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पीजीआई एंबुलेंस रैकेट के आरोपियों को 50-50 हजार रुपये में जमानत
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 20 Jul 2016 09:31 AM IST
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एंबुलेंस
- फोटो : अमर उजाला
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चंडीगढ़ पीजीआई में फर्जी एंबुलेंस रैकेट मामले में गिरफ्तार कुल नौ आरोपियों में से सात को मंगलवार को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय से जमानत मिल गई। अदालत ने 50-50 हजार रुपये के बेल बॉन्ड पर जमानत देने के आदेश दिए हैं। जमानत मिलने वालों में नयागांव निवासी अश्विनी कुमार और तीरथपाल, सेक्टर-24 निवासी विक्की और अश्विनी, खुड्डा लाहौरा निवासी शशि कुमार, गुरकिरपाल सिंह और विनोद शामिल हैं।
इससे पहले अश्विनी और तीरथपाल की ओर से दायर जमानत याचिका में कहा गया था कि दोनों को केस में झूठा फंसाया गया है। दोनों के अनुसार, रेडक्रॉस सोसायटी के मैनेजर अश्विनी खन्ना की ओर से पुलिस को दी गई शिकायत के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया है, जबकि दर्ज एफआईआर में उनके नाम नहीं हैं। दोनों का इस केस से कोई संबंध नहीं है और न ही पुलिस के पास उनके खिलाफ कोई सबूत है।
वहीं गुरकिरपाल की ओर से कहा गया था कि उसे मामले में रंजिशन फंसाया गया है। जिन लोगों के बयान के आधार पर उसे गिरफ्तार किया गया था, वह उससे पुरानी रंजिश रखते हैं। इसके अलावा अन्य आरोपियों ने भी मामले में झूठा फंसाये जाने का आरोप लगाते हुए जमानत याचिका दायर की थी। साथ ही उनका कहना था कि पुलिस के पास उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। उन्हें केवल अन्य आरोपियों के बयान और संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया।
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वहीं सातों याचिकाओं को लेकर पुलिस की ओर से दाखिल जवाब में आरोपियों की जमानत का विरोध किया गया था। पुलिस ने कहा था कि अगर आरोपियों को जमानत का लाभ दिया गया तो वह बाहर आकर जांच और सबूतों को प्रभावित कर सकते हैं। याचिकाओं पर बहस के बाद मंगलवार को अदालत ने सभी को जमानत के आदेश दिए।
यह है मामला
दो जून को पीजीआई में एंबुलेंस सेवा देने वाले दो गुटों में मारपीट की शिकायत सामने आई थी। सेक्टर-11 थाना पुलिस ने मौके से तीन एंबुलेंस चालकों को गिरफ्तार किया था। शुरुआती जांच में सामने आया कि आरोपी बिना परमिशन के पीजीआई में एंबुलेंस चला रहे थे। इस पर पुलिस ने मौके से दो एंबुलेंस जब्त की थी। बाद में पुलिस ने पीजीआई प्रशासन को पत्र लिख फर्जी एंबुलेंस चालकों पर कार्रवाई की सिफारिश की। पुलिस के पास पहले भी शिकायत आई थी कि ये एंबुलेंस चालक अन्य टैक्सी चालकों को वहां अपनी गाड़ियां नहीं लगाने देते थे। इससे अवैध रूप से चल रहे एंबुलेंस चालक लोगों से मनमाना किराया वसूलते थे।
