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गरीबों का राशन

ritika khedaरीतिका खेड़ा Updated Fri, 15 Jun 2018 06:48 PM IST
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सितंबर, 2017 से झारखंड में दस से अधिक भूख से संबंधित मौतें हो चुकी हैं। भूख से ज्यादातर कमजोर तबके के लोग प्रभावित हैं - बच्चे, बूढ़े, एकल महिलाएं, आदिवासी और दलित। इन सबके पीछे, किसी न किसी तरह, आधार की भूमिका रही है। आधार, सरकार रोज जिस पर टीवी और अखबारों में विज्ञापनों पर खर्च कर रही है। इनमें आधार का प्रचार करने वाले अभिनेता इसकी तारीफ करते दिखते हैं। गौरतलब है कि, सूचना के अधिकार द्वारा जब आधार विज्ञापन पर खर्च की गई राशि के बारे में पूछा गया, तो सरकार ने जवाब देने से मना कर दिया।
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केंद्र सरकार के दबाव में, झारखंड सरकार के खाद्य विभाग ने 2017 में आदेश दिया कि जुलाई, 2017 के बाद, ऐसे सभी राशन कार्ड रद्द कर दिए जाएं, जो आधार कार्ड से न जोड़े गए हों। इस फैसले के पीछे 'तर्क' यह था कि यदि राशन कार्ड किसी भी आधार कार्ड से नहीं जुड़ा हो तो, इसका मतलब वह परिवार 'फर्जी' है। इसकी आशंका जरूर है कि बिना आधार कार्ड का राशन कार्ड फर्जी हो; लेकिन इसके और कारण हो सकते हैं-जैसे कि किसी व्यक्ति का आधार कार्ड नहीं बन रहा, या बना है, लेकिन उसे लिंक नहीं कर पाए। परिणाम यह हुआ कि सितंबर 2017 में एक दिन संतोषी कुमारी (केवल ग्यारह वर्ष की थी) मां से 'भात-भात' मांगते-मांगते बेहोश हो गई और फिर मर गई। उसके परिवार का राशन कार्ड इसलिए काट दिया गया था, क्योंकि सरकार द्वारा दी गई अंतिम तारीख तक वह अपना आधार कार्ड राशन कार्ड से, प्रयत्न करने के बावजूद, नहीं जोड़ पाए।

संतोषी की मौत से पहले, अगस्त में, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, झारखंड सरकार ने जोर-शोर से प्रचार किया कि आधार की वजह से लाखों की संख्या में फर्जी राशन कार्ड कटे हैं और इससे कितनी बचत हुई है। संतोषी के मरने से यह समझ आया कि सरकार की 'बचत' की परिभाषा कुछ अलग ही है। अपने हक से लोगों को वंचित करना, चाहे भूख से मौत ही क्यों न हो जाए, वह भी बचत है। आधार इस नए तरीके से परिभाषित 'बचत' में कई प्रकार से सरकार की मदद कर रहा है। आधार नहीं, तो राशन काट देना एक तरीका है। दूसरा तरीका यह है कि हर महीने राशन लेते समय लोगों से उनकी उंगलियों के निशान का सत्यापन करना। इसके पीछे भी ‘तर्क’ है। तर्क यह है कि आज तक मेरा राशन कोई और ले जा रहा था। उंगलियों के निशान सत्यापित करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि मेरा राशन मुझे ही मिले।

झारखंड और अन्य राज्यों में किए गए सर्वेक्षणों में हमने पाया कि यह जरूर होता है कि किसी एक व्यक्ति का राशन कोई और ले जा रहा है, लेकिन ज्यादातर यह वे लोग होते हैं, जो इतने बूढ़े और लाचार हैं कि राशन की दुकान तक खुद नहीं जा सकते, इसलिए अपने रिश्तेदार या पड़ोसी से अपना राशन मंगवा लेते हैं। उंगलियों के सत्यापन के चलते अक्तूबर, 2017 में रूपलाल मरांडी गुजर गए। मजदूरी करके खाने वाला परिवार था। रूपलाल पैर में चोट की वजह से काम पर नहीं जा पा रहे थे। उनका राशन कार्ड था, लेकिन परिवार में किसी की उंगलियां सत्यापित नहीं हो रही थीं, इसलिए दो महीने लगातार अनाज नहीं ले पाए।   

संतोषी और रूपलाल के बाद, झारखंड में भूख के कारण कई और मौतें हुई हैं। इतवारिया देवी और प्रेमनी कुंवर 2017 में गुजर गईं। कहीं राशन, तो कहीं पेंशन आधार की वजह से रुक गई। 2018 में तीस-वर्षीय बुधनी सोरेन की मौत हो गई। सर्दी और बुखार की वजह से काम पर नहीं जा सकी थी, आधार की वजह से राशन रुक गया, कमजोरी और भूख ने बुधनी की जान ले ली। इन सबमें सरकार का यह कहना है कि इसका न तो भूख से कुछ लेना देना है, और न ही आधार से।

इस प्रतिक्रिया में सबसे निराशाजनक बात ऐसे बयान की संवेदनहीनता या तथ्य विपरीतता नहीं, बल्कि यह है कि सरकार समस्या को नकार रही है, जिससे यह हो रहा है कि उपाय की खोज शुरू ही नहीं हुई। इसके चलते, पिछले दो हफ्तों में झारखंड में फिर भूख से संबंधित चार मौतें हो गईं। इनमें से कुछ ऐसे लोग थे, जिनका राशन कार्ड ही नहीं बन पाया, आवदेन पंचायत सचिव के पास महीनों से पड़ा है। ध्यान से सोचा जाए, तो ये मौतें भी आधार संबंधित हैं। यह इसलिए कि जमीन पर स्थिति यह है कि सभी अधिकारियों को स्पष्ट आदेश हैं कि सबसे जरूरी काम है आधार बनवाना और उसे हर सरकारी योजना से जोड़ना।

इस आधार लिंकिंग के काम की वजह से हड़बड़ी मची हुई है, और पंचायत सचिव से लेकर रांची में सचिव केवल इस काम को तवज्जो दे रहे हैं, जिससे असली काम (जैसे नए राशन कार्ड स्वीकृत करना) रुके हुए हैं। सरकार इस सब को नजरअंदाज कर रही है : उसके अनुसार भूख से मौत नहीं हुई, आधार का इन मौतों में कोई भूमिका नहीं। सरकार यह मानने को तैयार नहीं कि मरने वालों की जिंदगी में जन वितरण प्रणाली की कितनी अहम भूमिका है। 

स्थानीय मीडिया इस मुद्दे पर जरूर नजर रख रहा है, लेकिन राष्ट्रीय मीडिया को नेताओं ने अपने बेतुके बयानों में उलझा कर रखा हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय भी सब कुछ देखते हुए अब तक आम लोगों के लिए कुछ खास नहीं कर पाया। आजकल अपने आप को गरीबों की पार्टी के रूप में पैकेज करने की कोशिश में लगी कांग्रेस के केंद्रीय नेता आधार के खिलाफ साफ बयान देने से कतरा रहे हैं (क्योंकि आधार उन्हीं के द्वारा लाया गया था)। अन्य विपक्षी नेता, जिन्हें सड़कों पर होना चाहिए था, इस मुद्दे पर ट्वीट करने में लगे हैं। उम्मीद है कि आधार राजनीतिक मुद्दा बनेगा और हमारे लोकतंत्र में सबसे कमजोर लोगों की आवाज को भी जगह मिलेगी।

-आईआईएम अहमदाबाद से संबद्ध अर्थशास्त्री व समाज विज्ञानी।
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