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दूसरी क्रांति का वक्त: 20वीं सदी में भारत ने भुखमरी को हराया था, अब क्लीन रिवोल्यूशन का बिगुल फूंकने का समय
Fri, 28 Aug 2026 08:42 AM IST
ज्योति भास्कर
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार।
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Fri, 28 Aug 2026 08:42 AM IST
सार
व्यवस्था ऐसी बननी चाहिए कि हर नागरिक की थाली में पहुंचने वाला निवाला सुरक्षित हो। 20वीं सदी में भारत ने भुखमरी को हराया था। 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती स्वस्थ रहने की है। वक्त आ गया है कि देश ग्रीन रिवोल्यूशन से आगे बढ़कर क्लीन रिवोल्यूशन का बिगुल फूंके।
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सेहत से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रही दुनिया
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स
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विस्तार
यह बात सिर्फ किसी एक अफसर की बहादुरी के किस्सों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जब तक हम इसे प्रशासनिक तालियों से निकालकर ठोस नीति के दायरे में नहीं लाएंगे, तब तक आम आदमी की थाली में परोसा जा रहा जहर कम नहीं होगा।
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कुछ दशक पहले भारत के सामने संकट था-देश की इतनी बड़ी आबादी का पेट कैसे भरें? भुखमरी का डर था, गोदाम खाली थे। तब देश ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और हरित क्रांति (ग्रीन रिवोल्यूशन) का आगाज हुआ। पैदावार बढ़ी, खेत लहलहाए और भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। उस दौर की जरूरत अनाज उत्पादन की मात्रा बढ़ाने की थी, और हमने वह लक्ष्य हासिल कर लिया। लेकिन आज? आज संकट बदल चुका है। आज चुनौती यह नहीं है कि थाली में खाना है या नहीं। आज सबसे बड़ा और जानलेवा सवाल यह है कि थाली में जो खाना है, क्या वह हमें जिंदा रख रहा है या फिर आहिस्ता-आहिस्ता बीमार बना रहा है? क्या एक अफसर के भरोसे देश की सेहत को छोड़ा जा सकता है?
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हाल के दिनों में महाराष्ट्र में एफडीए अफसर तुकाराम मुंढे के ताबड़तोड़ छापों और देश के अलग-अलग हिस्सों में मिलावटखोरों पर हुई कार्रवाई ने एक बार फिर हमारी आंखें खोली हैं। कहीं सिंथेटिक पनीर पकड़ा जा रहा है, कहीं मसालों में कैंसर पैदा करने वाले रसायन मिल रहे हैं। सब्जियों को हरा दिखाने के लिए जहरीले रंग का इस्तेमाल हो रहा है और फलों को पकाने के लिए खतरनाक कार्बाइड का।
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जब कोई तुकाराम मुंढे जैसा अफसर डंडा चलाता है, तो जनता वाह-वाह करती है। हम अफसर की व्यक्तिगत निष्ठा और सख्ती की तारीफ जरूर करें, लेकिन साथ ही यह कड़वा सवाल भी पूछें कि क्या करीब 140 करोड़ के देश में शुद्ध खाना किसी एक अफसर के मूड, ट्रांसफर या पोस्टिंग पर निर्भर करेगा? अगर एक अफसर के होने से ही मिलावट रुकती है, तो यह सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी का सबूत है। जिस जिले में ‘मुंढे’ जैसा अफसर नहीं बैठा, क्या वहां की जनता जहर खाने के लिए अभिशप्त है?
