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सियासत में कुछ भी यों ही नहीं कहा जाता: दिमागी नक्सली मतलब ‘गैर-भारतीय’ बौद्धिक वर्ग, फासीवाद की गंभीरता कम...

Sat, 29 Aug 2026 07:25 AM IST
SPrasannarajan प्रसन्नराजन एस प्रसन्नराजन
Updated Sat, 29 Aug 2026 07:25 AM IST
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सार
सिसरो से लेकर चर्चिल, एनोक पॉवेल, ओबामा, ट्रंप या फिर मोदी हों, ये नेता जब कुछ कहते हैं, तो उसका मतलब होता है। मोदी जब दिमागी नक्सली कहते हैं, तो उनका मतलब उस बौद्धिक वर्ग से है, जिसे वह ‘गैर-भारतीय’ मानते हैं और हर वक्त जिसके निशाने पर वह खुद रहते हैं।
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Nothing casual in politics PM Modi Urban Naxal implies anti-Indian intellectuals downplays gravity of fascism
पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

राजनीति में अभी सब कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि, जो पहले कहा जा चुका है, उससे पता चलता है कि शब्द किस तरह राजनीतिक जीवन को आकार दे रहे हैं। कुछ नेता भाषा का इस्तेमाल करके आम सहमति के सुकून को तोड़ने, अपने समर्थकों को खुश करने और यथास्थिति बनाए रखने वालों को परेशान करने में इतने माहिर होते हैं कि कभी-कभी उनके शोर-शराबे को ही असली बात या ठोस काम समझ लिया जाता है। पीछे मुड़कर देखें तो, असरदार और छोटे-छोटे जुमले गढ़ने वाले उन माहिर लोगों ने इतिहास को समझने वालों के लिए भाषा के आसान रास्ते तैयार किए हैं।



सिसरो से लेकर चर्चिल, एनोक पॉवेल और ओबामा तक, प्रभावशाली भाषण देने की परंपरा ने तर्कों को सिर्फ रूपक वाली ताकत ही नहीं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा मजबूती दी है। बेतहाशा प्रवासियों के आने के बाद खून से उफनती टाइबर नदी का जिक्र करने की वजह से जिन्हें अक्सर एक सलीकेदार नफरत फैलाने वाले के तौर पर पेश किया जाता था, उस ब्रिटिश कंजर्वेटिव नेता ने भविष्य के लिए कही गई एक और यादगार बात में विनम्रता से यह स्वीकार किया कि ‘सभी राजनेताओं का कॅरिअर आखिर में नाकामयाबी पर ही खत्म होता है।’


रंगभेद की बंदिशों के बावजूद ‘यस वी कैन’ (हां, हम कर सकते हैं) में यकीन रखने वाले नेता ने अमेरिकियों को सपनों की संभावनाएं दिखाईं। आखिर में, उन्होंने साबित किया कि उनकी उम्मीदवारी उनके राष्ट्रपति पद से कहीं बड़ी थी, जिससे उनके मूल नारे की सीमाएं भी सामने आ गईं। हो सकता है कि मिखाइल गोर्बाचेव ने अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की उस सलाह को गंभीरता से लिया हो, जिसमें उन्होंने ‘इस दीवार को गिराने’ की बात कही थी। कुछ समय बाद बर्लिन की दीवार सचमुच गिर गई। लेकिन, गोर्बाचेव अपने राजनीतिक पतन को नहीं रोक सके। उन्होंने जिन बदलावों और विचारों को बढ़ावा दिया, उन्हीं ने आखिरकार सोवियत साम्राज्य के टूटने की राह तैयार कर दी। 1945 में मित्र देशों की जीत तक चर्चिल के शब्द उनके साथ रहे, लेकिन युद्ध के मैदान में मिली शानदार जीत के बाद देश में अपनी हार पर उन्होंने जो कहा, उसे उनके बेहतरीन और मशहूर सुविचारों की तरह अक्सर याद नहीं किया जाता। बोले गए शब्द राजनीति को धार देते हैं; लेकिन जब इतिहास का दखल होता है, तो वही शब्द बोलने वाले को बचा नहीं पाते।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने अनौपचारिक और सटीक अंदाज में बात करने की कला में महारत हासिल की है। वह तथ्यों के साथ खेल सकते हैं और सच को जरूरी बहस का मुद्दा बना सकते हैं। हालांकि, उनके शब्द ‘covfefe’ का मतलब मेरियम-वेबस्टर डिक्शनरी में नहीं मिलता। ट्रंप राष्ट्रपति के तौर पर बातचीत के मामले में ओबामा से बिल्कुल उलट हैं; उनकी बातचीत तेज-तर्रार, संक्षिप्त और बोलचाल की भाषा वाली होती है। इसे राष्ट्रपति की भाषा में ‘मागा मिनिमलिज्म’ (कम से कम शब्दों में मेक अमेरिका ग्रेट अगेन वाली बात कहना) कह सकते हैं। किसी भी स्थिति को विचारों या भाषा की जटिलता के साथ पेश नहीं किया जाता, और तारीफ या बुराई को बस चार शब्दों में समेट दिया जाता है: अच्छा, बुरा, सुंदर और भयानक। सोशल मीडिया के दौर में कम शब्दों में प्रभावी बात कहना समझदारी है। पर, ट्रंप ने कई बार बिना ज्यादा सोचे-समझे बेहद कम शब्दों में ऐसी बातें कहीं, जो बहुत साधारण या सतही थीं। फिर भी, ट्रंप को इसके लिए कोई श्रेय नहीं मिला।

