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पर्यावरण की तर्ज पर संस्कृत भाषा का भी हो संरक्षण: नैथानी
Updated Thu, 01 Feb 2018 10:28 PM IST
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देवप्रयाग। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग के रघुनाथ कीर्ति परिसर में दस दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ करते हुए पूर्व मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने कहा कि पर्यावरण की तर्ज पर संस्कृत भाषा को भी संरक्षण की जरूरत है। संगोष्ठी की शुरुआत वेदों की चर्चा से हुई।
बृहस्पतिवार को प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग में आयोजित संगोष्ठी में संस्कृत भाषा के महत्व एवं इसके संरक्षण पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि देवप्रयाग में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की स्थापना होने के साथ ही कुंभ क्षेत्र में शामिल होने पर धार्मिक नगरी ने अपनी अलग से पहचान बना दी है। कहा कि पाप नाशनी व मोक्षदायिनी गंगा का उद्गम होने के साथ ही यहां से ज्ञान की अविरल धारा भी बहेगी। इसका लाभ आने वाले समय में देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को मिलेगा। मंत्री ने कहा कि संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है, लेकिन इसकी उपेक्षा होने से अब इसके संरक्षण व संबर्द्धन की जरूरत है। संस्थान के प्राचार्य प्रो. केवि सुब्बरायुडू ने संस्कृत को पितृभाषा बताया। कहा कि संस्कृत ज्ञान का भंडार है। प्राचार्य ने कहा कि अब संस्थान में आयुर्वेद के जरिए जड़ी बूटियों के संरक्षण का कार्य भी किया जाएगा। संगोष्ठी की शुरुआत वेदों की चर्चा से की गई। इस मौके पर सेमिनार संयोजक प्रो. वनमाली विस्वाल, वेद विभाग प्रमुख डा. शैलेंद्र उनियाल, कुरुक्षेत्र विवि के प्रो. राजेश्वर मिश्र, प्रो. प्रफुल्ल गड़पाल, डा. साधना डिमरी, डा. संदीप भट्ट, डा. शशि शेखर, डा. अरुण मिश्र, डा. मुकेश कुमार, डा. शैलेंद्र कोटियाल, उदयप्रकाश टोडरिया, डा. सुशील बडोनी, डा. सुरेश शर्मा व सुरेश बडोनी आदि शामिल थे।
बृहस्पतिवार को प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग में आयोजित संगोष्ठी में संस्कृत भाषा के महत्व एवं इसके संरक्षण पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि देवप्रयाग में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की स्थापना होने के साथ ही कुंभ क्षेत्र में शामिल होने पर धार्मिक नगरी ने अपनी अलग से पहचान बना दी है। कहा कि पाप नाशनी व मोक्षदायिनी गंगा का उद्गम होने के साथ ही यहां से ज्ञान की अविरल धारा भी बहेगी। इसका लाभ आने वाले समय में देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को मिलेगा। मंत्री ने कहा कि संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जननी है, लेकिन इसकी उपेक्षा होने से अब इसके संरक्षण व संबर्द्धन की जरूरत है। संस्थान के प्राचार्य प्रो. केवि सुब्बरायुडू ने संस्कृत को पितृभाषा बताया। कहा कि संस्कृत ज्ञान का भंडार है। प्राचार्य ने कहा कि अब संस्थान में आयुर्वेद के जरिए जड़ी बूटियों के संरक्षण का कार्य भी किया जाएगा। संगोष्ठी की शुरुआत वेदों की चर्चा से की गई। इस मौके पर सेमिनार संयोजक प्रो. वनमाली विस्वाल, वेद विभाग प्रमुख डा. शैलेंद्र उनियाल, कुरुक्षेत्र विवि के प्रो. राजेश्वर मिश्र, प्रो. प्रफुल्ल गड़पाल, डा. साधना डिमरी, डा. संदीप भट्ट, डा. शशि शेखर, डा. अरुण मिश्र, डा. मुकेश कुमार, डा. शैलेंद्र कोटियाल, उदयप्रकाश टोडरिया, डा. सुशील बडोनी, डा. सुरेश शर्मा व सुरेश बडोनी आदि शामिल थे।
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