत हो गई। नौ अगस्त को यहां तेज आंदोलन हुआ और कई दिनों तक गैरसैंण, बेनीताल और बाबा की शहादत पर आंदोलन होते रहे, लेकिन बाबा की मांग सरकार की फाइलों से बाहर नहीं निकली। अभी तक न गैरसैंण राजधानी बनी और न बेनीताल पर्यटक स्थल, लेकिन बाबा की शहादत पर यहां ग्रामीण स्मृति मेले का आयोजन कर बाबा को श्रद्धांजलि देते हैं। मेला समिति के अध्यक्ष बीरेंद्र मिंगवाल कहते हैं कि बाबा के आंदोलन की आहट आज भी बेनीताल की वादियों में मौजूद है।
इंसेट
मेला आज, तैयारियां पूरी
कर्णप्रयाग। बाबा मोहन उत्तराखंडी की स्मृति में होने वाला एक दिवसीय स्मृति मेले का आगाज बृहस्पतिवार (आज) को होगा। मेला समिति के राकेश कोटियाल ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बाबा मोहन उत्तराखंडी के शहीद स्मारक पर श्रद्घाजंलि सभा होने के साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। बताया कि मेले का उद्देश्य बेनीताल की ओर पर्यटकों और सरकार की नजरों के सामने रखना है।
वर्ष 1993 में राज्य आंदोलन के लिए सेना की नौकरी छोड़ने वाले मोहन सिंह पौड़ी जिले के बठोली गांव के रहने वाले थे। 2 जुलाई 2004 से बेनीताल में आंदोलन शुरू करने वाले मोहन सिंह ने राज्य की विभिन्न समस्याओं के लिए करीब नौ से अधिक बार आंदोलन किया। इसके लिए मोहन सिंह को बाबा की उपाधि मिली। दसवीं बार बेनीताल के टोपरी उड्यार में बेनीताल को पर्यटक स्थल घोषित करने और गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग के लिए बाबा भूखहड़ताल पर बैठे थे। बाबा मोहन उत्तरखंडी ने कहा था कि राज्य आंदोलन जिस भावना के लिए हुआ, वह भावना गैरसैंण में बसी है। मांग के समर्थन में 37 दिनों तक भूख हड़ताल के बाद आठ अगस्त 2004 को प्रशासन ने बाबा मोहन उत्तराखंडी को उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया, लेकिन अस्पताल में बाबा की मौत हो गई। नौ अगस्त को यहां तेज आंदोलन हुआ और कई दिनों तक गैरसैंण, बेनीताल और बाबा की शहादत पर आंदोलन होते रहे, लेकिन बाबा की मांग सरकार की फाइलों से बाहर नहीं निकली। अभी तक न गैरसैंण राजधानी बनी और न बेनीताल पर्यटक स्थल, लेकिन बाबा की शहादत पर यहां ग्रामीण स्मृति मेले का आयोजन कर बाबा को श्रद्धांजलि देते हैं। मेला समिति के अध्यक्ष बीरेंद्र मिंगवाल कहते हैं कि बाबा के आंदोलन की आहट आज भी बेनीताल की वादियों में मौजूद है।
विज्ञापन
इंसेट
मेला आज, तैयारियां पूरी
कर्णप्रयाग। बाबा मोहन उत्तराखंडी की स्मृति में होने वाला एक दिवसीय स्मृति मेले का आगाज बृहस्पतिवार (आज) को होगा। मेला समिति के राकेश कोटियाल ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बाबा मोहन उत्तराखंडी के शहीद स्मारक पर श्रद्घाजंलि सभा होने के साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। बताया कि मेले का उद्देश्य बेनीताल की ओर पर्यटकों और सरकार की नजरों के सामने रखना है।
विज्ञापन