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बदलते अनुमान और संकेत: भू-राजनीतिक तनाव व आर्थिक अनिश्चितताएं, प्रभावित हो रही विकास की गति

Fri, 22 May 2026 07:08 AM IST
Pavan अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Pavan Updated Fri, 22 May 2026 07:08 AM IST
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Changing projections and indicator: Geopolitical tensions-economic uncertainties impacting pace of development
बदलते अनुमान और संकेत - फोटो : ANI
वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां भू-राजनीतिक तनाव व आर्थिक अनिश्चितताएं विकास की गति को प्रभावित कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर को घटाकर 6.4 फीसदी करना इसी उथल-पुथल का स्पष्ट संकेत है। राहत की बात है कि भारत अब भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है, लेकिन ताजा आकलन से यह प्रतिबिंबित तो होता ही है कि वह वैश्विक चुनौतियों से अछूता नहीं है।

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गौरतलब है कि पिछले महीने, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी वित्त वर्ष 2027 में देश की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। दरअसल, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे तौर पर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, उद्योग और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत को प्रभावित कर रही है। लगातार महंगा होता ईंधन लोगों की जेब पर बोझ ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी प्रभावित कर रहा है। जब उत्पादन लागत बढ़ती है, तब कंपनियां कीमतें बढ़ाने को मजबूर होती हैं और अंतत: इसका असर महंगाई के रूप में आम नागरिक तक पहुंचता है। चिंता का दूसरा पहलू मौद्रिक नीति से भी जुड़ा है।

आरबीआई ने आखिरी बार मौद्रिक दर में बदलाव पिछले वर्ष दिसंबर में किया था। लेकिन, अब बढ़ती महंगाई केंद्रीय बैंक के लिए भी चुनौती बन गई है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी विकास को धीमा कर सकती है, जबकि दरों को स्थिर रखने से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है। यूएन की रिपोर्ट ने इसी दुविधा की ओर संकेत किया है। हालांकि, घरेलू खपत, बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल सेवाओं का विस्तार, सेवा निर्यात क्षमता और युवा जनसंख्या जैसे कारक देश को दूसरी कई अर्थव्यवस्थाओं से ऊपर रखते हैं। पर, वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के मद्देनजर सिर्फ संरचनात्मक मजबूती पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं होगा।

नीति-नियंताओं को ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर दीर्घकालिक रणनीति को अपनाना होगा, क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू उत्पादन क्षमता और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर निवेश बढ़ाना अब आर्थिक स्थिरता की शर्त बन चुका है। यह देखते हुए कि वैश्विक संकट लंबा भी खिंच सकता है, वित्तीय अनुशासन बनाए रखना भी अहम होगा। कुल मिलाकर देखें, तो यूएन की रिपोर्ट महज विकास दर में गिरावट का अनुमान नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक वास्तविकताओं का संकेत है। ऐसे वक्त में आर्थिक दूरदर्शिता और रणनीतिक तैयारी ही आगे बढ़ने का मंत्र है।
 
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