जांच में सामने आया कि इन एंबुलेंस चालकों का नेटवर्क इतना तेज था कि जैसे ही किसी मरीज की मौत होती थी या पोस्टमार्टम होता था तो ये तुरंत उसके पास पहुंच जाते थे। मामले का खुलासा होने पर पुलिस ने तीन दिन में 12 फर्जी एंबुलेंस जब्त की थी। साथ ही पीजीआई के सात कर्मचारियों जिनमें सिक्योरिटी गार्ड के पद पर तैनात विनोद कुमार, शशि, गुरकिरपाल, शव बांधने का काम करने वाले अश्विनी कुमार, तीरथपाल, अश्विनी के अलावा मोर्चरी में तैनात विक्की को गिरफ्तार किया था। इन पर फर्जी एंबुलेंस चालकों को सूचना देने और बदले में उनसे कमीशन लेने का आरोप था।
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इससे पहले अश्विनी और तीरथपाल की ओर से दायर जमानत याचिका में कहा गया था कि दोनों को केस में झूठा फंसाया गया है। दोनों के अनुसार, रेडक्रॉस सोसायटी के मैनेजर अश्विनी खन्ना की ओर से पुलिस को दी गई शिकायत के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया है, जबकि दर्ज एफआईआर में उनके नाम नहीं हैं। दोनों का इस केस से कोई संबंध नहीं है और न ही पुलिस के पास उनके खिलाफ कोई सबूत है।
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वहीं गुरकिरपाल की ओर से कहा गया था कि उसे मामले में रंजिशन फंसाया गया है। जिन लोगों के बयान के आधार पर उसे गिरफ्तार किया गया था, वह उससे पुरानी रंजिश रखते हैं। इसके अलावा अन्य आरोपियों ने भी मामले में झूठा फंसाये जाने का आरोप लगाते हुए जमानत याचिका दायर की थी। साथ ही उनका कहना था कि पुलिस के पास उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। उन्हें केवल अन्य आरोपियों के बयान और संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया।
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वहीं सातों याचिकाओं को लेकर पुलिस की ओर से दाखिल जवाब में आरोपियों की जमानत का विरोध किया गया था। पुलिस ने कहा था कि अगर आरोपियों को जमानत का लाभ दिया गया तो वह बाहर आकर जांच और सबूतों को प्रभावित कर सकते हैं। याचिकाओं पर बहस के बाद मंगलवार को अदालत ने सभी को जमानत के आदेश दिए।
यह है मामला
दो जून को पीजीआई में एंबुलेंस सेवा देने वाले दो गुटों में मारपीट की शिकायत सामने आई थी। सेक्टर-11 थाना पुलिस ने मौके से तीन एंबुलेंस चालकों को गिरफ्तार किया था। शुरुआती जांच में सामने आया कि आरोपी बिना परमिशन के पीजीआई में एंबुलेंस चला रहे थे। इस पर पुलिस ने मौके से दो एंबुलेंस जब्त की थी। बाद में पुलिस ने पीजीआई प्रशासन को पत्र लिख फर्जी एंबुलेंस चालकों पर कार्रवाई की सिफारिश की। पुलिस के पास पहले भी शिकायत आई थी कि ये एंबुलेंस चालक अन्य टैक्सी चालकों को वहां अपनी गाड़ियां नहीं लगाने देते थे। इससे अवैध रूप से चल रहे एंबुलेंस चालक लोगों से मनमाना किराया वसूलते थे।
जांच में सामने आया कि इन एंबुलेंस चालकों का नेटवर्क इतना तेज था कि जैसे ही किसी मरीज की मौत होती थी या पोस्टमार्टम होता था तो ये तुरंत उसके पास पहुंच जाते थे। मामले का खुलासा होने पर पुलिस ने तीन दिन में 12 फर्जी एंबुलेंस जब्त की थी। साथ ही पीजीआई के सात कर्मचारियों जिनमें सिक्योरिटी गार्ड के पद पर तैनात विनोद कुमार, शशि, गुरकिरपाल, शव बांधने का काम करने वाले अश्विनी कुमार, तीरथपाल, अश्विनी के अलावा मोर्चरी में तैनात विक्की को गिरफ्तार किया था। इन पर फर्जी एंबुलेंस चालकों को सूचना देने और बदले में उनसे कमीशन लेने का आरोप था।