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जातिवादी व्यवस्था से आक्रोशित रक्खी का आह्वान फट जा पंचधार
Updated Thu, 08 Mar 2018 10:40 PM IST
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श्रीनगर। उपन्यासकार विद्यासागर नौटियाल द्वारा लिखित ‘फट जा पंचधार’ नाटक का मंचन किया गया। कहानी की एकमात्र पात्र रक्खी की आत्मकथात्मक शैली में कही गई इस कहानी में दर्द, घुटन, तड़प, संताप और आक्रोश देखने को मिलता है।
बुधवार देर शाम अजीम प्रेम जी फाउंडेशन, स्वैच्छिक शिक्षक समूह, आखर समिति और हिमालय कला एवं साहित्य परिषद की ओर से पालिका सभागार में ‘फट जा पंचधार’ नाटक का मंचन किया गया। अभिषेक के निर्देशन में रंगकर्मी कुसुम पंत ने एकल प्रस्तुति दी।
फट जा पंचधार एक दलित नारी रक्खी की दर्दनाक कहानी है, जो दुख, उत्पीड़न और तिरस्कार सहती है। कठोर परिश्रम के बावजूद पहाड़ जैसी विकट जिंदगी जीने को मजबूर है। वह समाज और सयाणों के बनाए गए बंधन में जीने को मजबूर हैं। गांव का दबंग वीर सिंह उसे 30 साल तक अपने साथ रखता है, लेकिन उसे समाज के जाति व्यवस्था की आड़ मेें पत्नी का दर्जा नहीं देता है। अंत में वह रक्खी को त्याग देता है।
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कथानक व मुख्य संवाद
फट जा पंचधार अपने पूरे रचाव और बहाव में बेहद मार्मिक और उद्वेलित करने वाली कहानी है। इसके संवाद दर्शकों को सोचने को मजबूर कर देते हैं। वीर सिंह रक्खी को अपने घर ले आता है, लेकिन वह निचले तबके की होने के कारण परिवार के साथ नहीं रह सकती है। ऐसे ही एक दृश्य में रक्खी कहती है कि दो बार मुझे गर्भ रहा, दोनों बार वीर सिंह ने मुझे दवा खिलाई। वीर सिंह कहता था कि ताकत की दवा है। जिंदगी भर मैंने उसकी बात को देववाणी माना। 30 वर्ष तक वीर सिंह ने रक्खी को अपने साथ रखा, लेकिन अंत में छोड़ देता है। अंत में दोगले समाज/पुरुष प्रधान समाज और दोहरे मानदंडों वाले समाज से झुंझलाकर रक्खी का आक्रोश फूट पड़ता है और वह कहती है मैं चाहती हूं कि पंचधार फट जाए। पंचधार वह स्थान है, जहां पांच गांवों की सीमाएं मिलती हैं।
बुधवार देर शाम अजीम प्रेम जी फाउंडेशन, स्वैच्छिक शिक्षक समूह, आखर समिति और हिमालय कला एवं साहित्य परिषद की ओर से पालिका सभागार में ‘फट जा पंचधार’ नाटक का मंचन किया गया। अभिषेक के निर्देशन में रंगकर्मी कुसुम पंत ने एकल प्रस्तुति दी।
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फट जा पंचधार एक दलित नारी रक्खी की दर्दनाक कहानी है, जो दुख, उत्पीड़न और तिरस्कार सहती है। कठोर परिश्रम के बावजूद पहाड़ जैसी विकट जिंदगी जीने को मजबूर है। वह समाज और सयाणों के बनाए गए बंधन में जीने को मजबूर हैं। गांव का दबंग वीर सिंह उसे 30 साल तक अपने साथ रखता है, लेकिन उसे समाज के जाति व्यवस्था की आड़ मेें पत्नी का दर्जा नहीं देता है। अंत में वह रक्खी को त्याग देता है।
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कथानक व मुख्य संवाद
फट जा पंचधार अपने पूरे रचाव और बहाव में बेहद मार्मिक और उद्वेलित करने वाली कहानी है। इसके संवाद दर्शकों को सोचने को मजबूर कर देते हैं। वीर सिंह रक्खी को अपने घर ले आता है, लेकिन वह निचले तबके की होने के कारण परिवार के साथ नहीं रह सकती है। ऐसे ही एक दृश्य में रक्खी कहती है कि दो बार मुझे गर्भ रहा, दोनों बार वीर सिंह ने मुझे दवा खिलाई। वीर सिंह कहता था कि ताकत की दवा है। जिंदगी भर मैंने उसकी बात को देववाणी माना। 30 वर्ष तक वीर सिंह ने रक्खी को अपने साथ रखा, लेकिन अंत में छोड़ देता है। अंत में दोगले समाज/पुरुष प्रधान समाज और दोहरे मानदंडों वाले समाज से झुंझलाकर रक्खी का आक्रोश फूट पड़ता है और वह कहती है मैं चाहती हूं कि पंचधार फट जाए। पंचधार वह स्थान है, जहां पांच गांवों की सीमाएं मिलती हैं।