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सुप्रीम कोर्ट ने माना स्वरूपानंद को ज्योर्तिपीठ का शंकराचार्य
Updated Sun, 07 Oct 2018 12:35 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाल, हरिद्वार
अब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अपने अंतरिम आदेश में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योर्तिपीठ तथा शारदापीठ दोनों का शंकराचार्य माना है। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि प्रयाग कुंभ में शंकराचार्य के रूप में ज्योर्तिपीठ की भूमि भी शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का प्रदान की जाए। शंकराचार्य के रूप में वासुदेवानंद को कुछ भी देने पर उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है।
यह अंतरिम आदेश उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा तथा न्यायमूर्ति विनीत शरण की पीठ ने चार अक्तूबर को दिया था। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के भक्तों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करते हुए दावा किया था कि वे ही ज्योर्तिपीठ के विधिवत शंकराचार्य चयनित हुए हैं। अत: द्वारिका और बद्रिकाश्रम पीठों की मेला भूमि का आवंटन उनके नाम किया जाए। उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया था कि वासुदेवानंद सरस्वती चूंकि किसी भी पीठ पर आसीन नहीं है। इसलिए उन्हें शंकराचार्य के रूप में कोई भूमि प्रदान न की जाए। सुनवाई के बाद न्यायमूर्तियों ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि जब तक इस मामले का पूर्णत: निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक स्वरूपानंद सरस्वती को ही ज्योर्तिपीठ का शंकराचार्य माना जाएगा। कुंभ मेला क्षेत्र में शंकराचार्यों के लिए आरक्षित दो पीठों की भूमि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को दी जाए। न्यायालय ने कहा है कि वासुदेवानंद को नियमानुसार एक संत के रूप में तो भूमि दी जा सकती है लेकिन शंकराचार्य के रूप में कदापि नहीं।
जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रवक्ता स्वामी श्रीधरानंद ने इस संबंध में बताया कि न्यायालय का अंतिम आदेश आने तक ज्योर्तिपीठ का विवाद हल हो गया है। प्रकरण की पूर्ण सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय ने 14 नवंबर की तिथि निर्धारित की है।
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अब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अपने अंतरिम आदेश में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योर्तिपीठ तथा शारदापीठ दोनों का शंकराचार्य माना है। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि प्रयाग कुंभ में शंकराचार्य के रूप में ज्योर्तिपीठ की भूमि भी शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का प्रदान की जाए। शंकराचार्य के रूप में वासुदेवानंद को कुछ भी देने पर उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है।
यह अंतरिम आदेश उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा तथा न्यायमूर्ति विनीत शरण की पीठ ने चार अक्तूबर को दिया था। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के भक्तों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करते हुए दावा किया था कि वे ही ज्योर्तिपीठ के विधिवत शंकराचार्य चयनित हुए हैं। अत: द्वारिका और बद्रिकाश्रम पीठों की मेला भूमि का आवंटन उनके नाम किया जाए। उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया था कि वासुदेवानंद सरस्वती चूंकि किसी भी पीठ पर आसीन नहीं है। इसलिए उन्हें शंकराचार्य के रूप में कोई भूमि प्रदान न की जाए। सुनवाई के बाद न्यायमूर्तियों ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि जब तक इस मामले का पूर्णत: निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक स्वरूपानंद सरस्वती को ही ज्योर्तिपीठ का शंकराचार्य माना जाएगा। कुंभ मेला क्षेत्र में शंकराचार्यों के लिए आरक्षित दो पीठों की भूमि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को दी जाए। न्यायालय ने कहा है कि वासुदेवानंद को नियमानुसार एक संत के रूप में तो भूमि दी जा सकती है लेकिन शंकराचार्य के रूप में कदापि नहीं।
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जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रवक्ता स्वामी श्रीधरानंद ने इस संबंध में बताया कि न्यायालय का अंतिम आदेश आने तक ज्योर्तिपीठ का विवाद हल हो गया है। प्रकरण की पूर्ण सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय ने 14 नवंबर की तिथि निर्धारित की है।
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