लोग अब रूपकों और मुहावरों के बजाय सीधी और साफ भाषा में किए गए अपमान को ज्यादा पसंद करते हैं। बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय, आक्रामक तरीके से बोलने वाले लोग जल्दी चर्चा में आ जाते हैं। भले ही ऑरवेल ने अपने निबंध पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज  में ‘घिसे-पिटे और बेकार वाक्यांशों’ को छोड़ने की बात कही हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्होंने भविष्य की उस बेचैनी का अंदाजा लगाया था, जहां बातचीत में ऊंचे विचारों या गरिमा का कोई खास महत्व नहीं रह जाएगा? जब ऊंचे विचारों और आदर्शों की बात आती है, तो भारत का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है। गांधीजी खुद एक दार्शनिक संत जैसे थे; वह आजादी की लड़ाई में सबसे आगे रहकर भी लगातार आजादी के बारे में नैतिक बातें कहते रहते थे। आजादी से पहले के भारत के संघर्षों में विचारों की गहराई लाने में उनके शब्दों की भूमिका उतनी ही अहम थी, जितने उनके कामों की। सत्ता में रहते हुए नेहरू एक स्वाभाविक बुद्धिजीवी थे; उनकी वैश्विक सोच हमेशा वामपंथी विचारधारा से जुड़ी रही, लेकिन उनकी भाषा की सुंदरता में कभी भी विचारधारा वाली भारी-भरकम शब्दावली का इस्तेमाल नहीं हुआ। इंदिरा गांधी कोई कवयित्री नहीं थीं, लेकिन चुनावी रैलियों में वह ‘भारत माता’ जैसी भावनात्मक छवि पेश करती थीं-एक ऐसी भूमिका, जिसे निभाना उन्हें बहुत पसंद था।

आज नरेंद्र मोदी एक जबर्दस्त वक्ता हैं, जो लोगों के मन में अपनी जगह पक्की करने के लिए हमेशा नए-नए शब्द ढूंढते रहते हैं। एक शानदार प्रचारक के तौर पर, वह दुश्मन की (चाहे वह देश के अंदर हो या सीमा पार) ऐसी तस्वीर पेश करते हैं, जो बहुत तीखी और कठोर होती है। उनके कुछ समर्थक उम्मीद करते थे कि सत्ता में आने के बाद भी वह वैसे ही नाटकीय और बड़े कदम उठाएंगे। लेकिन, मोदी ने समझदारी से भाषण और शासन के बीच का फर्क बनाए रखा है। वह सरकार चलाते समय धीरे-धीरे और सोच-समझकर फैसले लेते हैं, केवल सुर्खियां बटोरने के लिए नहीं। स्वतंत्रता दिवस के दिन, उन्होंने दुश्मन को शर्मिंदा करने के लिए एक और शब्द का इस्तेमाल किया: ‘दिमागी नक्सल’। इसका मतलब है: ऐसा कट्टर वामपंथी, जो अपनी वैचारिक प्रेरणा क्रांतियों की उन पुरानी किताबों से लेता है, जिन्हें अब भुला दिया गया है। ये छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के जंगलों वाले नक्सली नहीं, बल्कि ‘दिमाग’ वाले नक्सली हैं। हो सकता है, मोदी सच में मानते हों कि असली विपक्ष इंडिया गठबंधन नहीं, बल्कि वह बौद्धिक वर्ग है, जिसे वह ‘गैर-भारतीय’ मानते हैं।

भाषा राजनीतिक हथियारों में से एक है, और ‘नक्सल’ शब्द को बहुत सोच-समझकर चुना गया है, ताकि उस व्यक्ति को अलग-थलग किया जा सके, जिसकी सोच ‘उनके भारत’ से मेल नहीं खाती। फिर, खुद मोदी उन तथाकथित ‘दिमागी नक्सलियों’ के निशाने पर रहते हैं, जो राजनीति का सबसे बुरा संबोधन ‘फासीवादी’ उन लोगों पर उछालते हैं, जो उन्हें बर्दाश्त नहीं करते। ऐसा करते हुए वे खुद फासीवाद की गंभीरता को कम कर देते हैं। लोगों से अपनी बात मनवाना एक मुश्किल कला है और भाषा हर किसी को इसमें माहिर बनने में मदद नहीं करती। 

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