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जागो! नदियां खत्म हो गई तो नहीं बचेगा हमारा अस्तित्व

Sat, 24 Feb 2018 02:20 AM IST
Updated Sat, 24 Feb 2018 02:20 AM IST
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जागो! नदियां खत्म हो गई तो नहीं बचेगा हमारा अस्तित्व
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के प्राकृतिक स्त्रोतों से निकलकर वर्षभर बहने वाली अधिकांश नदियां धीरे-धीरे सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं। जिन नदियों को ग्लेशियरों से पानी मिलता था, वह भी मौसमी बनती जा रही हैं, लेकिन अब भी बहुत ज्यादा देर नहीं हुई है। जल्द प्रयास शुरू किए जाएं तो स्थिति में सुधार हो सकता है। अगर नदियां खत्म हो गईं तो हमारा अस्तित्व नहीं बचेगा। शुक्रवार को ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय में उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र (यूसर्क) की ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘राज्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी सम्मेलन’ के उद्घाटन अवसर पर विशेषज्ञों ने यह विचार रखे।
विशेषज्ञों ने कहा कि पिछले 20 वर्षों के दौरान राज्य की 40 नदियों के स्वरूप में बदलाव आया है। रिस्पना, कोसी, बिंदाल, सुसवा समेत तमाम नदियां ऐसी हैं, जिनमें केवल नाममात्र का पानी रह गया है। आयोजक एवं यूसर्क के निदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने कहा कि नदियों के प्राकृतिक जल स्त्रोत और छोटी धाराओं के सूखने से स्थिति विकराल होती जा रही है। रिस्पना नदी में जहां पानी है, उसमें इकोलाई बैक्टीरिया पाया गया है, जो पेट के रोग पैदा करता है। ग्राफिक एरा ग्रुप ऑफ एजुकेशन के चेयरमैन प्रो. कमल घनशाला ने कहा कि देश के बड़े हिस्से को पानी पिलाने वाले उत्तराखंड में जल संकट बढ़ता जा रहा है। समय रहते हमें अपने प्राकृतिक जल स्त्रोतों, नदियों, और तालाबों की बेहतरी के लिए सोचना होगा। कार्यक्रम में स्वामी चिदानंद मुनि सरस्वती, ब्लाइंड क्रिकेट टीम के शैलेंद्र यादव, डॉ.एएस शुक्ला समेत अन्य शिक्षक और छात्र मौजूद रहे।
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41 किमी रह गई कोसी नदी
पहले सत्र में कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभागाध्यक्ष प्रो. जेएस रावत ने कहा कि अल्मोड़ा में कोसी नदी की हालत रिस्पना जैसी हो गई है। कभी कुमाऊं के बड़े हिस्से को पानी देने वाली कोसी पिछले 60 वर्षों में 225 से घटकर मात्र 41 किमी रह गई है। उन्होंने कहा कि कोसी को पुनर्जीवित करने के लिए 14 जोन बनाकर काम शुरू किया जा रहा है।
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गिर रहा नैनीताल झील में पानी
दूसरे सत्र में कुमाऊं विवि के प्रो. सीसी पंत ने नैनीताल झील के घटते जलस्तर पर प्रस्तुतिकरण दिया। उन्होंने कहा कि लगातार ड्राई सीजन रहने के चलते झील के स्तर में गिरावट आ रही है। झील में हर साल करीब 69 घन मीटर मलबा और कूड़ा-कचरा जा रहा है, जो झील के पूरे तंत्र को प्रभावित कर रहा है। झील को रिचार्ज करने वाला सूखाताल भी अतिक्रमण की चपेट में है।
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अतिक्रमण ने बिगाड़ी हालत
तीसरे सत्र में मेकिंग ए डिफरेंस (मैड) संस्था के अध्यक्ष अभियज नेगी ने रिस्पना नदी की बदहाली और उसके कारणों पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि रिस्पना की बदहाली के लिए सबसे बड़ा कारण अतिक्रमण है। नदी के उद्गम स्थल पर काफी पानी है, लेकिन जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती है, अतिक्रमण बढ़ता है और पानी खत्म हो जाता है। अतिक्रमण को राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त है।
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पौधरोपण से होगा उपचार
चौथे सत्र में इको टास्क फोर्स के कर्नल एचआरएस राणा ने कहा कि रिस्पना, बिंदाल समेत सभी नदियों के उद्गम स्थल और प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में साफ-सफाई कर पौधरोपण पर ध्यान दिया जा रहा है। रिस्पना और सुसवा नदियों के उद्गम में पानी है। बीच का हिस्सा कूड़े-कचरे और गंदगी से भरा है। जहां दोनों नदियां गंगा में मिलती हैं, वहां भी पानी है पर वह बहुत प्रदूषित है।
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जल संरक्षण पर दिया जोर
पांचवें सत्र में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के वैज्ञानिक आरपी पांडे ने वर्षा के जल संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नदियों के पुनर्जीवन के लिए प्राकृतिक जल स्त्रोतों और भूजल को रिचार्ज करना आवश्यक है। इसके लिए हमें नदियों के कैचमेट एरिया को बचाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि जब जमीन में पानी नहीं होगा तो नदियों में कहां से आएगा।
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देखना होगा नदियों का दर्द
भारतीय दृष्टिबाधित क्रिकेट टीम का हिस्सा रहे शैलेंद्र यादव ने कहा कि हम बिना आंखों के पाकिस्तान को हरा सकते हैं तो आंखें होने के बावजूद कूड़े और गंदगी को क्यों नहीं हरा सकते। हमें नदियों का दर्द देखना और समझना होगा। उन्होंने कहा कि आज तकनीक के दम पर बहुत कुछ किया जा सकता है। हमें तकनीक का इस्तेमाल कर नदियों की सेहत सुधारनी होगी।
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जितने शिवालय बनें, उतने शौचालय भी बनें

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि सरस्वती का बयान
कहा, गंगा किनारे नियंत्रित हो शवदाह, हरित शवदाह प्रक्रिया शुरू करें

अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून।
कार्यक्रम में पहुंचे परमार्थ निकेतन आश्रम, ऋषिकेश के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि सरस्वती ने कहा कि देश में जितने शिवालय बनें, उतने ही शौचालय भी बनने चाहिए। शौचालयों को भी शिवालयों की तरह साफ रखने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने गंगा किनारे शवदाह को नियंत्रित करने की भी आवश्यकता जताई।

सम्मेलन के शुभारंभ के बाद लोगों से रूबरू हुए स्वामी चिदानंद ने कहा कि शिवालयों के पास भी ज्यादा से ज्यादा शौचालय बनने चाहिए। साफ-सफाई के लिए देशभर में आंदोलन चलाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि गंगा की सफाई के लिए शवदाह को भी नियंत्रित करने की जरूरत है। इस तरह की तकनीक खोजी जा रही है, जिससे शवदाह में एक चौथाई से भी कम लकड़ी जलेगी। उन्होंने कहा कि अपने आश्रम और आसपास के क्षेत्रों में वह कूड़ा निस्तारण, सीवेज ट्रीटमेंट की प्रभावी व्यवस्था बना रहे हैं। इससे उन क्षेत्रों में गंदगी और कूड़े को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। उन्होंने रिस्पना, बिंदाल, कोसी जैसी नदियों को बचाने के लिए आम आदमी से भी आगे आने की अपील की।
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