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2025: क्या कह रहे हैं साल के कुछ आखिरी दिन, बदलती पसंद और प्राथमिकताओं को समझना जरूरी

Sat, 27 Dec 2025 06:59 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sat, 27 Dec 2025 06:59 AM IST
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सार
2025 के अंत में हम स्मॉग इकनॉमी के जन्म को देख रहे हैं, जहां सांस लेने लायक हवा एक विशेष उत्पाद बन गई है, जो उन्हीं को मिलती है, जो इसके लिए भुगतान कर सकते हैं। साल के अंतिम कुछ दिन चेताते हैं कि कड़े निर्णय लेने का वक्त अब आ गया है।
 
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major social change is being observed in India, which is being called oxygen migration
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

दशकों से भारतीयों का सपना ‘बड़े शहरों’ के जबर्दस्त आकर्षण से जुड़ा रहा है-गुरुग्राम की ऊंची इमारतों का सपना, मुंबई की आर्थिक धड़कन, या बंगलूरू के टेक्नोलॉजी हब का आकर्षण। हाल तक घर के आकार व वेतन से सफलता को मापा जाता था। पर जैसै-जैसे 2025 खत्म होने वाला है, नया रुझान सामने आ रहा है।


भारत में एक बड़ा सामाजिक बदलाव दिख रहा है, जिसे ऑक्सीजन माइग्रेशन कहा जा रहा है, यानी लोग अब साफ हवा की तलाश में बड़े शहरों को छोड़ रहे हैं। अब सपना पैसे कमाने या बड़ा घर पाने से ज्यादा, साफ हवा में सांस लेने की क्षमता के इर्द-गिर्द घूम रहा है। पहले यात्रा आमतौर पर स्कूल की छुट्टियों या त्योहारों के दौरान साल के कुछ खास महीनों में ही होती थी। पर आज परिस्थितियों के अनुसार यात्राएं हो रही हैं। जैसे ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर (एक्यूआई) 400 के पार चला जाता है, अमीर लोग तुरंत शहर से निकलने लगते हैं। अब यह आराम या मौज-मस्ती के लिए की जाने वाली ‘ट्रिप’ नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य-संबंधी जरूरत बन गई है, जिसे छुट्टी का नाम दे दिया गया है।


मेकमाईट्रिप और ईजमाइट्रिप जैसे ट्रैवल प्लेटफॉर्म ने इन धुंध भरे महीनों में अचानक बढ़ी हुई बुकिंग्स दर्ज की हैं, खासकर प्रदूषण से भरे बड़े शहरों से। आंकड़ों के अनुसार, अंतिम समय में होने वाली इन यात्राओं में 30-35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अब लोग होटल या जगह चुनते समय पहले जैसी बातें-जैसे नजारे कैसे हैं या बाजार कितने पास हैं, नहीं पूछते। वे अब रियल-टाइम वायु गुणवत्ता की जांच करते हैं। गंगटोक, मुन्नार और अंडमान जैसे साफ हवा वाले स्थान अब पसंदीदा गंतव्य बन गए हैं। इससे ‘वेलनेस वर्ककेशन’ की नई शुरुआत हुई है।

अब जब हाइब्रिड वर्क मॉडल कॉरपोरेट भारत में अच्छी तरह से जम गया है, तो मध्यम से उच्च ओहदों पर काम करने वाले लोग अपने पूरे परिवार के साथ गोवा या हिमाचल के इलाकों में रहने चले जाते हैं। वे रोमांच या घूमने के लिए नहीं जाते, बल्कि अपने बच्चों के फेफड़ों और माता-पिता के दिलों को थोड़ी राहत देना चाहते हैं। जैसे-जैसे साफ हवा कम होती जा रही है, वह खरीदने-बेचने की चीज बनती जा रही है। हम स्मॉग इकनॉमी के जन्म को देख रहे हैं, जहां सांस लेने लायक हवा एक विशेष उत्पाद बन गई है, जो उन्हीं को मिलती है, जो उसके लिए भुगतान कर सकते हैं।

रियल एस्टेट क्षेत्र में अब हवा की गुणवत्ता ब्रॉशर में सिर्फ एक छोटा-सा नोट नहीं है, बल्कि एक मुख्य जानकारी बन गई है। बिल्डर अब लग्जरी अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में हॉस्पिटल जैसी उच्च दक्षता वाले वायु फिल्टर लगा रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ महंगे आवासीय प्रोजेक्ट तो ऑक्सीजनयुक्त क्लब हाउस और इनडोर जंगल जैसी चीजों के नाम पर भी फ्लैट बेच रहे हैं। इससे एक चिंताजनक सामाजिक अंतर पैदा हो रहा है-अमीरों के लिए साफ हवा का सुरक्षित घेरा, जबकि बाकी लोग जहरीली हवा में रहने को मजबूर हैं। यहां तक कि आतिथ्य उद्योग ने भी खुद को बदल लिया है। लग्जरी होटल अब कमरों में उन्नत एयर प्यूरिफिकेशन सिस्टम लगाकर साफ हवा का दावा करते हैं, जो विकसित देशों जैसा लगता है। वेलनेस रिट्रीट अब लंग डिटॉक्स पैकेज दे रहे हैं।

