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कैसे होगी रोहिंग्या की वापसी

कुलदीप तलवार Updated Tue, 17 Apr 2018 06:39 PM IST
कुलदीप तलवार
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गत वर्ष अगस्त के अंत में म्यांमार के उत्तर में स्थित रखाईन प्रांत में बड़ी हिंसा के बाद से ही रोहिंग्या शरणार्थियों का बांग्लादेश, भारत व अन्य देशों में पलायन शुरू हो गया था। अब तक पलायन करने वालों की संख्या 10 लाख से ज्यादा हो चुकी है। विशेष तौर पर सात लाख से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में बेबसी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उन्हें प्लास्टिक के तंबू तो जरूर दिए गए हैं, पर वे बुनियादी सहूलियतों से वंचित हैं। इन मुसीबत के मारों के लिए न कोई रोजगार है, न बच्चों के लिए शिक्षा का बंदोबस्त। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे बांग्लादेश में शिविरों में रह रहे शरणार्थियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने में अपना योगदान दें। शिविरों में बीमारियां भी बढ़ रही है, पर इन सबके बावजूद उन्हें इस बात का सुकून है कि बांग्लादेश में कोई उनकी जान लेने वाला नहीं है। इन शरणार्थियों की वापसी के लिए बांग्लादेश और म्यांमार सरकारों के बीच एक समझौता भी हो चुका है, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हो सका।
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सवाल उठता है कि रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार गए भी, तो वे कहां रहेंगे, क्योंकि उनकी बस्तियों के नामोनिशान मिट चुके हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों का कहना है कि म्यांमार सरकार की तरफ से नागरिकता मिलने के बाद ही वे अपने घर लौटेंगे। उनकी एक शर्त यह भी है कि वे संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना की निगरानी में ही अपने घर जाएंगे। आम ख्याल यह है कि जो 90 के दशक में रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार से बांग्लादेश पलायन करके आ गए थे और जो पहले से शिविरों में रह रहे हैं, वे अभी तक नहीं लौट सके। इसलिए अब इन शरणार्थियों की वापसी जल्दी नहीं हो सकेगी। इन शरणार्थियों को बांग्लादेश के शिविरों में ही अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ेगी।

इन शिविरों में सबसे बड़ी समस्या गरीब महिलाओं व बच्चों की जीविका की है। बीबीसी की एक ताजा और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों के आने से वहां देह व्यापार गरम है। बच्चों, लड़कियों व महिलाओं की खरीद-फरोख्त जारी है। दबाव बनाकर कुछ लड़कियों को कई देशों में मानव तस्करी के जरिये भेजा जा रहा है। समाचार एजेंसी रायटर ने इस बात का खुलासा किया है कि इस धंधे में बांग्लादेश यूनिवर्सिटी के कई विद्यार्थी और अनेक राजनीतिज्ञ भी इन लड़कियों व महिलाओं की इज्जत के खरीददारों में शामिल हैं। ऐसे शिविरों में रह रहे हजारों बच्चों को रोंहिग्या समुदाय के बर्बर दमन के दौरान अपने माता-पिता को खोना पड़ा था। किन त्रासद स्थितियों से इन बच्चों को गुजरना पड़ा था और जिस दर्द को वह आज भी जी रहे हैं, उसकी कोई भी कल्पना कर सकता है। उनके भविष्य के आगे अनिश्चितता पसरी है। इनमें से ज्यादातर बच्चे जबर्दस्त कुपोषण के शिकार हैं। ‘सेव द चिल्ड्रन’ ने अपने आकलन में पाया है कि इस साल 48 हजार और शिशुओं का जन्म इन गंदे शिविरों में होगा।

अमीर देश और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठन बांग्लादेश के शिविरों में रह रहे रोंहिग्या शरणार्थियों को मानवीय आधार पर हर तरह की भरपूर मदद करने के लिए आगे आएं, ताकि इन शिविरों में नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे रोंहिग्या शरणार्थियों को बचाया जा सके। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना के जरिये ही इनकी वापसी का बंदोबस्त हो सकता है। 

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