दहेज के विरुद्ध बिहार

मनीषा सिंह Updated Tue, 07 Nov 2017 10:55 AM IST
Bihar against dowry
मनीषा सिंह
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यूनिसेफ के साथ मिलकर राज्य में बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ 'खोटा सिक्का' नाम से एक नए अभियान की शुरुआत की है, जिसके आरंभिक नतीजे मिलने लगे हैं। कुछ परिवारों ने शादी के समय या तो दहेज लेने से इन्कार किया है, तो कुछ ने दहेज लौटाने की पहल की है। एक परिवार ने हाल में शादी में मिला चार लाख रुपये का दहेज वधु पक्ष को लौटाया है। नीतीश कुमार ने शराबबंदी के खिलाफ अभियान छेड़कर जिस तरह उस पर प्रतिबंध लागू किया, उससे प्रतीत होता है कि दहेज प्रथा के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान भी जल्दी ही गति पकड़ेगा। हालांकि समाज में यह बदलाव लाना आसान नहीं है।
बाल विवाह और दहेज के खिलाफ शुरू की गई इस मुहिम के तहत खुद मुख्यमंत्री ने हाल में शादी का न्योता देने वालों से कहा कि वह उनका निमंत्रण तभी स्वीकार करेंगे, जब लोग यह सुनिश्चित करेंगे कि उन्होंने शादी में दहेज का लेन-देन नहीं किया है। उन्होंने ऐसी शादियों का बहिष्कार करने को कहा, जिनमें दहेज लिया-दिया जाता है। अगले साल पहली जनवरी को राज्य में मानव शृंखला बनाकर दहेज के खिलाफ लोगों को जागरूक भी किया जाएगा।

वैसे दहेज अपराध और दहेज हत्या के मामले में बिहार उत्तर प्रदेश से पीछे है, पर जागरूकता के प्रयासों, शिक्षा के बढ़ते स्तर और रोजगारों में लड़कियों की बढ़ती भागीदारी के बावजूद दहेज का खत्म न होना चिंता का विषय है। समाज का बड़ा हिस्सा अब भी दहेज के नाम पर महिलाओं से क्रूरता से पेश आ रहा है। भले लड़कियां पढ़ी-लिखी हों और अच्छी नौकरी में हों, पर उन्हें भी दहेज की शर्त निभानी पड़ रही है। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक नई व्यवस्था दी थी, जिसके तहत दहेज प्रताड़ना से जुड़े मामलों में पुलिस आरोपी को सीधे गिरफ्तार करने के बजाय परिवार कल्याण समिति के पास भेजेगी। जब तक उस समिति की रिपोर्ट न आ जाए, आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करने  की जरूरत महसूस हो रही है। हाल में उसने ऐसे संकेत दिए हैं कि दहेज के मामले में महिलाओं को संरक्षण की जरूरत है और जब तक समाज की सोच में तब्दीली नहीं आती, दहेज कानून में फेरबदल उचित नहीं होगा। लगातार हो रही दहेज प्रताड़ना संबंधी घटनाओं को देखने के बाद लगता है कि जिस एक कानून के तहत महिलाओं को दहेज प्रताड़ना के मामलों में न्याय मिलने की उम्मीद बंधती है, उसमें कोई बदलाव उनकी जिंदगी को और मुश्किल बनाएगा। बेशक इस कानून का दुरुपयोग हुआ होगा, पर उसे सर्वसम्मत नजीर मानना दुखद है।

बीच में कुछ अरसा ऐसा जरूर आया था, जब लगा था कि पढ़ाई-लिखाई और नौकरी के साथ शादी करने वाली लड़कियों को दहेज से मुक्ति मिल जाएगी, पर समाज में अरेंज्ड मैरिज का दौर लौटते ही दहेज का दानव फिर हावी हो गया है। 2014 में एक मैट्रीमोनियल वेबसाइट ने एक टीवी न्यूज चैनल के साथ मिलकर देशव्यापी सर्वेक्षण कराया था, जिसमें दो-तिहाई युवाओं ने कहा था कि वे शादी अपने मां-बाप की मर्जी से ही करेंगे। जब ऐसी पारंपरिक शादियां होंगी, तो दहेज भी परंपरा के तहत लिया-दिया जाएगा। अब तो अदालत भी दहेज प्रताड़ना के मामले में वर पक्ष को राहत देने में आगे आ गई है, लिहाजा दहेज से इन्कार लड़की और उसके परिवार वालों पर भारी पड़ सकता है।

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