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व्यवस्था के निशाने पर आम आदमी

Fri, 01 Mar 2013 10:17 PM IST
अरुण नेहरू
अरुण नेहरू Updated Fri, 01 Mar 2013 10:17 PM IST
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system target to common man

लोकसभा चुनाव के लिए बहुत कम समय बचा है। ऐसे में आगामी चुनाव के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करने एवं संभावित रुझानों पर बात करने का यही समय है। वास्तविकताओं को जानकर तो हम सभी समझदार बन जाते हैं, लेकिन हममें से कितने लोग 2004 के रुझानों को ठीक-ठीक समझ पाए थे, जब अल्पसंख्यक मतों ने 2002 की गुजरात हिंसा के खिलाफ निर्णायक हवा बनाई थी, या फिर 2009 में जब यूपीए की नकारात्मकता पर उसके सकारात्मक फैसलों ने बढ़त बनाई थी, जिस कारण कांग्रेस 200 से ज्यादा सीटें जीतने में सफल रही थी। पर क्या यही परंपरा 2014 के चुनाव में भी दिखेगी? यह तो समय बताएगा, लेकिन मेरा मानना है कि राजनीति में एक साल का समय भी काफी होता है।

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राजनीति का मैदान अभी खुला पड़ा है। जैसा कि मैं देख रहा हूं, आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एवं भाजपा, दोनों 130 से 140 सीटें जीत सकती हैं, जबकि तीसरा मोर्चा और अन्य दल 260 से 270 सीटें जीत सकते हैं। ऐसे में थोड़े समय के लिए तीन से चार गठजोड़ हो सकते हैं। सच्चाई यह है कि अगले 12 से 15 महीनों की घटनाओं के बारे में भी कोई सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता। हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां चीजें तत्काल निर्धारित होती हैं। टीवी चैनलों में हर दिन दुनिया बदल जाती है और महत्वपूर्ण मुद्दे भी कुछ ही समय टिकते हैं। पर क्या ये सब चीजें भी उस हिमाचल प्रदेश के जनादेश पर असर डाल पाईं, जो दिल्ली से महज डेढ़ सौ मील दूर है?
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हमने हाल ही में इटली का चुनाव देखा, जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया। यही हमने यूनान के चुनाव में भी देखा। आर्थिक संकट के इस युग में वोट लगातार छोटे गुटों में बंटते जा रहे हैं। अगर हमारे यहां 2014 के चुनाव में भी ऐसा हो, तो मुझे हैरानी नहीं होगी।
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मैंने तीसरे मोर्चे द्वारा 260 से 270 सीटें जीतने का आकलन किया है, जिसमें प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार होंगे। 130 से 140 सीटें जीतने वाली कांग्रेस एवं भाजपा के लिए सरकार बनाना या किसी तरह का स्थायित्व प्रदान करना तो मुश्किल होगा, पर वैसे में आश्चर्यजनक एवं राजनीतिक दुर्घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि तब सरकार बनाने के लिए उठापटक होगी। क्या कोई क्षेत्रीय दलों के उभरते हुए मोर्चे को खारिज कर सकता है, जो लगभग 200 सीटें जीत सकता है और जिसे या तो कांग्रेस का सहयोग मिलेगा या भाजपा का? या हम कांग्रेस या भाजपा को 150 से 160 सीटों के करीब पहुंचते और बाकी दलों को 90 से 100 सीटों पर पीछे छोड़ते हुए देख सकते हैं। भविष्य में इस तरह के समीकरण मुमकिन हैं।

चुनावी वर्ष ने रेल एवं आम बजट, दोनों को प्रभावित किया है, तो इसमें आश्चर्य नहीं। 2013 का साल पूरे वैश्विक समुदाय के लिए कठिन है। हम पूरी दुनिया में राजनीतिक उथल-पुथल देख सकते हैं। हम एक मुश्किल वक्त में जी रहे हैं। दूरसंचार क्षेत्र की घटनाओं पर गौर कीजिए। दूरसंचार क्रांति हमारी महान सफलता है, लेकिन यह एक बड़ी आपदा में तब्दील हो सकती है। बेशक हम एक-दूसरे पर आरोप मढ़ सकते हैं, पर सच यही है कि यह क्षेत्र वास्तव में संकट से गुजर रहा है। क्या हमें संकट को चुपचाप देखते रहना चाहिए? ऐसे में विदेशी निवेश तो दुर्लभ हो जाएगा।

मोबाइल फोन ने देश की तस्वीर बदल दी है। बड़ी बात यह कि इसने आम आदमी को भी सशक्त बनाया है। समय के साथ केवल बड़ी चीजें ही बचती हैं। हम भूल जाते हैं एक बार अगर उद्योग-जगत मंदी की चपेट में आ गया, तो उससे उबरने में एक दशक या उससे ज्यादा का समय लगेगा। एक राष्ट्र के रूप में हमें क्या हो गया है? हम देश और विदेश, दोनों जगह संकट एवं आरोपों के घेरे में हैं, जो एक दशक या उससे ज्यादा समय तक चल सकता है। ऐसे माहौल में क्या कोई हमारे यहां निवेश करने में दिलचस्पी लेगा?

पिछले कुछ महीनों में हमने कई ऐसे मामले देखे, जब आतंकवाद से जुड़े होने के आरोप में अल्पसंख्यक समुदाय के कई युवाओं को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। यह एक गंभीर मामला है, जिससे सिर्फ फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर नहीं निपटा जा सकता। छानबीन की जाए, तो पता चलेगा कि हजारों निर्दोष वर्षों से जेल में हैं। मुतिउर रहमान सिद्दीकी का ही मामला लीजिए। बंगलूरू में गिरफ्तार हुए 26 साल के इस पत्रकार को छह महीने बाद जेल से मुक्ति मिली। वह पिछले साल सितंबर में बंगलूरू, हुबली, नांदेड और हैदराबाद में गिरफ्तार किए गए पंद्रह लोगों में था।

सवाल यह है कि बार-बार एक तरह की गलती कैसे हो जाती है। जो लोग ये गलतियां करते हैं, क्या उन्हें जेल में नहीं होना चाहिए? एक जांच प्रक्रिया पांच से दस साल चलती है और एक नागरिक बगैर जुर्म के जेल में दस साल बिता देता है। खोए हुए उसके एक दशक की भरपाई कौन करेगा?


आम आदमी सिर्फ भुगतता ही नहीं है, बल्कि उस पुलिस के लिए 'आसान शिकार' भी है, जिस पर ठोस काम करने का दबाव है। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि निर्दोष लोगों को जेल में ठूंस दिया जाए! गुजरात में हम ऐसे कई मामले देख चुके हैं, हमने मालेगांव में यह देखा है, और लाजपत नगर विस्फोट मामले में भी यही दृश्य देख चुके हैं। मुतिउर रहमान सिद्दीकी और यूसुफ नलबंद जैसे लोगों के साथ हुए अन्याय माफी से अधिक की मांग करते हैं।

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