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पांचवें प्रांत की आड़ में

Tue, 26 Jun 2018 06:37 PM IST
kuldeep talwar कुलदीप तलवार
Updated Tue, 26 Jun 2018 06:37 PM IST
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Under the guise of fifth province
कुलदीप तलवार
पाकिस्तान की मौजूदा संसद का कार्यकाल 31 मई को पूरा हो चुका है। आम चुनाव 25 जुलाई 2018 को होने हैं, जिसे कार्यवाहक सरकार कराएगी। बहरहाल उसे कोई बड़ा फैसला लेने का अधिकार नहीं होगा। काबिले गौर है कि इससे ठीक कुछ दिन पहले पाक सरकार ने एक आदेश जारी कर पाक के कब्जे वाले पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान को अधिक प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार देने की घोषणा करते हुए इस इलाके की स्थानीय परिषद के आम अधिकारों को खत्म कर दिया है। 

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पाक केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस फैसले को सरकार की ओर से गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवा प्रांत बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठन ने इस फैसले की सख्त निंदा की है। इसके खिलाफ इलाके की जनता में व्यापक विरोध शुरू हो गया है।

भारत ने भी इस फैसले की कड़ी निंदा की है और कहा है कि जबरन कब्जा किए गए इलाके की स्थिति बदलने वाला पाक सरकार का यह फैसला अस्वीकार्य है। साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि 1947 के विले प्रस्ताव के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान समेत पूरा जम्मू व कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान को इन सभी इलाकों को तत्काल खाली कर देना चाहिए, जिन पर उसने जबरन कब्जा कर रखा है।

पाकिस्तान सरकार ने भारत के इस विरोध को खारिज कर दिया है। पाक सरकार के उक्त फैसले पर चीन ने टिप्पणी करने से इंकार करते हुए कहा है कि यह मुद्दा भारत-पाक के बीच का मुद्दा है और दोनों को आपसी बातचीत के जरिये हल करना चाहिए। 

दरअसल इन दिनों पाकिस्तान में विदेशी निवेश भंडार बड़ी तेजी से गिर रहा है और वहां की सरकार को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। इसके लिए उसने चीन के बैंकों से एक अरब डॉलर का कर्ज अच्छी ब्याज दर पर लिया है। इस कर्ज से पहले भी 1.2 अरब डॉलर का कर्ज पाक चीन से ले चुका है। पाक में आम चुनाव सिर पर हैं।

पाक सरकार को अपने सदाबहार मित्र चीन से और मदद की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए पाक की सरकार ने चीन को खुश करने के लिए पाक का पांचवा प्रांत बनाने के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान को अधिक प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार देने का फैसला लिया है। पाकिस्तान अभी तक गिलगित-बाल्टिस्तान सहित पूरे पाक अधिकृत कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता रहा है और उसके संविधान में इसका कोई जिक्र नहीं है।

चीन जानता है कि यह विवादित क्षेत्र है और उसका 50 अरब डॉलर का पूंजी निवेश इस क्षेत्र में चीन-पाक आर्थिक गलियारा बनाने के लिए सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस क्षेत्र से इस परियोजना के तहत 634 किलोमीटर का हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजरेगा।

इसलिए पाकिस्तान चीन की इस चिंता को भी दूर करना चाहता है। देखा जाए तो पाकिस्तान अगर यह कदम उठाता है, तो वह कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के 1948-49 के प्रस्ताव का उल्लंघन करेगा, जिसके अनुसार वह अपना दावा जताता रहा है और यहां जनमत संग्रह की मांग करता रहा है। लेकिन यह दावा करते हुए भूल जाता है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में जनमत संग्रह कराने से पहले उसे अपनी पूरी फौज को इस क्षेत्र से निकालना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उल्लेखनीय है कि इस तरह का प्रस्ताव 2014-15 में भी पारित किया गया था, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया। इसका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था। हकीकत तो यह है कि क्षेत्र की जनता पाकिस्तान से अलग होना चाहती है और इसके लिए जद्दोजहद कर रही है। 

उम्मीद करनी चाहिए कि चीन के दबाव के बावजूद पाक में आने वाली नई सरकार गिलगित-बाल्टिस्तान की सांविधानिक स्थिति के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगी। 
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