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गंगा नदी में तेजी से बढ़ रहा आरगैनोक्लोरीन, आरगैनोफास्फेट जैसे खतरनाक पेस्टीसाइड
Updated Tue, 18 Sep 2018 02:24 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला।
देहरादून। गंगा के संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं। बावजूद इसकी सेहत साल दर साल गिरती जा रही है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के हालिया शोध में सामना आया है कि राष्ट्रीय नदी में आरगैनोेक्लोरीन, आरगैनोेफास्फेट जैसे खतरनाक तत्व तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे मछलियां समेत अन्य जलीय जीवजंतु लगातार मर रहे हैं। इसके अलावा इन मछलियों को खाने मेें इस्तेमाल किया जाता है तो कैंसर जैसी बीमारी होना तय है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान में आयोजित 14वें वार्षिक रिसर्च सेमिनार में वैज्ञानिकों ने यह रिपोर्ट पेश की है। इसके मुताबिक वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसए हुसैन और डॉ. अंजू बरोठ की अगुवाई में टीम ने गंगोत्री से गंगा सागर तक चुनिंदा 35 जगहों पर गंगाजल के नमूनों की जांच की। इनमें इन्होंने पाया कि गंगाजल में आरगैनोक्लोरीन पेस्टीसाइड (ओसीपी), न्यूरोटाक्सिक आरगैनोफास्फेट पेस्टीसाइड (ओपीपी) जैसे कई खतरनाक पेस्टीसाइड पाए गए हैं। वैज्ञानिक रुचिका शाह के मुताबिक गंगाजल में सबसे अधिक पेस्टीसाइड पश्चिम बंगाल के हासिमपुर और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में पाया गया है। उन्होंने बताया कि गंगा के मैदानी इलाकों में किसानों की ओर से खेती में अंधाधुंध इस्तेमाल किए जा रहे पेस्टीसाइड की वजह से भी स्थिति खराब हो रही है। चार प्रजातियों की मछलियों के ऊतकों की जांच की गई तो उनके शरीर में भी यह खतरनाक पेस्टीसाइड पाए गए।
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देहरादून। गंगा के संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं। बावजूद इसकी सेहत साल दर साल गिरती जा रही है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के हालिया शोध में सामना आया है कि राष्ट्रीय नदी में आरगैनोेक्लोरीन, आरगैनोेफास्फेट जैसे खतरनाक तत्व तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे मछलियां समेत अन्य जलीय जीवजंतु लगातार मर रहे हैं। इसके अलावा इन मछलियों को खाने मेें इस्तेमाल किया जाता है तो कैंसर जैसी बीमारी होना तय है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान में आयोजित 14वें वार्षिक रिसर्च सेमिनार में वैज्ञानिकों ने यह रिपोर्ट पेश की है। इसके मुताबिक वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसए हुसैन और डॉ. अंजू बरोठ की अगुवाई में टीम ने गंगोत्री से गंगा सागर तक चुनिंदा 35 जगहों पर गंगाजल के नमूनों की जांच की। इनमें इन्होंने पाया कि गंगाजल में आरगैनोक्लोरीन पेस्टीसाइड (ओसीपी), न्यूरोटाक्सिक आरगैनोफास्फेट पेस्टीसाइड (ओपीपी) जैसे कई खतरनाक पेस्टीसाइड पाए गए हैं। वैज्ञानिक रुचिका शाह के मुताबिक गंगाजल में सबसे अधिक पेस्टीसाइड पश्चिम बंगाल के हासिमपुर और उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में पाया गया है। उन्होंने बताया कि गंगा के मैदानी इलाकों में किसानों की ओर से खेती में अंधाधुंध इस्तेमाल किए जा रहे पेस्टीसाइड की वजह से भी स्थिति खराब हो रही है। चार प्रजातियों की मछलियों के ऊतकों की जांच की गई तो उनके शरीर में भी यह खतरनाक पेस्टीसाइड पाए गए।
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