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2100 दीयों से सजाई गई रंगोली
Updated Tue, 13 Feb 2018 02:04 AM IST
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12 बजते ही गूंजने लगे भोले बाबा के जयकारे
देहरादून (ब्यूरो)। रात 12 बजते ही द्रोणनगरी के मंदिर और शिवालय भोले बाबा के जयकारों से गूंज उठे। हर-हर महादेव और ऊं नम: शिवाय का जयकारा लगाते श्रद्धालु मंदिर पहुंचे और पहले भगवान शिव शंकर का दर्शन किया। इसके बाद इसके बाद बेर, धतूरा, बेल-पत्र, गंगा जल और दूध आदि से भोले बाबा का विधिवत अभिषेक कर पूजा-अर्चना की। महाशिवरात्रि पर बाबा की पूजा-अर्चना और अभिषेक के लिए सोमवार रात 11 बजे से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की लाइन लगनी शुरू हो गई थी। ठीक 12 बजे पट खुलते ही लोगों ने शिवलिंग का अभिषेक किया। हालांकि, चतुर्दशी तिथि दो दिन होने के चलते कुछ जगहों पर 14 फरवरी यानी बुधवार को भी महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा। वहीं, ज्योतिषियों के अनुसार 13 फरवरी (मंगलवार) को व्रत करना ही शास्त्र सम्मत है।
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500 लीटर दूध से हुआ अभिषेक
टपकेश्वर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि का व्रत आज 13 फरवरी को मनाया जाएगा। यही वजह है कि रात 12 बजे से ही यहां श्रद्धालुओं ने पूजा-अभिषेक शुरू कर दिया। मंदिर प्रबंधन की ओर से रात को भगवान शिव की प्रिय वस्तुओं भांग, धतूरा, गन्ने के रस, पंचमेवा आदि से बाबा का विशेष अभिषेक किया गया। साथ ही 500 लीटर दूध से भी बाबा का अभिषेेक किया गया। मंदिर के महंत किशन गिरी ने बताया कि सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए इस बार करीब 40 सीसीटीवी कैमरे मंदिर और आसपास परिसर में लगाए गए हैं। वहीं, मेले में नए झूले भी आए हैं। पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा गार्ड भी मंदिर के भीतर और बाहर तैनात किए गए हैं।
ये है महत्व
श्री टपकेश्वर शिवलिंग का वर्णन देवेश्वर और टपकेश्वर नाम से करीब छह हजार वर्षों से स्कंद पुराण, केदार खंड में उल्लिखित है। इसी गुफा में कौरवों एवं पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य को तपस्या के बाद धनुर्विद्या का ज्ञान भगवान शिव से प्राप्त हुआ। द्रोण पुत्र अस्वस्थामा ने इसी गुफा में दूध के लिए भगवान शिव की एक पांव के बल खड़े होकर छह माह तपस्या की ती। पूर्णमासी के दिन उसकी तपस्या पूर्ण हुई और लिंग पर दूध की धार बहने लगी। इसके बाद कलियुग में दूध पानी के रूप में बदल गया। तब से आज तक यहां पवित्र शिवलिंग पर पानी की बूंदें टपकती रहती हैं।
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श्री नागेश्वर मंदिर
गढ़ी-डाकरा स्थित श्री नागेश्वर मंदिर में सुबह चार बजे से पूजा-अर्चना शुरू हुई। भोले बाबा का विशेष पूजन कर मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए कपाट खोल दिए गए। मंदिर के महंत विश्वनाथ योगी ने बताया कि 100 लीटर केसर वाले दूध से बाबा का अभिषेेक किया गया। उन्होंने बताया कि मंगलवार को ही मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। इसके साथ ही पंचायती मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर आदि में भी 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि पर्व मनाया जा रहा है।
ये है महत्व
गढ़ी-डाकरा स्थित श्री नागेश्वर मंदिर बेहद प्राचीन मंदिर है। माना जाता है कि यहां हर मनोकामना पूर्ण होती है। दरअसल, पुराने समय में यहां नागों का राज हुआ करता था। यह ऐसा मंदिर है जहां स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुए और उन पर हर समय नाग बैठे रहते थे। सुबह पूजा-अर्चना के समय नाग खुद ही वहां से चले जाते और रात को फिर शिवलिंग पर आकर बैठ जाते। नागों का डेरा होने की वजह से इस मंदिर का नाम श्री नागेश्वर मंदिर पड़ गया। हालांकि, अब कभी-कभार ही यहां नाग दिखाई देते हैं।
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2100 दीयों से सजाई गई रंगोली
