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पलायन का दर्द : 180 में से रह गया एक परिवार
Updated Wed, 25 Apr 2018 02:24 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला,ऋषिकेश।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि अलग राज्य बनने के बावजूद उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिए सरकार सिर्फ हवा-हवाई बातें कर रही है। राजधानी से 85 व योगनगरी ऋषिकेश से महज 35 किलोमीटर दूर विधानसभा यमकेश्वर के ग्रामसभा बैरागढ़ के सिंदूड़ी गांव से दस साल में 180 में से 179 परिवार पलायन कर चुके हैं। कभी अपनी सुंदरता से सबको आकर्षित करने वाला सिंदूड़ी गांव आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। करीब बीस साल पहले सिंदूड़ी गांव ग्रामसभा हुआ करती थी। राज्य में सत्ताधारी दलों द्वारा गांव में स्कूल, रोजगार, सड़क, पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई, जिसके कारण 179 परिवार अपनी जन्मभूमि को छोड़कर चले गए। आज गांव में केवल एक परिवार ही रह गया है। आलम यह है कि गांव में परिवार के लोगों के साथ बातचीत करने वाला भी कोई नजर नहीं आता है। समाजसेवी भूपेंद्र राणा ने बताया कुछ साल पहले जिन घरों में त्यौहारों में खुशी के माहौल में बच्चों की किलकारियां गूंजा करती थी आज गांव के सभी घर खंडहरों में तब्दील हो गए हैं। कभी हजारों की संख्या में सिंदूड़ी गांव के लोग एक दूसरे के सुख-दुख को मिलकर बांटा करते थे, लेकिन सरकारों की उदासीनता के चलते आज सिंदूड़ी गांव में केवल एक परिवार शेष रह गया है। ग्राम प्रधान अरुण जुगरान ने बताया पूरे गांव में केवल एक परिवार है, जिसमें एक महिला व उसका बेटा है। बताया महिला किसी दूसरे गांव में भोजन माता का कार्य करती है।
सुविधाएं मिले तो क्यों नहीं लौटेंगे परिवार
सिंदूड़ी गांव जैसे प्रदेश के विभिन्न गांवों से पलायन कर चुके लोगों की फिर से रोजगार, शिक्षा, सड़क, पानी व उच्च चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराकर वापसी हो सकती है। सिंदूड़ी गांव से अधिकांश लोगों ने देहरादून, दिल्ली, मुंबई आदि नगरों में रोजगार व शिक्षा के लिए पलायन किया है।
इनकी सुनिए
पहाड़ों के गांवों से आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। एकत्रित किए गए आंकड़े राज्य सरकार को जल्द भेज दिए जाएंगे। उसके बाद सरकार द्वारा पलायन पर अंकुश लगाने की योजना पर कार्य किया जाएगा।
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-- एसएस नेगी, उपाध्यक्ष ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग।
सिंदूड़ी गांव में कुछ साल पहले करीब 180 परिवार हुआ करते थे, लेकिन मूलभूत सुविधाएं के अभाव में आज गांव में महज एक परिवार ही रह गया है। विधायक व जिम्मेदार अधिकारियों से गांव में मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने के संबंध में कई बार गुहार लगाई जा चुकी है। लेकिन ग्रामीणों की समस्याओं को लगातार अनदेखा किया जा रहा है।
- अरुण जुगरान, प्रधान ग्रामसभा बैरागढ़।
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इसे विडंबना ही कहेंगे कि अलग राज्य बनने के बावजूद उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिए सरकार सिर्फ हवा-हवाई बातें कर रही है। राजधानी से 85 व योगनगरी ऋषिकेश से महज 35 किलोमीटर दूर विधानसभा यमकेश्वर के ग्रामसभा बैरागढ़ के सिंदूड़ी गांव से दस साल में 180 में से 179 परिवार पलायन कर चुके हैं। कभी अपनी सुंदरता से सबको आकर्षित करने वाला सिंदूड़ी गांव आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। करीब बीस साल पहले सिंदूड़ी गांव ग्रामसभा हुआ करती थी। राज्य में सत्ताधारी दलों द्वारा गांव में स्कूल, रोजगार, सड़क, पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई, जिसके कारण 179 परिवार अपनी जन्मभूमि को छोड़कर चले गए। आज गांव में केवल एक परिवार ही रह गया है। आलम यह है कि गांव में परिवार के लोगों के साथ बातचीत करने वाला भी कोई नजर नहीं आता है। समाजसेवी भूपेंद्र राणा ने बताया कुछ साल पहले जिन घरों में त्यौहारों में खुशी के माहौल में बच्चों की किलकारियां गूंजा करती थी आज गांव के सभी घर खंडहरों में तब्दील हो गए हैं। कभी हजारों की संख्या में सिंदूड़ी गांव के लोग एक दूसरे के सुख-दुख को मिलकर बांटा करते थे, लेकिन सरकारों की उदासीनता के चलते आज सिंदूड़ी गांव में केवल एक परिवार शेष रह गया है। ग्राम प्रधान अरुण जुगरान ने बताया पूरे गांव में केवल एक परिवार है, जिसमें एक महिला व उसका बेटा है। बताया महिला किसी दूसरे गांव में भोजन माता का कार्य करती है।
सुविधाएं मिले तो क्यों नहीं लौटेंगे परिवार
सिंदूड़ी गांव जैसे प्रदेश के विभिन्न गांवों से पलायन कर चुके लोगों की फिर से रोजगार, शिक्षा, सड़क, पानी व उच्च चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराकर वापसी हो सकती है। सिंदूड़ी गांव से अधिकांश लोगों ने देहरादून, दिल्ली, मुंबई आदि नगरों में रोजगार व शिक्षा के लिए पलायन किया है।
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इनकी सुनिए
पहाड़ों के गांवों से आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। एकत्रित किए गए आंकड़े राज्य सरकार को जल्द भेज दिए जाएंगे। उसके बाद सरकार द्वारा पलायन पर अंकुश लगाने की योजना पर कार्य किया जाएगा।
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-- एसएस नेगी, उपाध्यक्ष ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग।
सिंदूड़ी गांव में कुछ साल पहले करीब 180 परिवार हुआ करते थे, लेकिन मूलभूत सुविधाएं के अभाव में आज गांव में महज एक परिवार ही रह गया है। विधायक व जिम्मेदार अधिकारियों से गांव में मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने के संबंध में कई बार गुहार लगाई जा चुकी है। लेकिन ग्रामीणों की समस्याओं को लगातार अनदेखा किया जा रहा है।
- अरुण जुगरान, प्रधान ग्रामसभा बैरागढ़।