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ईवीएम: सवाल उठाइए, मगर संदेह मत फैलाइए; आरोप प्रामाणिक होना भी जरूरी

Fri, 22 May 2026 07:21 AM IST
Pavan पीयूष पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
पीयूष पांडे, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Pavan Updated Fri, 22 May 2026 07:21 AM IST
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सार
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की साझा जिम्मेदारी है। यदि विपक्ष को बिहार या प. बंगाल में एसआईआर के दौरान मतदाताओं के प्रभावित होने का संदेह था, तो उसे ऐसे लोगों को सामने लाकर ठोस राष्ट्रीय बहस करनी चाहिए थी। लोकतंत्र में सभी को सवाल उठाने का हक है, पर आरोप प्रामाणिक होना जरूरी है।
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EVM: Raise questions, but don't spread doubt; allegations must be authentic
ईवीएम: सवाल उठाइए, मगर संदेह मत फैलाइए - फोटो : एएनआई

विस्तार

स्वतंत्र भारत में पहला लोकसभा चुनाव 25 अक्तूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 के बीच हुआ था, और मई 1952 में पहली लोकसभा अस्तित्व में आई थी। संसदीय चुनावों के करीब 75 वर्षों के इतिहास में भारत की चुनाव प्रणाली अलग-अलग मोड़ों से गुजरते हुए उस मुकाम पर पहुंची है, जहां ‘फ्री एंड फेयर’ चुनाव की अवधारणा वास्तविकता के काफी निकट है। दुर्भाग्य है कि कुछ राजनीतिक दल हार के बाद चुनाव प्रणाली को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं और यह सिलसिला अब नियमित हो चला है।


भारत में बार-बार यह बात साबित हुई है कि यहां लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत हैं और इसका प्रमुख कारण है यहां की चुनाव प्रणाली। संविधान सभा ने जब तय किया कि भारत सभी वयस्कों को मताधिकार देगा, तो यह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। इसके बाद चुनाव संपन्न कराने में जो मेहनत हुई, वह अद्भुत थी। सबसे पहले एक समावेशी मतदाता सूची बनाने में ही अधिकारियों के पसीने छूट गए थे। लाखों लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र, पहचान-पत्र या निवास प्रमाण जैसी कोई चीज नहीं थी। अधिकारियों के पास न कोई डाटाबेस था और न कोई पूर्व अनुभव। तमाम कोशिशों के बावजूद लाखों महिलाएं अपना नाम बताने को तैयार नहीं थीं। इसी वजह से कई महिला मतदाताओं के नाम दर्ज नहीं हो पाए। कई राज्यों के अधिकारियों ने केंद्र को चिट्ठी लिखकर पूछा कि मतदाता सूची कैसे बनती है? तब पूर्वी पंजाब के चुनाव आयुक्त ने केंद्र को लिखा कि राज्य की सभी बड़ी प्रिंटिंग प्रेस पाकिस्तान के लाहौर में हैं, इसलिए मतदाता सूची की छपाई मुश्किल है। मतदाता सूची बनाना कितना कठिन था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान में सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव होने व मतदाता सूची बनाने में दो दशक से ज्यादा का समय लग गया।


निर्वाचन आयोग ने हजारों मुश्किलें पार कर देश में चुनाव संपन्न कराए। हालांकि, उस समय भी चुनाव में गड़बड़ी की शिकायतें आईं, जबकि चुनाव आयुक्त कांग्रेस सरकार के ही चुने हुए थे। नौ फरवरी, 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें चुनाव संचालन के विषय में कई शिकायतें मिली हैं। नेहरू जी ने लिखा-‘मुझे बताया गया है कि कई जगह मतदान पेटियों को बदल दिया गया या उनके साथ छेड़छाड़ की गई है।’

दरअसल, भारत में चुनाव प्रणाली की इमारत अनुभवों के आधार पर खड़ी की गई है, और हर समस्या का समाधान खोजने की कोशिश हुई है। 1957 के चुनाव में बिहार के बेगूसराय जिले के रचियाही गांव में बूथ पर कब्जा करने का पहला मामला सामने आया था। देखते-देखते यह ‘फिनोमिना’ बन गया। प्रणय रॉय व दोरब आर सोपारीवाला लिखित द वर्डिक्ट किताब में जिक्र है कि एक वक्त ऐसा भी था, जब देश के कुल बूथ के 4-5 फीसदी बूथ सत्ताधारी दल द्वारा और 2-3 फीसदी बूथ विरोधी दलों द्वारा लूट लिए जाते थे। 1990 के पूर्व तक चुनावी प्रक्रिया को सत्ताधारी दल और बाहुबली प्रभावित कर लेते थे। फिर टी एन शेषन चुनाव आयुक्त बने। उन्होंने मतदान के समय केंद्रीय बलों की तैनाती, शिकायत मिलने पर चुनाव स्थगन, वोटर आईडी की अनिवार्यता और कई चरणों में मतदान जैसे सख्त कदम उठाए। टी एन शेषन की सख्ती से नाराज लालू प्रसाद यादव ने उन्हें ‘पागल सांड’ तक कह दिया था।