सहारनपुर चौक स्थित श्री पृथ्वीनाथ मंदिर में महंत 108 रविंद्रपुरी महाराज के सान्निध्य में शिव महोत्सव का शुभारंभ किया गया। इस दौरान 2100 दीयों की रंगोली ने सबका मन मोह लिया। इसमें भगवान शिव एवं गणपति के स्वरूप आकर्र्षित कर रहे थे। संयोजक प्रवीण गुप्ता ने बताया कि रंगोली बनाने में छह घंटे से भी अधिक का समय लगा। वहीं, हरिद्वार से लाए गए गंगाजल से मध्यरात्रि से रुद्राभिषेक शुरू हो गया था। 51 प्रकार की सामग्रियों से श्री पृथ्वीनाथ का अभिषेेक किया गया। मंदिर के सेवादार संजय गर्ग ने बताया कि 13 फरवरी को प्रसाद वितरित किया जाएगा। इस मौके पर दिगंबर दिनेश पुरी, प्रवीन गुप्ता, राजेंद्र आनंद, नवनी गुप्ता, दिलीप सैनी, नरेंद्र ठाकुर, विक्की गोयल, प्रीति गुप्ता, राजकुमार, सचिन गुप्ता, संजय भट्ट, सचिन, कार्तिक गर्ग आदि उपस्थित थे।
ये है मान्यता
प्राचीन श्री पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर में इंद्रप्रस्थ के एक वामन वैश्य भक्त ने शिवजी की पूजा-अर्चना की थी। इससे प्रसन्न होकर भोले बाबा ने उन्हें दर्शन दिए। इसका वर्णन स्कंद पुराण के केदार खंड के 128वें अध्याय में भी मिलता है। पृथ्वी से शिवलिंग के प्रकट होने के कारण इसको श्री पृथ्वीनाथ महादेव जी कहा जाता है। इस मंदिर में शिवलिंग की आकृति पृथ्वी जैसी गोल है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में विराजमान होने के कारण इनको त्रयंबकेश्वर भी कहा जाता है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पांडव इस स्थान से भी होकर गुजरे थे।
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सिद्धेश्वर मंदिर में कल होगा अभिषेक
केदारपुरम् स्थित सिद्धेश्वर मंदिर में 14 फरवरी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा। मंदिर के पंडित संजय खंकरियाल ने बताया कि मंदिर में श्रद्धालु 14 को व्रत करेंगे। वहीं, 14 और 15 को महाशिवरात्रि का मेला भी लगेगा। उन्होंने बताया कि गढ़वाल के पंचांग के अनुसार, 14 फरवरी को ही यह व्रत किया जाएगा। यही वजह है कि मंदिर प्रबंधन बुधवार को ही यह व्रत कर रहा है।
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बन रहा शिव योग
धर्म सिंधु के अनुसार, चतुर्दशी तिथि दूसरे दिन निशीथ काल में आंशिक रूप से व्याप्त हो और पहले दिन संपूर्ण भाग को व्याप्त करे तो शिवरात्रि का व्रत पहले दिन करना चाहिए। आचार्य भरत राम तिवारी के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी को पूर्ण रूप से निशीथ व्यापिनी है। जबकि, 14 फरवरी को रात 12.13 से 12.48 बजे तक निशीथ काल में आंशिक व्याप्त है। ऐसे में यह व्रत 13 फरवरी को करना चाहिए। डॉ.आचार्य सुशांत राज के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी को रात्रि 10.34 मिनट पर आरंभ होगी और 14 फरवरी को रात्रि 12.46 मिनट पर समाप्त होगी। ज्योतिषी पीपीएस राणा के अनुसार, ईशान संहिता में वर्णित है कि जिस तिथि में अर्द्धरात्रि व्यापिनी चतुर्दशी तिथि हो, उस तिथि में व्रत रखें। शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव का विवाह पार्वती जी के साथ हुआ था। इस वर्ष शिवरात्रि मंगलवार यानी हनुमान जी के दिन पड़ रही है। हनुमान जी शिव के रुद्रावतार हैं। ऐसे में यह पर्व शिव योग भी बनाता है, जो कि अपने आप में बेहद शुभ माना जा रहा है।
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शिवार्चन करें, पूरी होगी मनोकामना
आचार्य संतोष खंडूड़ी के अनुसार, जिनकी कुंडली में पितृ दोष, चांडाल, विष योग, शासकीय प्रताड़ना आदि हों, वे इस दिन शिर्वाचन करेंगे तो मनोकामना पूर्ण होगी। शिवरात्रि में साधना एवं गुरु मंत्र दीक्षा के लिए सिद्धि दायक मुहूर्त होता है। शिवरात्रि का व्रत सभी व्रतों में उत्तम एवं कल्याणकारी माना जाता है।
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निशीथ काल का समय
ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य के अनुसार, दून में 13 फरवरी को निशीथ काल रात 12.04 बजे से 12.56 बजे तक रहेगा। अत: 13 फरवरी को निशीथ काल में चतुर्दशी रहेगी। 14 फरवरी को निशीथ काल से पहले चतुर्दशी तिथि समाप्त हो जाएगी।
