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सुप्रीम फैसले से वैवाहिक संस्कार के बचे रहने की आस, समाज सुधार की राह दिखाता अहम आदेश
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सार
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शादी(सांकेतिक)
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अमर उजाला
विस्तार
अदालती निर्णय कई बार सामाजिक सुधारों की पीठिका तैयार करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विगत 19 अप्रैल, 2024 को अपने एक निर्णय के माध्यम से ऐसा ही किया। न्यायमूर्ति नागरत्ना तथा न्यायमूर्ति जॉर्ज मसीह की पीठ का निर्णय मूलतः हिंदू धर्म के विवाह में सप्तपदी तथा दूसरे संस्कारों के महत्व के बारे में था, किंतु इस निर्णय में न्यायालय ने मौजूदा समाज की विसंगतियों और उनसे पैदा होने वाली जटिलताओं को उजागर करते हुए अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की।
मुकदमा ऐसे दंपती का था, जिसमें पति-पत्नी, दोनों प्रशिक्षित पायलट थे। दोनों ने 2021 के मार्च महीने में सगाई की तथा उसके बाद जुलाई में एक मंदिर में जाकर तथाकथित रूप से विवाह करके एक प्रमाणपत्र ले लिया और फिर उसी प्रमाणपत्र के आधार पर अपने विवाह का पंजीकरण करा लिया।
दोनों के परिवार वालों ने उनकी शादी हिंदू रीति-रिवाजों से करने के लिए 25 अक्तूबर, 2024 की तिथि तय की, किंतु दोनों के बीच इस दौरान आपसी मतभेद इतने बढ़ गए कि नौबत विवाह विच्छेद के मुकदमे तक पहुंच गई। इस तथाकथित विवाह में सप्तपदी (पवित्र अग्नि के चारों तरफ सात फेरे लगाकर सात वचन निभाने का संकल्प) का संस्कार संपन्न नहीं किया गया था। इसलिए अदालत के सामने एक तर्क यह दिया गया कि हिंदू विधि में सप्तपदी के बगैर विवाह संपन्न नहीं हो सकता, अतः इस रिश्ते को वैवाहिक रिश्ते की कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
अन्य बातों के अलावा अदालत के सामने एक प्रश्न यह भी था कि क्या सप्तपदी के बिना किसी हिंदू विवाह को वैधानिक मान्यता दी जा सकती है? इसका उत्तर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह के अनुष्ठानों और उसके कानूनी और सामाजिक प्रभावों की व्यापक विवेचना की। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह एक संस्कार है और हिंदू विवाह के अंतर्गत उसे तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती, जब तक कि सभी अनुष्ठानों का पूरी तरह पालन न कर लिया गया हो। यही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि भारतीय समाज में हिंदू विवाह को बहुत सम्मान से देखा जाता रहा है और आज की युवा पीढ़ी को वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने से पहले हिंदू विवाह पद्धति पर गंभीरता पूर्वक चिंतन करना चाहिए। चूंकि अदालत के सामने विचाराधीन इस मामले में सप्तपदी के अनुष्ठान का पालन नहीं किया गया था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को माना और विवाह वैध रीति के अभाव में मान्यता नहीं दिए जाने की बात की।
इस मामले की खास बात यह है कि अदालत ने अपने को केवल कानून के तकनीकी पहलुओं तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक पहलुओं पर भी अपना रुख स्पष्ट किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवाह जैसी महत्वपूर्ण संस्था को बहुत हल्के में लेने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। अदालत की पीठ ने कहा कि विवाह कोई वाणिज्यिक गतिविधि नहीं है, जिसे उपहारों और अन्य आर्थिक लेन-देन का माध्यम मात्र मान लिया जाए, बल्कि यह एक पवित्र बंधन है। इसमें वर-वधू को सामाजिक मान्यता देकर पति और पत्नी के ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित किया जाता है। अदालत ने कहा कि विवाह केवल नाचने-गाने और जश्न मनाने का ही मौका नहीं होता, अपितु यह पवित्र वैवाहिक संबंधों की आधारशिला है। इसलिए युवक-युवतियों को इसे बहुत गंभीरता पूर्वक लेना चाहिए।
इस प्रकरण का एक पहलू यह भी था कि पक्षकारों ने मंदिर में विवाह के बाद मंदिर के पुजारी से उसका प्रमाणपत्र ले लिया था तथा उसी आधार पर विवाह पंजीकरण करा लिया था। यह सब कुछ बहुत आनन-फानन में और जल्दबाजी में किया गया था।
इसलिए अदालत के सामने एक सवाल यह भी था कि क्या पंजीकरण हो जाने के बाद विवाह की वैधता को चुनौती दी जा सकती है? अदालत ने इस पर कहा कि पंजीकरण, विवाह के संपन्न हो जाने के बाद की महज औपचारिकता है, इसलिए पंजीकरण मात्र से ही उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। इस मामले में चूंकि हिंदू विवाह के लिए जरूरी अनुष्ठान पूरे नहीं किए गए थे, इसलिए कानून की निगाह में उसे विवाह माना ही नहीं जा सकता। अतः पंजीकरण करवा लेने मात्र से ही तथाकथित विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में हिंदू विवाह के पारंपरिक अनुष्ठानों के कानूनी और सामाजिक पहलुओं को निरूपित करते हुए आह्वान किया कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूती देने के लिए समाज को भी आगे आना चाहिए।
सप्तपदी के महत्व को बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ऋग्वेद के सूत्रों के हवाले से बताया कि इस अनुष्ठान के संपन्न होने पर वर नववधू से कहता है कि अब वे एक-दूसरे के सखा यानी मित्र हो गए हैं और फिर वह कामना करता है कि दोनों सदैव ही एक-दूसरे के बने रहें तथा कभी अलग न हों। इस तरह पत्नी, पति की अर्धांगिनी का दर्जा हासिल कर लेती है। इन उदात्त भावों की आधारशिला पर मजबूत संबंधों के भविष्य की भूमिका तैयार होती है। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने आज की युवा पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि वे हिंदू विवाह के अनुष्ठानों में निहित भावों को गंभीरता से समझें और उसे अपने आचरण में ढालें।
ऐसे मौके बहुत कम आते हैं, जब अदालतें कानून की तकनीकी जटिलताओं से आगे बढ़कर समाज-सुधार के मुद्दों पर अपनी राय रखती हों। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन किया है, जो स्वागत योग्य है। विवाह जैसी महत्वपूर्ण संस्था के प्रति बदलते दृष्टिकोण से बढ़ते हुए सामाजिक विघटन की पृष्ठभूमि में यह और भी प्रासंगिक हो गया है। समाज सुधार के मामलों में अदालतों की भूमिका अक्सर बहुत सीमित होती है, इसलिए अब समाज की जिम्मेदारी है कि वह इस पहल को अंजाम तक पहुंचाए।