{"_id":"5bd1bb0ebdec221a020c4f3c","slug":"indo-american-relations-test","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारत-अमेरिकी रिश्ते की परीक्षा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
भारत-अमेरिकी रिश्ते की परीक्षा
अवधेश कुमार
Updated Thu, 25 Oct 2018 06:16 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अवधेश कुमार
भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडरा रहा है। ईरान से चार नवंबर के बाद तेल आयात जारी रखने और रूस से हवाई रक्षा प्रणाली एस-400 खरीदने के फैसले से उसकी नाराजगी साफ दिख रही है। वर्ष 2015 के बहुपक्षीय समझौते से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हाथ खींचने के बाद से अमेरिका ईरान से हर देश का तेल आयात बंद करने की कोशिश कर रहा है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि नवंबर में ईरान से 12.5 लाख टन कच्चा तेल खरीदने का सौदा किया जा चुका है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि ईरान से आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में उसकी भरपाई के विकल्प मौजूद हैं। यानी अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते दूसरे विकल्प की भी तैयारी है।
वर्ष 2016 के राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के आरोप तथा यूक्रेन पर कब्जे के विरुद्ध अमेरिका ने रूस पर सैन्य प्रतिबंध लगाया हुआ है। ट्रंप प्रशासन ने चेतावनी दी थी कि प्रतिबंध के बावजूद जो देश रूस से हथियार खरीदते हैं, उन्हें भी प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है। भारत-रूस समझौते के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि रूस से एस-400 हवाई रक्षा प्रणाली खरीद सौदे पर भारत जल्द ही दंडात्मक काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस ऐक्ट (सीएएटीएसए या काटसा) प्रतिबंधों पर उनके फैसले से अवगत होगा।
वस्तुतः यह कानून ट्रंप प्रशासन को रूस, ईरान और उत्तर कोरिया के खिलाफ आर्थिक तथा राजनीतिक प्रतिबंधों के माध्यम से उन्हें निशाना बनाने की ताकत देता है। ध्यान रखिए, अमेरिका ने हाल ही में सीएएटीएसए का प्रयोग कर एस-400 की खरीद को लेकर चीनी प्रतिष्ठानों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। इससे चीन की परेशानी बढ़ी है। हालांकि अमेरिका में मौजूद फ्रेंड्स ऑफ इंडिया समूह इस बात की पूरी कोशिश कर रहा है कि भारत को दंडात्मक कार्रवाई का सामना न करना पड़े। वैसे भी अमेरिका ने भारत को महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार माना है। किंतु जिस सौदे के कारण चीन पर कार्रवाई हो गई, उसके लिए भारत को छोड़ दिया जाए, यह संभव है क्या?
अमेरिका भी हमारा रणनीतिक साझेदार है। छह सितंबर को हुई भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और उनके अमेरिकी समकक्ष पोम्पियो और मैटिस के बीच हुई 2+2 बैठक में भारत की ओर से अमेरिका को इस सौदे की जानकारी दी गई। इस पर अमेरिकी मंत्रियों ने क्या कहा, यह पता नहीं। हालांकि ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिकी प्रशासन की शैली किसी विषय को पर्दे के पीछे रखने की नहीं है। वह खुलकर बात करता है। भारत से व्यापार के मामले में भी वह कई बार कह चुका है कि हमारा जो भी सामान वहां जाता है, भारत उस पर 100 प्रतिशत तक कर लगाता है, जबकि हम थोड़ा कर लगाना चाहते हैं, तो उसे स्वीकार नहीं। अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका कैसे कदम उठाएगा।
हमें केवल भावना में बहकर एकपक्षीय विचार नहीं करना चाहिए। अमेरिका एकमात्र देश है, जिसने विश्व पटल पर भारत की भूमिका को व्यापक स्तर पर स्वीकार किया है। भारत को अमेरिका से संबंधों के मामले में काफी संतुलन, संयम और सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। अगर अमेरिका को हमारी आवश्यकता है, तो व्यापार से लेकर विश्व पटल व एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभाव तथा रणनीतिक भूमिका सहित अनेक मामलों में हमें भी उसकी आवश्यकता है।