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मुद्दा: लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, छुआछूत-भेदभाव जैसी अस्पृश्यता अब भी कायम; स्वतंत्रतामूलक सुधार अपरिहार्य

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Fri, 04 Sep 2026 09:31 AM IST
सार

कानून और राजनीति में समानता के बावजूद समाज में छुआछूत और भेदभाव जैसी अस्पृश्यता अब भी कायम है। इसलिए स्वतंत्रतामूलक सुधार अपरिहार्य हैं।

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Battle not over yet practices like untouchability and discrimination persist emancipatory reforms imperative
स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ पर भी कई सवालों के जवाब मिलने बाकी (सांकेतिक) - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

देश ने एक ओर स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मनाया, तो दूसरी ओर एससी/एसटी में क्रीमी लेयर लागू करने की बहस छिड़ रही है। नागपुर में एससी/एसटी और ओबीसी का आरक्षण समाप्त करने की मांग हो रही है। इस बीच, हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सभा संपन्न करने के उपरांत उस स्थान का शुद्धीकरण किए जाने की प्रतिक्रिया संसद में सुनाई पड़ी है।

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दक्षिण भारत से कांग्रेस के प्रथम दलित राष्ट्रीय अध्यक्ष दामोदरम संजीवैया थे। उन्हें ऐसी उपेक्षा का सामना नहीं करना पड़ा था। हालांकि, कांग्रेस में ही लंबे समय तक रक्षा मंत्री, रेल मंत्री, संचार मंत्री आदि शीर्ष पदों पर रहे बाबू जगजीवन राम के साथ भी अस्पृश्यता का व्यवहार हुआ था।
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अंतर यह है, तब वह कांग्रेस छोड़ चुके थे। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी और बाबू जगजीवन राम रक्षा मंत्री। कानपुर से प्रकाशित फरवरी 1978 के निर्णय मासिक के संपादकीय के अनुसार, ‘केंद्रीय रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम द्वारा 24 जनवरी, 1978 को वाराणसी में डॉ. संपूर्णानंद की मूर्ति का अनावरण करने के बाद कुछ छात्रों ने मूर्ति को गंगाजल से पवित्र किया, तथा बाबू जी के प्रति अशोभनीय जाति-सूचक शब्दों का प्रयोग किया गया था, जबकि उप-कुलपति करुणापति त्रिपाठी मौजूद थे।’
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तत्कालीन ‘दलित वर्ग संघ’ तथा एससी व एसटी की संसदीय-समिति के अध्यक्ष रामधन ने इसे इंदिरा गांधी की छात्र शाखा का अभद्र व्यवहार बताया था। 22 फरवरी, 1978 को संसद में ऐसी ही तीखी प्रतिक्रिया हुई थी, जैसे ‘खरगे’ प्रकरण में हुई है। अगर सामाजिक संदर्भ में देखें, तो कहीं न कहीं प्रत्येक दिन अस्पृश्य एवं स्पृश्य का भेद सामने आता है। यदि देश की सबसे पुरानी और प्रमुख विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे पद पर आसीन, राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ नेता के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो सवाल उठता है कि आम दलित के लिए व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता का अर्थ आखिर क्या रह जाता है?

अस्पृश्यता के विरुद्ध संविधान में अनुच्छेद 17 की व्यवस्था भी की गई है। गांधीजी ने इसे समाप्त करने का संकल्प लिया था। कांग्रेस और गांधीजी से मतभेदों के बावजूद डॉ. आंबेडकर ‘कांग्रेस राज’ में लोकतांत्रिक संविधान, हिंदू कोड बिल और अस्पृश्यता-विरोधी कानून बनाकर स्त्रियों व दलितों के अधिकार सुनिश्चित कर सके।

बीते वर्ष भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर कोर्ट में ही एक व्यक्ति द्वारा जूता फेंका गया था। वह घटना भी अनुसूचित जाति के अपमान के रूप में देखी गई थी। हाल ही में, कर्नाटक हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता सिराजुद्दीन उर्फ सिराज शेख की एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। शेख पर आरोप है कि उन्होंने 2023 में पूर्व एससी विधायक भीमा नाइक के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी की थी।


ये घटनाएं महज कुछ उदाहरण हैं। अस्पृश्यता से जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि कानून में भले ही समानता व सद्भाव स्थापित हो गया हो, राजनीति में बेशक सांविधानिक मूल्यों को मानने की बाध्यता दिखाई पड़ती हो, पर समाज में अस्पृश्यता, जातिभेद, शुद्धता-अशुद्धता के भाव प्रभावी हैं। अतएव, स्वतंत्रतामूलक सुधार अपरिहार्य हैं।   

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