सुरक्षित खाना जनता का बुनियादी हक है, कोई लॉटरी नहीं कि अच्छा अफसर मिला तो बच गए, वरना अस्पताल पहुंच गए। हम एक साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी के दौर में हैं। आज देश में कैंसर के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वह किसी महामारी से कम नहीं है। यह आंकड़ा 15 लाख सालाना पहुंच गया है और 2045 तक यह आंकड़ा 25 लाख सालाना हो जाएगा। 30-35 साल के नौजवान, जिनका कोई पारिवारिक मेडिकल इतिहास नहीं रहा, वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। वजह साफ है-हम चारों तरफ से घिर चुके हैं। खराब हवा फेफड़ों में जा रही है। गंदा और रसायनयुक्त पानी भूजल को बर्बाद कर रहा है। जहरीला खाना हमारी नसों में घुल रहा है। खेतों में ज्यादा पैदावार के चक्कर में अंधाधुंध कीटनाशकों और रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है। जो जमीन कभी सोना उगलती थी, वह जहरीली हो चुकी है। वही पेस्टीसाइड भूजल में रिस रहा है और वही अनाज व सब्जियों के जरिये हमारे शरीर में पहुंच रहा है।
खेत से मंडी, मंडी से प्रोसेसिंग यूनिट और प्रोसेसिंग यूनिट से हमारी मेज तक, हर स्तर पर समझौता हो रहा है। हालत यह है कि विदेशी कंपनियां अपने मुल्क में कड़े नियमों का पालन करते हुए बेहतरीन गुणवत्ता का माल (उत्पाद) बेचती हैं, लेकिन हिंदुस्तान के बाजार में आते ही वही कंपनियां हमें चीनी का घोल और घटिया सामग्री पकड़ा देती हैं। आखिर क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि यहां का रेगुलेटरी सिस्टम कमजोर है और सजा का कोई खौफ नहीं।
हरित क्रांति ने हमें अन्न दिया, लेकिन अब इस क्रांति का अधूरा काम पूरा करने का वक्त आ गया है। ग्रीन रिवोल्यूशन की अगली तार्किक और अनिवार्य कड़ी है-क्लीन रिवोल्यूशन। इसका दायरा सिर्फ दुकानों पर छापे मारने तक सीमित नहीं हो सकता। इसे खेत से लेकर मेज (फार्म टू टेबल) तक लागू करना होगा। किसानों को खेतों में प्रतिबंधित और खतरनाक कीटनाशकों के इस्तेमाल से दूर करना होगा। जैविक और सुरक्षित खेती को केवल कागजों तक सीमित रखने के बजाय, इसे बढ़ावा देने के लिए प्रभावी प्रोत्साहन और सब्सिडी देनी होगी। फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और पैकेजिंग के लिए सख्त गुणवत्ता मानक लागू किए जाएं। साथ ही, डिजिटल ट्रैकिंग अनिवार्य हो, ताकि खेत से बाजार तक हर पैकेट की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। शुद्ध और सुरक्षित भोजन केवल महानगरों के संपन्न वर्ग के लिए महंगे ‘ऑर्गेनिक’ (जैविक) उत्पादों तक सीमित नहीं होना चाहिए। देश के हर नागरिक को सस्ता, सुलभ और विषमुक्त भोजन उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
यह लड़ाई किसी एक विभाग या चंद उत्साही अफसरों के छापों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए नीति निर्धारकों को आगे आना होगा। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और राज्य फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) को आधुनिक संसाधन और स्वायत्तता मिले। जिला स्तर पर अत्याधुनिक टेस्टिंग लैब हों, जहां घंटों में रिपोर्ट आए, महीनों में नहीं। खाने में मिलावट करना सिर्फ व्यापारिक धोखाधड़ी नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य पर सीधा हमला है। इसे हत्या के प्रयास की तरह देखा जाए और कड़ी सजा तय हो। जो मानक यूरोप और अमेरिका में हैं, वही मानक भारतीय बाजारों के लिए भी अनिवार्य हों। हिंदुस्तान को किसी कंपनी का ‘डंपिंग ग्राउंड’ नहीं बनने दिया जा सकता।
देश की आर्थिक तरक्की और ऊंची जीडीपी के आंकड़े तब बेमानी लगने लगते हैं, जब एक आम परिवार अपनी पूरी जिंदगी की कमाई अस्पताल के भारी-भरकम बिलों और कीमोथेरेपी के खर्च में गंवा देता है।
अफसर आएंगे और जाएंगे। तबादले होंगे, रिटायरमेंट होंगे। लेकिन, सिस्टम ऐसा बनना चाहिए कि हर नागरिक की थाली में पहुंचने वाला निवाला सुरक्षित हो और यह नियम हो, अपवाद नहीं। 20वीं सदी में भारत ने भुखमरी को हराया था। 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती स्वस्थ रहने की है। वक्त आ गया है कि देश ग्रीन रिवोल्यूशन से आगे बढ़कर क्लीन रिवोल्यूशन का बिगुल फूंके।