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देहरादून (ब्यूरो)। रात 12 बजते ही द्रोणनगरी के मंदिर और शिवालय भोले बाबा के जयकारों से गूंज उठे। हर-हर महादेव और ऊं नम: शिवाय का जयकारा लगाते श्रद्धालु मंदिर पहुंचे और पहले भगवान शिव शंकर का दर्शन किया। इसके बाद इसके बाद बेर, धतूरा, बेल-पत्र, गंगा जल और दूध आदि से भोले बाबा का विधिवत अभिषेक कर पूजा-अर्चना की। महाशिवरात्रि पर बाबा की पूजा-अर्चना और अभिषेक के लिए सोमवार रात 11 बजे से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की लाइन लगनी शुरू हो गई थी। ठीक 12 बजे पट खुलते ही लोगों ने शिवलिंग का अभिषेक किया। हालांकि, चतुर्दशी तिथि दो दिन होने के चलते कुछ जगहों पर 14 फरवरी यानी बुधवार को भी महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा। वहीं, ज्योतिषियों के अनुसार 13 फरवरी (मंगलवार) को व्रत करना ही शास्त्र सम्मत है।
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500 लीटर दूध से हुआ अभिषेक
टपकेश्वर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि का व्रत आज 13 फरवरी को मनाया जाएगा। यही वजह है कि रात 12 बजे से ही यहां श्रद्धालुओं ने पूजा-अभिषेक शुरू कर दिया। मंदिर प्रबंधन की ओर से रात को भगवान शिव की प्रिय वस्तुओं भांग, धतूरा, गन्ने के रस, पंचमेवा आदि से बाबा का विशेष अभिषेक किया गया। साथ ही 500 लीटर दूध से भी बाबा का अभिषेेक किया गया। मंदिर के महंत किशन गिरी ने बताया कि सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए इस बार करीब 40 सीसीटीवी कैमरे मंदिर और आसपास परिसर में लगाए गए हैं। वहीं, मेले में नए झूले भी आए हैं। पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा गार्ड भी मंदिर के भीतर और बाहर तैनात किए गए हैं।
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ये है महत्व
श्री टपकेश्वर शिवलिंग का वर्णन देवेश्वर और टपकेश्वर नाम से करीब छह हजार वर्षों से स्कंद पुराण, केदार खंड में उल्लिखित है। इसी गुफा में कौरवों एवं पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य को तपस्या के बाद धनुर्विद्या का ज्ञान भगवान शिव से प्राप्त हुआ। द्रोण पुत्र अस्वस्थामा ने इसी गुफा में दूध के लिए भगवान शिव की एक पांव के बल खड़े होकर छह माह तपस्या की ती। पूर्णमासी के दिन उसकी तपस्या पूर्ण हुई और लिंग पर दूध की धार बहने लगी। इसके बाद कलियुग में दूध पानी के रूप में बदल गया। तब से आज तक यहां पवित्र शिवलिंग पर पानी की बूंदें टपकती रहती हैं।
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श्री नागेश्वर मंदिर
गढ़ी-डाकरा स्थित श्री नागेश्वर मंदिर में सुबह चार बजे से पूजा-अर्चना शुरू हुई। भोले बाबा का विशेष पूजन कर मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए कपाट खोल दिए गए। मंदिर के महंत विश्वनाथ योगी ने बताया कि 100 लीटर केसर वाले दूध से बाबा का अभिषेेक किया गया। उन्होंने बताया कि मंगलवार को ही मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। इसके साथ ही पंचायती मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर आदि में भी 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि पर्व मनाया जा रहा है।
ये है महत्व
गढ़ी-डाकरा स्थित श्री नागेश्वर मंदिर बेहद प्राचीन मंदिर है। माना जाता है कि यहां हर मनोकामना पूर्ण होती है। दरअसल, पुराने समय में यहां नागों का राज हुआ करता था। यह ऐसा मंदिर है जहां स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुए और उन पर हर समय नाग बैठे रहते थे। सुबह पूजा-अर्चना के समय नाग खुद ही वहां से चले जाते और रात को फिर शिवलिंग पर आकर बैठ जाते। नागों का डेरा होने की वजह से इस मंदिर का नाम श्री नागेश्वर मंदिर पड़ गया। हालांकि, अब कभी-कभार ही यहां नाग दिखाई देते हैं।
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2100 दीयों से सजाई गई रंगोली