साल 2000 के बाद ईवीएम के इस्तेमाल ने मतदान को और सुगम बनाया। यह अलग बात है कि विपक्ष ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा जोर-शोर से उठाता रहा है, पर 2017 में चुनाव आयोग द्वारा आयोजित ‘ईवीएम चैलेंज’ में कोई भी राजनीतिक दल मशीनों में छेड़छाड़ का दावा साबित नहीं कर पाया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वीवीपैट प्रणाली को भी व्यापक रूप से लागू किया गया। भारत में ईवीएम की उपयोगिता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि यहां करीब 97 करोड़ वोटर हैं, जबकि अमेरिका में सिर्फ 17 करोड़ और ब्रिटेन में सिर्फ पांच करोड़ ही वोटर हैं। चुनाव प्रक्रिया में भरोसा बढ़ाने के लिए ही बूथ पर सीसीटीवी कैमरा लगाने और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे उपाय किए गए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद उम्मीदवारों के लिए अपनी संपत्ति, आपराधिक मामलों और शैक्षणिक योग्यता की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य हुआ। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर निर्वाचन आयोग ने ईवीएम में आखिरी बटन के रूप में नोटा जोड़ा। महत्वपूर्ण है कि 2024 के चुनाव में करीब एक करोड़ चार लाख वोट नोटा पर पड़े। ऐसे में, अब यह बहस जोर पकड़ रही है कि मतदाता के पास ‘राइट टू रिकॉल’ होना चाहिए।

चुनाव सुधार एक सतत प्रक्रिया है और भारत ने इस मामले में लगातार प्रगति की है। इसी कारण मतदाताओं का भरोसा संसदीय चुनाव प्रणाली पर बढ़ा है। देश में हुए पहले, दूसरे और तीसरे आम चुनाव में सिर्फ 45.7, 47.7, और 55.4 फीसदी लोगों ने वोट डाले थे, जो बढ़कर 2024 के लोकसभा चुनाव तक 65.8 फीसदी तक पहुंच गए। हाल में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तो पहले चरण में 93.19 फीसदी और दूसरे चरण में 91.66 फीसदी वोट पड़े। मगर विपक्षी दलों ने मतदाताओं के निर्णय को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के अलावा निर्वाचन आयोग व सरकार की मिलीभगत का नतीजा बता दिया। निश्चित रूप से एसआईआर का क्रियान्वयन और बेहतर होना चाहिए था, पर डुप्लीकेट, मृत, घुसपैठिये और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना तथा नए पात्र मतदाताओं का नाम जोड़ना गलत कैसे हो सकता है? फिर, पश्चिम बंगाल में जिन 20 सीटों पर सबसे ज्यादा वोट कटे, उनमें तृणमूल कांग्रेस ने 13 और भाजपा ने छह सीटें जीतीं। 49 ऐसी सीटें थीं, जहां हटाए गए वोट विजयी अंतर से ज्यादा थे। इनमें भाजपा ने 26 और तृणमूल ने 21 सीटें जीतीं।

चुनाव में जीत-हार के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन हर हार के बाद चुनावी प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा करना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। यदि विपक्ष को लगता था कि बिहार या पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने पर वास्तविक मतदाता प्रभावित हुए हैं, तो उसे ऐसे प्रभावित लोगों को सामने लाकर ठोस राष्ट्रीय बहस खड़ी करनी चाहिए थी। लोकतंत्र में सवाल उठाने का अधिकार सभी को है, पर यह भी आवश्यक है कि आरोप प्रमाण आधारित हों। भारत ने 75 वर्षों में अनेक कठिन दौर पार करते हुए चुनावों को लोकतांत्रिक आस्था का बड़ा उत्सव बनाया है। इस विश्वास को बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की साझा जिम्मेदारी है। - edit@amarujala.com
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