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बड़े-बड़े दावे और नतीजा फुस्स

Mon, 19 Nov 2012 03:51 PM IST
अरुण नेहरू (वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
अरुण नेहरू (वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक) Updated Mon, 19 Nov 2012 03:51 PM IST
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big promises and result zero

अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव संपन्न हो गया और बराक ओबामा लोकप्रिय मतों में थोड़े-से अंतर से जीत गए हैं, लेकिन चुनाव संपन्न होने से पहले से ही वहां व्यवस्था को आर्थिक मुश्किलों से जूझना पड़ रहा है। यह मुद्दा वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।

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ब्रिटेन एवं यूरोप आर्थिक संकट में फंसे हैं, तो मध्य पूर्व में हिंसा जारी है। इधर ब्रिक देश कम विकास दर से जूझ रहे हैं। जाहिर है, ऐसे में हम एक मुश्किल समय की तरफ बढ़ रहे हैं। यानी 2013 हमारे लिए 2012 से भी ज्यादा खराब हो सकता है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़े हमारे लिए खतरे की घंटी है। व्यापार घाटा 21 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जो अब तक का सर्वाधिक है और स्पेक्ट्रम नीलामी का विफल होना भी शुभ संकेत नहीं है।
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हम सचाई से मुंह नहीं मोड़ सकते। यदि नकारात्मक विचार हावी रहेंगे और आधी-अधूरी सचाइयों एवं ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर मीडिया ट्रायल की छाया में शासन चलेगा, और यदि जनहित याचिकाओं, एफआईआर और आरोपपत्रों के आधार पर सार्वजनिक सेवा में लगे लोगों को आरोपी बनाकर सताया जाता रहेगा, तो तबाही आनी तय है। दुख की बात है कि हम सत्तारूढ़ दल की किसी भी सफलता पर सवाल उठाते हैं और हर उस आदमी को महात्मा का दरजा दे डालते हैं, जो उसके द्वारा दोषी साबित किया जाता है।
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बहरहाल आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जिसके कारण रोजमर्रा का कामकाज ठप हो रहा है। इसके लिए अकेले सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस नकारात्मकता से हमें निपटना होगा। इसमें उच्चतम अदालतों को निर्णायक भूमिका निभानी पड़ेगी, क्योंकि हम देख रहे हैं कि जनहित याचिकाएं अब अदालतों से बाहर निकलकर टेलीविजन चैनलों में पहुंच रही हैं। चूंकि व्यवस्था से हताश तत्व कुछ भी विध्वंसात्मक करने पर आमादा हैं, ऐसे में, केवल सत्तारूढ़ कांग्रेस को ही नहीं, बल्कि भाजपा एवं प्रमुख क्षेत्रीय दलों के लिए भी जागने और ऐसे तत्वों के खिलाफ खड़े होने का समय है।

कांग्रेस ने कैबिनेट में फेरबदल कर समस्या को अच्छी तरह सुलझा लिया है। इससे एक-दो लोग नाखुश हों, तो हों। सरकार के बाद अब संगठन में बदलाव का इंतजार है। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सफलता सरकार एवं पार्टी के बीच प्रभावी संवाद पर सर्वाधिक निर्भर करेगी और राज्यों में कांग्रेस हाई कमान की मौजूदगी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगी। हालांकि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब और ओडिशा जैसे राज्यों में कुछ समस्याएं हैं, जिनका समाधान जरूरी है।

भाजपा को अपने अध्यक्ष नितिन गडकरी से जूझना पड़ रहा है, तो यह आश्चर्यजनक नहीं है। दरअसल भाजपा को एक 'नए' अध्यक्ष की जरूरत है। अध्यक्ष के तौर पर उसे एक ऐसा व्यक्ति चाहिए, जिसे पूरा देश जानता हो और वह काम में पूरा समय दे सकता हो। इस पद के लिए उम्र और स्वास्थ्य काफी महत्वपूर्ण है। लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा कि जब पार्टी में कई प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं, तब निर्णय लेने में इतनी मुश्किल क्यों हो रही है।
मसलन, बिहार के नेताओं-रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूडी या शहनवाज हुसैन के नाम पर विचार किया जा सकता है। ये सभी केंद्र में मंत्री रह चुके हैं और अध्यक्ष पद अच्छी तरह संभाल सकते हैं। भाजपा में इस समय जैसी स्थिति है, उसे देखते हुए मौजूदा अध्यक्ष और उनके व्यावसायिक हितों से पार्टी का मुकरना स्थिति को और जटिल बनाएगा।

गडकरी का यह प्रकरण दर्शाता है कि संघ और भाजपा में कई सत्ता केंद्र हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के सक्रिय राजनीति से अलग होने के बाद से ही पार्टी में ऐसी स्थिति बनी है। जैसे-जैसे भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव की तरफ बढ़ेगी, वैसे-वैसे उसमें यह प्रवृत्ति बढ़ती जाएगी।

इस तरह के फैसले को सुदूर भविष्य के लिए टाला नहीं जा सकता, क्योंकि चुनाव में संप्रग या राजग को बैठे-बिठाए कुछ नहीं मिलने वाला; कांग्रेस एवं भाजपा में से जिसकी स्थिति मजबूत होगी, क्षेत्रीय दल उसी से गठजोड़ करेंगे। कुछ ही दिनों में संसद का शीत सत्र शुरू होने वाला है और तृणमूल कांग्रेस केंद्र सरकार को गिराने और लोकसभा का चुनाव जल्दी कराने का हरसंभव प्रयास करेगी। लेकिन यह आसान नहीं होगा, क्योंकि हर पार्टी की अपनी मजबूरियां हैं।

दूरसंचार के विकास की कहानी हमारी महान सफलता थी। लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा आंके गए 1,76,000 करोड़ के कथित घाटे ने ऐसी सिलसिलेवार घटनाओं को जन्म दिया, जिसने दुनिया में हमारी छवि को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया। सरकार ने 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से 40,000 करोड़ रुपये कमाने के दावे किए थे, लेकिन हाथ में क्या आया? क्या इसके बाद भी स्पेक्ट्रम मामले में बड़ी-बड़ी बातें करने की कोई जरूरत रह जाती है? अगर भविष्य में सरकार कोई सुधारात्मक कार्रवाई करती है, तब भी वह आश्चर्यजनक ही होगा।


सच्चाई यह है कि हम अपने पूरे ऊर्जा क्षेत्र को बरबाद करने पर तुले हैं, जिसमें पेट्रोलियम, कोयला, बिजली सभी शामिल हैं, क्योंकि सबमें निर्णय लेने की क्षमता एवं विवेक की जरूरत है। और जब सभी संदेहों के घेरे में होंगे और भविष्य में आरोपों के दायरे में आएंगे, तो भला कौन फैसला लेना चाहेगा?

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