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इंसाफ कैसे: कॉलेजियम प्रणाली पर देशव्यापी चिंता, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग 'असांविधानिक', रास्ता क्या?

Fri, 04 Sep 2026 09:12 AM IST
Vinay Jhelawat विनय झैलावत
Updated Fri, 04 Sep 2026 09:12 AM IST
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सार
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां द्वारा पारदर्शिता की कमी को लेकर आलोचना करने के बाद कॉलेजियम प्रणाली फिर से चर्चा में है। इसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग द्वारा प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया गया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने असांविधानिक करार दिया। तब से इस प्रणाली पर सवाल उठते ही रहे हैं। 
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Nationwide Concern Over Supreme court Collegium System NJAC Unconstitutional in 2015 How to Ensure Justice
न्यायपालिका - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी

विस्तार

हाल ही में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां द्वारा कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता नहीं होने की आलोचना करने के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के कारणों का खुलासा नहीं होने से न्यायपालिका का नुकसान हो रहा है। नियुक्ति न किए जाने का कारण न बता कर कॉलेजियम ऐसे न्यायाधीशों के साथ अन्याय कर रहा है, जिन्होंने अथक परिश्रम किया है। इस तरह हम न्यायपालिका में कुछ ऐसे लोगों को प्रवेश की अनुमति दे रहे हैं, जो बाद में समाज के एक वर्ग के लिए ‘चींटियां’ जैसी असांविधानिक टिप्पणियां करते हैं और उनका कुछ नहीं होता।



उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में ऐसे लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए चर्चा होनी चाहिए और कारण बताए जाने चाहिए। खुली अदालतों व जनता के जानने के अधिकार का सिद्धांत न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में भी लागू होना चाहिए। लोगों को जानने का अधिकार है कि उनके न्यायाधीश कौन होंगे? उन्होंने कैसे फैसले दिए हैं? न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि न्यायाधीशों की पदोन्नति-तबादलों पर विचार-विमर्श गोपनीय रहता है और किसी सिफारिश को अस्वीकार या स्थगित करने के कारणों का खुलासा शायद ही कभी किया जाता है। न्यायमूर्ति भुइयां ने सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम के पिछले तीन ज्ञापनों का जिक्र कर कहा कि इनमें पदोन्नति की सिफारिश का कारण नहीं बताया गया है, वहीं पहले के ज्ञापनों में एक ही कारण बताया गया।


सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की रिट याचिका पर सुनवाई करने से इन्कार कर दिया। उक्त न्यायिक अधिकारी ने उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए अपने नाम पर विचार करने की मांग की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने मौखिक रूप से कहा कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम को कोई न्यायिक निर्देश नहीं दिया जा सकता। याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा अभी धर्मशाला में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज हैं। उनकी शिकायत थी कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उनके जूनियर्स के नाम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेतु आगे बढ़ाए। इन पर बाद में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने भी मंजूरी दी। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सितंबर, 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय कॉलेजियम को याचिकाकर्ता और एक अन्य न्यायाधीश के नाम पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ता के मामले में ऐसा नहीं किया गया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना व न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे पता चले कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने याचिकाकर्ता का नाम खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उन्हें कुछ दस्तावेज जमा करने को कहा गया था। लेकिन, उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उनके जूनियर्स का नाम सुप्रीम कोर्ट को भेज दिया। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए न्यायिक अधिकारियों के नामों की सिफारिश की थी। 2024 में दो जिला न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की। उनका तर्क था कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए नामों की सिफारिश करते समय उनकी योग्यता और वरिष्ठता को नजरअंदाज किया। सितंबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका स्वीकार की और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से उनके नामों पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया।

संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की सिफारिश एक समिति द्वारा की जाती है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। यह प्रस्ताव दो वरिष्ठतम सहयोगियों के परामर्श से संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाता है। सिफारिश मुख्यमंत्री को भेजी जाती है, जो केंद्रीय कानून मंत्री को प्रस्ताव राज्यपाल को भेजने की सलाह देता है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति इस आधार पर की जाती है कि वह राज्य से बाहर का व्यक्ति होगा। संविधान के अनुच्छेद 224(ए) के तहत सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों से निपटने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति पर जोर दिया है। अदालत ने तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति व कार्यपद्धति हेतु मौखिक दिशा-निर्देश दिए हैं।

कॉलेजियम सिस्टम न्यायाधीशों की नियुक्ति व स्थानांतरण की प्रणाली है, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के जरिये विकसित हुई है। इसने 1981 में एक न्यायाधीश के मामले में फैसला सुनाया था कि न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों में भारत के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश को ‘प्राथमिकता’ प्राप्त नहीं है और ठोस कारण होने पर उसे अस्वीकार किया जा सकता है। तत्कालीन सरकार ने अगले बारह वर्षों के लिए न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका पर कार्यपालिका को प्राथमिकता दी। सर्वोच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले में 1993 में कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत, यह मानते हुए की कि परामर्श से तात्पर्य सहमति है। इसमें कहा गया कि यह मुख्य न्यायाधीश की व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श से गठित एक संस्थागत राय थी। अन्य न्यायाधीश मामले में 1998 के अनुसार, राष्ट्रपति को दिया गया परामर्श बहुसंख्यक न्यायाधीशों का परामर्श माना जाएगा। इसमें मुख्य न्यायाधीश के साथ सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श शामिल होंगे।

हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति में अत्यधिक देरी से न्यायाधीशों की घटती संख्या न्याय वितरण तंत्र को प्रभावित कर सकती है। औपचारिक मानदंडों की अनुपस्थिति के कई चिंताजनक निहितार्थ हैं। वर्तमान में यह जांचने हेतु कोई प्रक्रिया नहीं है कि कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित किसी जज के हितों का कोई टकराव है या नहीं। कॉलेजियम प्रणाली संरचनात्मक रूप से समाज के विशेष वर्गों का पक्ष लेती है तथा आबादी के उन समूहों से काफी दूर है, जिनके न्याय हेतु वह प्रतिनिधित्व करना चाहती है।

99वें सांविधानिक संशोधन अधिनियम, 2014 के जरिये कॉलेजियम को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग द्वारा प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया गया था। पर, सर्वोच्च न्यायालय की सांविधानिक पीठ ने 2015 में आयोग को असांविधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह भारत के संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है। साफ है कि कॉलेजियम प्रणाली को लेकर एक देशव्यापी चिंता है। 

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