सहारनपुर चौक स्थित श्री पृथ्वीनाथ मंदिर में महंत 108 रविंद्रपुरी महाराज के सान्निध्य में शिव महोत्सव का शुभारंभ किया गया। इस दौरान 2100 दीयों की रंगोली ने सबका मन मोह लिया। इसमें भगवान शिव एवं गणपति के स्वरूप आकर्र्षित कर रहे थे। संयोजक प्रवीण गुप्ता ने बताया कि रंगोली बनाने में छह घंटे से भी अधिक का समय लगा। वहीं, हरिद्वार से लाए गए गंगाजल से मध्यरात्रि से रुद्राभिषेक शुरू हो गया था। 51 प्रकार की सामग्रियों से श्री पृथ्वीनाथ का अभिषेेक किया गया। मंदिर के सेवादार संजय गर्ग ने बताया कि 13 फरवरी को प्रसाद वितरित किया जाएगा। इस मौके पर दिगंबर दिनेश पुरी, प्रवीन गुप्ता, राजेंद्र आनंद, नवनी गुप्ता, दिलीप सैनी, नरेंद्र ठाकुर, विक्की गोयल, प्रीति गुप्ता, राजकुमार, सचिन गुप्ता, संजय भट्ट, सचिन, कार्तिक गर्ग आदि उपस्थित थे।
ये है मान्यता
प्राचीन श्री पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर में इंद्रप्रस्थ के एक वामन वैश्य भक्त ने शिवजी की पूजा-अर्चना की थी। इससे प्रसन्न होकर भोले बाबा ने उन्हें दर्शन दिए। इसका वर्णन स्कंद पुराण के केदार खंड के 128वें अध्याय में भी मिलता है। पृथ्वी से शिवलिंग के प्रकट होने के कारण इसको श्री पृथ्वीनाथ महादेव जी कहा जाता है। इस मंदिर में शिवलिंग की आकृति पृथ्वी जैसी गोल है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में विराजमान होने के कारण इनको त्रयंबकेश्वर भी कहा जाता है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पांडव इस स्थान से भी होकर गुजरे थे।
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सिद्धेश्वर मंदिर में कल होगा अभिषेक
केदारपुरम् स्थित सिद्धेश्वर मंदिर में 14 फरवरी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाएगा। मंदिर के पंडित संजय खंकरियाल ने बताया कि मंदिर में श्रद्धालु 14 को व्रत करेंगे। वहीं, 14 और 15 को महाशिवरात्रि का मेला भी लगेगा। उन्होंने बताया कि गढ़वाल के पंचांग के अनुसार, 14 फरवरी को ही यह व्रत किया जाएगा। यही वजह है कि मंदिर प्रबंधन बुधवार को ही यह व्रत कर रहा है।
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बन रहा शिव योग
धर्म सिंधु के अनुसार, चतुर्दशी तिथि दूसरे दिन निशीथ काल में आंशिक रूप से व्याप्त हो और पहले दिन संपूर्ण भाग को व्याप्त करे तो शिवरात्रि का व्रत पहले दिन करना चाहिए। आचार्य भरत राम तिवारी के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी को पूर्ण रूप से निशीथ व्यापिनी है। जबकि, 14 फरवरी को रात 12.13 से 12.48 बजे तक निशीथ काल में आंशिक व्याप्त है। ऐसे में यह व्रत 13 फरवरी को करना चाहिए। डॉ.आचार्य सुशांत राज के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी को रात्रि 10.34 मिनट पर आरंभ होगी और 14 फरवरी को रात्रि 12.46 मिनट पर समाप्त होगी। ज्योतिषी पीपीएस राणा के अनुसार, ईशान संहिता में वर्णित है कि जिस तिथि में अर्द्धरात्रि व्यापिनी चतुर्दशी तिथि हो, उस तिथि में व्रत रखें। शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव का विवाह पार्वती जी के साथ हुआ था। इस वर्ष शिवरात्रि मंगलवार यानी हनुमान जी के दिन पड़ रही है। हनुमान जी शिव के रुद्रावतार हैं। ऐसे में यह पर्व शिव योग भी बनाता है, जो कि अपने आप में बेहद शुभ माना जा रहा है।
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शिवार्चन करें, पूरी होगी मनोकामना
आचार्य संतोष खंडूड़ी के अनुसार, जिनकी कुंडली में पितृ दोष, चांडाल, विष योग, शासकीय प्रताड़ना आदि हों, वे इस दिन शिर्वाचन करेंगे तो मनोकामना पूर्ण होगी। शिवरात्रि में साधना एवं गुरु मंत्र दीक्षा के लिए सिद्धि दायक मुहूर्त होता है। शिवरात्रि का व्रत सभी व्रतों में उत्तम एवं कल्याणकारी माना जाता है।
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निशीथ काल का समय
ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य के अनुसार, दून में 13 फरवरी को निशीथ काल रात 12.04 बजे से 12.56 बजे तक रहेगा। अत: 13 फरवरी को निशीथ काल में चतुर्दशी रहेगी। 14 फरवरी को निशीथ काल से पहले चतुर्दशी तिथि समाप्त हो जाएगी।