साफ हवा की तलाश का चलन अब नया आर्थिक केंद्र बना रहा है। जो शहर पहले शांत रिटायरमेंट टाउन या सिर्फ घूमने-फिरने के लिए जाने जाते थे, वहां अब प्रदूषण से बचकर आने वाले लोगों (प्रदूषण शरणार्थियों) की वजह से रियल एस्टेट में तेजी आ रही है। गोवा अब केवल पार्टी करने की जगह नहीं है, बल्कि रहने की पसंदीदा जगह बन चुका है। एक खबर के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के मनाली में क्रिसमस व नए साल से पहले पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इन पर्यटकों में वे लोग भी शामिल हैं, जो दिल्ली-एनसीआर की प्रदूषित हवा, सांस लेने में परेशानी, खांसी और आंखों में जलन से बचने के लिए मनाली पहुंचे हैं। हालांकि, इन साफ जगहों पर भी गाड़ियों और विनिर्माण के बढ़ने से हवा की गुणवत्ता खराब होने लगी है, जिसे पॉल्यूशन ट्रेलिंग कहा जाता है। यह स्थिति नैतिक और पर्यावरणीय, दोनों तरह का विरोधाभास पैदा करती है।

साफ हवा के लिए पलायन एक तरह से स्वास्थ्य संकट का समझदारी भरा जवाब है, पर यह एक कड़वी सच्चाई को भी छिपाता है कि भागकर बचने की सुविधा हर किसी के पास नहीं होती। लाखों डिलीवरी बॉय, विनिर्माण में लगे मजदूर तथा फुटपाथ विक्रेता इसी धुंध में अपनी आजीविका के लिए जद्दोजहद करते हैं। पलायन की कोशिश कई बार समस्या को और बढ़ाती है। हजारों उड़ानों एवं निजी गाड़ियों का कार्बन उत्सर्जन पहाड़ों या समुद्र किनारे की उन मौसमी स्थितियों को और बिगाड़ देता है, जो पहले से ही स्मॉग को रोके रखती हैं। यानी हम ईंधन जला रहे हैं, सिर्फ ऐसी जगह खोजने के लिए, जहां हवा प्रदूषित न हो। भविष्य की ओर देखते समय यह समझना जरूरी है कि साफ हवा का पीछा करना सिर्फ एक चलन नहीं, बल्कि एक बड़ी चेतावनी है।

यह दिखाता है कि शहरी योजना और पर्यावरण नीति अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दे नहीं हैं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख चालक बन चुके हैं। अगर यही स्थिति बनी रही, तो भारत के कार्यबल में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। वे कंपनियां, जो ज्यादा प्रदूषण वाले महीनों में रिमोट वर्क का विकल्प नहीं देंगी, उन्हें अपने कर्मचारियों को रोककर रखने में दिक्कत हो सकती है। इसके अलावा, रियल एस्टेट की कीमतें अब सिर्फ व्यापारिक क्षेत्रों के पास होने से तय नहीं होंगी, बल्कि हवा के पैटर्न व जंगलों की मात्रा पर भी निर्भर करेंगी। हम ऐसी स्थिति की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां दो तरह के कार्यबल बन जाएंगे-एक छोटा समूह, जिसके पास साफ हवा वाली जगहों पर जाने की सुविधा व क्षमता है, और दूसरा उन लोगों का बड़ा समूह, जिनके पास ऐसा करने के लिए न संसाधन हैं न लचीलापन। इसमें वे लोग भी आते हैं, जो घर के लिए एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकते और जहरीली हवा में बाहर काम करने को मजबूर हैं।

सीधी बात यह है कि साफ हवा वाली जगहों पर जाने का विकल्प भी थोड़े समय के लिए है। अगर ज्यादा लोग वहां जाना शुरू कर देंगे, तो वहां भी वही प्रदूषण वाली समस्या पैदा हो जाएगी। नए साल की शुरुआत के साथ हमें यह समझना होगा कि उन कदमों पर रोक लगाएं, जिनसे हवा जहरीली होती है। वरना हम न सिर्फ अपना, बल्कि अपनेेेे बच्चों का भविष्य भी गंभीर खतरे में डाल देंगे। edit@amarujala.com
 
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