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कैदी जब आजादी का अर्थ लिखता है: रिहाई के बाद बंदियों का पुनर्वास समाज की जवाबदेही; अपराधमुक्त बन सकेगा समाज

Sat, 29 Aug 2026 10:23 AM IST
ज्योति भास्कर पवन कुमार कोठारी
पवन कुमार कोठारी Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 29 Aug 2026 10:23 AM IST
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सार
जेल में जब कैदियों ने निबंध लिखे, तो पाया कि उन्होंने क्या खोया है। उनके इस हिसाब से हम क्या पा सकते हैं?
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When prisoner writes meaning of freedom Rehabilitating inmates social responsibility for crime-free society
जेल (सांकेतिक) - फोटो : adobestock

विस्तार

करीब तीन दशक पहले की बात है, जब मैंने कारागार विभाग में अपनी शासकीय सेवा प्रारंभ की थी। तब कभी मैंने सोचा नहीं था कि शासकीय सेवा में मानवीय जीवन के इस पहलू से भी रूबरू होने का अवसर मिलेगा, जो कि सामान्य जीवन में हमें नहीं मिल पाता है। कारण है कि स्वतंत्र जीवन जीते हुए हमें उस स्वतंत्रता का महत्व नहीं समझ आता है, जो कि कारागार में निरुद्ध बंदियों के जीवन को देखने पर मुझे मिला। अपने तीन दशक के कार्यकाल में हजारों बंदियों के जीवन अनुभव को बहुत करीब से जानने का अवसर मुझे मिला। उसी अनुभव के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि आवेश में किया गया एक कृत्य किसी व्यक्ति के जीवन की स्वतंत्रता को कैसे समाप्त कर सकता है।



आज प्रत्येक दिन समाचार-पत्रों के माध्यम से खबर पढ़ने को मिलती है कि धैर्य एवं संयम की कमी के चलते किस प्रकार मानव जीवन पलभर में समाप्त होता जा रहा है। ‘पत्नी ने दवा खाने को कहा, तो चाकू से गोदा, बेटी को भी मार डाला’, ‘कुरुक्षेत्र में पति का पेट फाड़ बोरे में भर दीं आंतें-किडनी’, ‘पिता ने अपहरण कर बेटी की हत्या की’, ‘बहन को तंग करने पर की कैंटीन वाले की हत्या’ जैसे शीर्षक बस कुछ ही हैं। ऐसी खबरें लगभग हर दिन कहीं न कहीं सुनने और पढ़ने को मिलती हैं।


यही अभियुक्त जब बंदी के रूप में कारागार में निरुद्ध रहते हैं, तो उनकी जीवनशैली, संयम, धैर्य, अनुशासन एवं व्यवहार देखकर विश्वास करना मुश्किल होता है कि क्या ये वही व्यक्ति हैं, जो अभियुक्त हैं? आखिर जो व्यक्ति कारागार की चहारदीवारी के अंदर विपरीत परिस्थितियों में अपने धैर्य, संयम एवं अनुशासन का परिचय देता है, वह बाहर की स्वतंत्र दुनिया में ऐसा क्यों नहीं कर पाया? दरअसल, ये परिस्थितिजन्य अभियुक्त हैं, जिन्हें आवेग के एक क्षण ने एक स्वतंत्र नागरिक से अभियुक्त बना दिया।

एक और अनुभव से यह धारण पुष्ट हुई, जब अपने कारागार में एक निबंध प्रतियोगिता की प्रविष्टियां हमने पढ़ीं, विषय था : मेरा अपराध-क्या खोया, क्या पाया। कैदियों ने लिखा कि बंदी रहने पर वे क्या-क्या खोते हैं। किसी ने परिवारजन को खोया, मेहनत से कमाया हुआ सम्मान खोया, रिश्तों का विश्वास खोया, परिवार के साथ बिताने वाला आनंदपूर्ण समय खोया, मित्रों का साथ और आत्मविश्वास खोया। उन्होंने महसूस किया कि इसके अतिरिक्त और भी कई ऐसी चीजें हैं, जो बाहर की स्वतंत्र दुनिया में हमें प्राप्त हैं, किंतु उसका महत्व हमें महसूस नहीं होता। उन्हें इस बात का पश्चाताप था कि क्षणिक आवेश में लिए गए गलत निर्णय ने उनकी जिंदगी को बर्बाद कर दिया। स्वतंत्र समाज में रहने वालों के लिए ये अनुभव दिशा दे सकते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से देखें, तो पाएंगे कि स्वतंत्र समाज में रहने वाला व्यक्ति आवेशित क्षणों में बंदियों की इन बातों को दिमाग में रखकर उस परिस्थिति को टाल सकता है।

बंदियों को उनकी रिहाई के बाद बिना कोई पूर्वाग्रह रखते हुए स्वतंत्र समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयास किए जाने चाहिए। स्वतंत्र समाज की प्रतिष्ठित संस्थाओं एवं समाजसेवकों को रिहाई उपरांत इन बंदियों को एक प्लेटफाॅर्म उपलब्ध कराना चाहिए, जिससे कि न केवल रिहाई के बाद बंदियों के पुनर्वास में सहायता मिल सके, बल्कि उनके अनुभव से अपराधमुक्त समाज की दिशा भी प्रशस्त हो सके।

-लेखक जेलर हैं, जिन्हें दो बार राष्ट्रपति पदक मिला है।

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