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कोरोना संकट: नागरिक एकजुटता से ही हारेगी महामारी

Sun, 05 Apr 2020 01:45 AM IST
Harikesh Singh हरिकेश सिंह
Updated Sun, 05 Apr 2020 01:45 AM IST
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coronavirus ,covid19, The epidemic can be defeated only by solidarity
कोरोना वायरस का कहर - फोटो : PTI

आज कोरोना आपदा वैश्विक आधार ले चुकी है। दुनिया भर में मौतों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। शक्तिशाली देश इस वायरस के आगे लाचार दिखते हैं। आगे क्या होगा, यह कहना बहुत कठिन है। अभी तक न ही कोई परीक्षण सामग्री तैयार हो पाई है और न ही कोई दवा सामने आई है। उत्पादन ह्रास, सामाजिक संत्रास, और आर्थिक मंदी विभीषिका का रूप ले चुके हैं। दुनिया ने सोचा ही नहीं था कि प्रगति के नाम पर ऐसे सर्वाधिकार प्राप्त देश वैश्विक आपदा पैदा करके विश्व को प्रलय (महाविनाश) का बोध करा देंगे।


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कोरोना ने मानव के विकास की पांच मौलिक आवश्यकताओं-स्वास्थ्य, शिक्षा, सुपोषण, सम्पोषण एवं संप्रेषण को पूर्णतः ठप कर दिया है। ऐसे में, अपने देश के इस राष्ट्रीय संकट के सार्थक समाधान हेतु आपातकालीन स्थिति को स्वीकार करना ही चाहिए। इस आपातकालीन परिस्थिति से उबरने हेतु प्रत्येक नागरिक को कुछ विशेष दायित्व निभाना भी होगा।

आज के इस राष्ट्रीय आपदा के निराकरण हेतु देश की वर्तमान परिस्थिति को राष्ट्रीय आपातकालीन परिस्थिति स्वीकार करते हुए हम सभी भारतीयों को स्वतः संकल्प लेकर सजग रहना चाहिए। इतना ही नहीं, प्रत्येक नागरिक को अपना राष्ट्र धर्म निर्वहन करना होगा।

ध्यान रहे, भारत में इस विषाणु का उद्भव नहीं हुआ। यदि यहां इसका उद्भव हुआ होता, तो क्रमशः अध्ययन, सजगता और निदान पर विचार किया गया होता। जब इस विषाणु की भयावहता का एकाएक पता चला, तब तक दुनिया के समृद्ध एवं विकसित राष्ट्र भी अपनी तैयारी नहीं कर पाए थे, और अंततः अघोषित आपातकाल जैसे परिस्थिति का सामना करने हेतु लॉकडाउन के अतिरिक्त वे और कोई विकल्प नहीं ढूंढ सके। ध्यान से देखा जाए, तो भारत ने समय पर लॉकडाउन लागू करके स्थिति को तुलनात्मक रूप से संभाल लिया।

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सुदृढ अधिसंरचना के बावजूद सबसे अधिक संकट में हैं, और वहां बड़ी संख्या में लोगों की जान भी गई है। भारत की जनसंख्या को देखते हुए यहां की परिस्थिति अभी संतोषजनक है। केंद्र और राज्यों की सरकारें इस आपदा से निपटने का प्रयास कर रही हैं।  लेकिन हमारी सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि आने वाले दिनों में हम कितनी सजगता और जिम्मेदारी का परिचय देते हैं।

राष्ट्रीय आपदा इस समय आपातकालीन परिस्थिति के रूप में है। देश के भीतर पारस्परिक मत-मतांतर हो सकते हैं, पर हमारा राष्ट्र धर्म सर्वोपरि होना चाहिए। अप्रियता, अप्रमाणित आरोप, तथ्यहीन निंदा, असंतोष तथा अवसाद फैलाने वाले कोरोना से भी अधिक घातक हैं।

 अभी प्रत्येक भारतीय का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह समरसता, विवेक, कर्त्तव्य बोध, दानशीलता, अनुशासन, मितव्ययिता, पारस्परिक सहयोग, भाईचारा, सहिष्णुता आदि मूल्यों का पूर्ण मनोयोग के साथ अनुपालन करे। यह एक अवसर है, जब हम अपनी राष्ट्रीय श्रेष्ठता का बोध दुनिया को करा सकते हैं।

हममें से जिन्होंने भारतीय संविधान को आत्मार्पित और अंगीकृत किया है, वे एक बार इस वैश्विक संकट से लड़ने का संकल्प लें तथा यह सुनिश्चित करें कि हमें एक विवेकशील और कृतज्ञ नागरिक के रूप में क्या करना है और क्या नहीं करना है। यह किसी भी राष्ट्र का आपातकालीन परिस्थिति में विशेष रूप से पालन करने योग्य धर्म है। वैश्विक दृष्टिकोण से हमारा परिचय ही मात्र और मात्र मानव जाति का है। इससे थोड़ा भी कम सोचना हमारे मनुष्य होने पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

जिस देश को दुनिया को बर्बाद करके विश्व विजेता बनने की ललक लगी है, वह अधूरी सोच वाला देश है। 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' और 'वसुधैव कुटुम्बकम' का अनुशीलन करने वाला देश हजारों वर्षों तक आततायियों द्वारा किए गए घोर संकटों से केवल इसलिए उबर गया, क्योंकि उसने प्रकृति को समग्र रूप से तथा प्रकृति के सूक्षतम जीव तक को स्वत्व बोध, करुणा भाव एवं अभेद जैसे सर्वात्म भाव को ही मानव संस्कृति का मूलाधार माना।  मानवता के सामने आया यह अभूतपूर्व संकट हमसे जिम्मेदार नागरिक बनने की मांग करता है।

हमारा दायित्व है कि हम सरकार के आदेशों का पालन करें। इन आदेशों के विपरीत किसी अफवाह, भ्रम और टिप्पणी की पूर्णतः उपेक्षा करें। सर्वोदय भाव, सामाजिक सरोकार, सह अस्तित्व, परमार्थ, स्वरक्षा और सर्वरक्षा को एक समझना, भारतीय सनातनी संस्कृति की सकारात्मकता और अंततः विज्ञान की प्रासंगिकता को दिनचर्या का अनिवार्य अंग बनाकर ही कोरोना के संकट से लड़ा जा सकता है।
 

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