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छोटे कारोबारियों की बड़ी चिंताएं: अगले आर्थिक सुधारों का लक्ष्य हो छोटे कारोबार, करोड़ों को देते हैं आजीविका

Thu, 03 Sep 2026 07:32 AM IST
P. S. Vohra पीएस वोहरा
Updated Thu, 03 Sep 2026 07:32 AM IST
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सार
छोटे कारोबार करोड़ों लोगों को रोजगार दे सकते हैं, इसलिए व्यवसाय से जुड़ी अगली सहूलियत बड़ी कंपनियों के बजाय छोटे कारोबारियों के लिए होनी चाहिए।
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छोटे कारोबारियों के लिए आसान हो कारोबार - फोटो : ANI

विस्तार

भारत में व्यवसाय करने की दिशा में अगली सहूलियत बड़ी कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि छोटे कारोबारियों के लिए होनी चाहिए। चाय की दुकान, सब्जी की रेहड़ी, छोटे भोजनालय, बिजली मिस्त्री, दर्जी, मैकेनिक, कारीगर या घर से चलने वाला कारोबार। ये केवल छोटे व्यवसाय नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आय और रोजगार का आधार हैं। बड़े कारोबार के लिए जमीन, औद्योगिक क्षेत्र, ऋण और प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर लगातार ध्यान दिया जाता है, लेकिन छोटे कारोबारी के लिए कई बार सबसे बुनियादी जरूरत, यानी एक निश्चित जगह तक उपलब्ध नहीं होती। छोटे और मंझोले शहरों की योजना बनाते समय शायद यह कल्पना नहीं की गई कि छोटे व्यवसायों के लिए भी नियोजित स्थान जरूरी होंगे। नतीजतन, अपने श्रम से परिवार चलाने और दूसरों को रोजगार देने वाला व्यक्ति सड़क किनारे कारोबार करने पर अतिक्रमणकारी बन जाता है।


अब इसे केवल शहरी व्यवस्था नहीं, रोजगार व आर्थिक नीति का विषय मानना होगा। नगरपालिकाएं छोटे व्यापारियों के लिए नियोजित स्थान और छोटे बाजार विकसित कर सकती हैं, जहां मामूली शुल्क पर बिजली, पानी, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन जैसी सुविधाएं मिलें। इससे स्थानीय निकायों को राजस्व भी मिलेगा। यदि नए उद्यमों के लिए सरकार कारोबार शुरू करने की सुविधा दे सकती है, तो वर्षों से अपने दम पर रोजगार पैदा कर रहे इन छोटे उद्यमियों के लिए भी वही सोच क्यों नहीं हो सकती? भारत में अब इसकी जरूरत इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि भारत की आर्थिक विकास और रोजगार वृद्धि के बीच संबंध लगातार कमजोर होता जा रहा है।


पिछले तीन-चार दशकों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) तो कई गुना बढ़ा, लेकिन रोजगार उस अनुपात में नहीं बढ़ा। यह बड़ी विडंबना है कि रोजगार लोच के स्तर पर भारत विश्व में सबसे निचले स्तर पर है। 1980 के आसपास यह संबंध लगभग 0.50, तो 2000 में करीब 0.30 और वर्तमान में लगभग 0.16 है, जबकि बांग्लादेश में 0.28, वियतनाम में 0.30 से अधिक, चीन और  इंडोनेशिया में 0.40 से ज्यादा है। इसका असर राष्ट्रीय सकल प्रति व्यक्ति आय में भी दिख रहा है। यानी मात्र आर्थिक वृद्धि की दर ही नहीं, यह भी महत्वपूर्ण है कि आर्थिक वृद्धि कितने लोगों की उत्पादक क्षमता और आय को अपने साथ ऊपर ले जाती है।

एक अन्य पक्ष यह भी है कि पिछले तीन दशकों से भारत में सेवा क्षेत्र रोजगार का बड़ा आधार रहा है। लेकिन अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, ग्राहक सेवा और अन्य दूसरे सेवा कार्यों की प्रकृति बदल रही है। इसलिए, अब भारत को अपने विशाल अनौपचारिक क्षेत्र को भी रोजगार की बड़ी शक्ति के रूप में देखना होगा। छोटे और मझोले शहरों में भारत में अनौपचारिक रोजगार का हिस्सा लगभग 80 प्रतिशत तक आंका गया है और इनकी संख्या वर्तमान में 15 करोड़ से अधिक है। साफ है कि भारत में रोजगार का बड़ा हिस्सा छोटे कारोबारों में मौजूद है। अब जरूरत उसकी उत्पादकता को बढ़ाने की है।

इसलिए छोटे और मझोले शहरों में अब अनौपचारिक क्षेत्रों के लिए व्यावसायिक सुगमता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रत्येक शहर में आबादी के अनुसार छोटे व्यवसाय क्षेत्रों की योजना बनाई जा सकती है। वैध स्थान, न्यूनतम शुल्क और बिजली-पानी, स्वच्छता तथा कचरा प्रबंधन जैसी सुविधाओं के साथ इन कारोबारियों को बैंक खाता, छोटा ऋण, बीमा और डिजिटल भुगतान से जोड़ा जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर हजारों रोजगार पैदा हो सकते हैं और नगरपालिकाओं के लिए नियमित राजस्व भी पैदा होगा।

इसके अलावा, यह समझना होगा कि नकदी की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण जगह है। निम्न व निम्न-मध्यम आय वाले परिवारों के लिए नकदी आज भी दैनिक खर्च, आकस्मिक जरूरत और बचत का साधन है। इसलिए, हर नकदी को काला धन मानना गलत होगा। साथ ही, बैंकिंग व्यवस्था को छोटे बचतकर्ताओं के लिए सुरक्षित, सरल और आकर्षक दीर्घकालीन निवेश साधनों को मजबूत करना चाहिए। करोड़ों परिवार यदि अपनी छोटी बचत का एक हिस्सा सुरक्षित वित्तीय निवेश में लगा सकें, तो यह देश के लिए बड़ी घरेलू पूंजी बन सकती है। निम्न-मध्यम और मध्यम वर्ग के अनेक परिवार शेयर बाजार की अस्थिरता और जोखिम से सहज नहीं हैं।

जरूरत है कि आर्थिक नीतियों में अब इस बात को प्रमुखत से सामने लाया जाए कि बड़े उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा सकते हैं, लेकिन छोटे कारोबार उस वृद्धि को करोड़ों लोगों की आजीविका में बदल सकते हैं। यही अगले आर्थिक सुधारों की असली दिशा होनी चाहिए।
edit@amarujala.com
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