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पोलियोग्रस्त होने के बावजूद बनी नेशनल चैंपियन

Thu, 19 Jul 2018 01:56 AM IST
Updated Thu, 19 Jul 2018 01:56 AM IST
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पोलियोग्रस्त होने के बावजूद बनी नेशनल चैंपियन
ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश।
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तीर्थनगरी की होनहार दिव्यांग खिलाड़ी नीरजा गोयल ने नेशनल पैरा बैडमिंटन प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतकर उत्तराखंड का नाम रोशन किया। बचपन से ही पोलियोग्रस्त नीरजा ने जीवन के हर-कदम पर कठिन परिस्थितियों का सामना किया। इनमें पारिवारिक से लेकर व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक उनके समक्ष हर कदम पर चुनौतियां ही चुनौतियां थीं, मगर उन्होंने कभी हार नहीं मानी और चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया। नीरजा ने बताया कि ऋषिकेश मुख्य बाजार में उनकी बर्तन की दुकान है, जहां वह अपनी मां, बहन और भाई के साथ रहती हैं।
जीवन में एक दौर ऐसा भी आया कि जब उनके पिता घर छोड़कर चले गए और परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कांधों पर आ गई। पारिवारिक भरण पोषण के लिए भी आर्थिक दिक्कतें आने लगी। तब उनकी उम्र महज 12 साल थी, लेकिन ऐसे दौर में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और परिस्थितियों का डटकर सामना करते हुए आगे बढ़ती रहीं। बकौल नीरजा जीवन संघर्ष के फलित से आज वह बहुत खुश हैं। परिवार के पास रहने के लिए छत, भरण पोषण की मुकम्मल व्यवस्था और समाज में खेल के क्षेत्र में प्रदर्शन से मिला सम्मान सब कुछ है।
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स्पोर्ट्स टीचर व प्रेरक के सिर बांधा कामयाबी का सेहरा
दिव्यांग खिलाड़ी नीरजा ने अपनी इस कामयाबी का श्रेय श्री भरत मंदिर इंटर कॉलेज के स्पोर्ट्स शिक्षक व अपने कोच जितेंद्र बिष्ट को देती हैं। बताया कि स्पोर्ट्स शिक्षक बिष्ट ने उन्हें विद्यालय के परशुराम सभागार में खेल का प्रशिक्षण दिया। दिव्यांगता की वजह से उनकी जिंदगी घर व दुकान तक ही सीमित थी, लेकिन एथलीट प्लेयर वरुण जैन ने उन्हें जीने का नया नजरिया दिया। नीरजा ने बताया कि उनकी खेल में अधिक चिलचस्पी नहीं थी। उन्हें इसके लिए नेशनल पैरा चैंपियनशिप विजेता वरुण ने प्रेरित ही नहीं किया बल्कि बैडमिंटन का प्रशिक्षण भी दिया।
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बहन ने दी हर कदम पर ताकत
नीरजा ने बताया कि उनकी सफर की साथी रही छोटी बहन नुपूर का उन्हें हर कदम पर साथ मिला। वह नीरजा को हर जगह ले जाती हैं और उन्हें कभी महसूस नहीं होने देतीं कि उनके जीवन में कोई दिक्कत है। नीरजा ने अपनी बहन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया।


पैरा स्पोर्ट्स कैंप में मिला आगे बढ़ने का अवसर
नीरजा ने बताया कि जब वह अपनी बहन को बैडमिंटन खेलते हुए देखती थीं, तो सोचती कि यह खेल उनके लिए नहीं है। मगर वर्ष 2016 में ऋषिकेश स्थित अवधूत आश्रम में आयोजित पैरा स्पोर्ट्स कैंप में पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन के सेक्रेटरी प्रेम कुमार ने उन्हें बैडमिंटन, वॉलीबाल और अन्य खेलों के प्रति प्रोत्साहित किया और ट्राय भी कराया। बताया कि खेलते हुए एक बार उनके कंधे का मांस फट गया और कुछ समय बाद वह चिकन गुनिया से ग्रस्त हो गईं, तब चिकित्सकों ने उन्हें खेलने से सख्त मना कर दिया था। मगर उनका हौसला फिर भी कम नहीं हुआ और वह खेलती रही। जिसके बाद उन्होंने बैडमिंटन में पदक हासिल करने के बाद जयपुर में आयोजित नेशनल पैरा सिटिंग वॉलीबाल में ब्रांज मैडल जीता।
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