चिंताजनक: मानसिक अवसाद, सामाजिक अकेलापन और बिखरती युवा चेतना
किसी आत्महत्या को एक ही कारण से जोड़ना न वैज्ञानिक रूप से उचित है और न सामाजिक रूप से। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, व्यक्तिगत संकट, रिश्तों में टूटन, सामाजिक अलगाव, आर्थिक कठिनाइयां, बीमारी और कई अन्य परिस्थितियां एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं।
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नोएडा की एक ऊंची इमारत से एक युवक की मौत की खबर सामने आती है। कुछ देर के लिए खबर लोगों को विचलित करती है। सोशल मीडिया पर चर्चा होती है, परिवार की तस्वीरें सामने आती हैं और फिर जीवन अपनी गति से आगे बढ़ जाता है। कुछ दिनों बाद शायद किसी को यह भी याद न रहे कि वह युवक कौन था। लेकिन क्या किसी युवा की असमय मौत को महज एक खबर मानकर आगे बढ़ जाना हमारे समाज के लिए खतरनाक सामान्यीकरण नहीं है?
यहां सावधानी भी जरूरी है। किसी आत्महत्या को एक ही कारण से जोड़ना न वैज्ञानिक रूप से उचित है और न सामाजिक रूप से। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, व्यक्तिगत संकट, रिश्तों में टूटन, सामाजिक अलगाव, आर्थिक कठिनाइयां, बीमारी और कई अन्य परिस्थितियां एक-दूसरे से एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं।
इसलिए हर घटना को उसके पूरे संदर्भ में समझना जरूरी है। फिर भी, ऐसी घटनाएं हमें समाज के भीतर मौजूद उन दरारों को देखने के लिए मजबूर करती हैं, जिनसे होकर निराशा धीरे-धीरे व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करती है।
भारत में स्थिति की गंभीरता को राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से भी समझा जा सकता है।
- वर्ष 2023 में देश में 1,71,418 आत्महत्याएं दर्ज हुईं।
- पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज कारणों में पारिवारिक समस्याएं 31.9 प्रतिशत और बीमारी 19 प्रतिशत के साथ प्रमुख श्रेणियां थीं। दिवालियापन या कर्ज से जुड़ी घटनाएं 3.8 प्रतिशत दर्ज हुईं।
इन आंकड़ों को आत्महत्या के अंतिम या एकमात्र कारण के रूप में नहीं देखा जा सकता, लेकिन वे यह जरूर बताते हैं कि संकट केवल मानसिक स्वास्थ्य का विषय नहीं है। परिवार, बीमारी, आर्थिक स्थिति, रिश्ते और सामाजिक परिस्थितियां मिलकर व्यक्ति के जीवन पर असर डालती हैं।
भारतीय समाज में परिवार लंबे समय तक संकट के समय सबसे बड़ी सुरक्षा-व्यवस्था रहा है। संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियां साथ रहती थीं। बुजुर्गों की मौजूदगी, भाई-बहनों का साथ और रोजमर्रा का संवाद व्यक्ति को यह एहसास देते थे कि वह अकेला नहीं है। आज शिक्षा और रोजगार के लिए युवाओं का दूसरे शहरों में जाना सामान्य है।
छोटे परिवार बढ़े हैं और जीवन की गति तेज हुई है, लेकिन असली समस्या परिवार के आकार से अधिक भावनात्मक उपलब्धता की है। एक घर में चार लोग साथ रह सकते हैं और फिर भी उनमें से कोई भीतर से पूरी तरह अकेला हो सकता है।
दूसरी ओर, परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहने वाला युवा नियमित संवाद और भरोसे के रिश्तों के कारण मानसिक रूप से सुरक्षित हो सकता है। आज का युवा पहले की किसी भी पीढ़ी से अधिक 'कनेक्टेड' दिखाई देता है। फोन में सैकड़ों संपर्क और सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स हैं, लेकिन डिजिटल संपर्क और मानवीय जुड़ाव एक ही चीज नहीं हैं।
सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली दूसरों की चमकदार जिंदगी भी मानसिक दबाव बढ़ा सकती है। किसी की नई नौकरी, विदेश यात्रा, महंगी कार या उपलब्धि देखकर अपने जीवन को कमतर आंकने का भाव पैदा हो सकता है। फोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट जैसी प्रवृत्तियां पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर सकती हैं। इसे अवसाद का अकेला कारण नहीं माना जा सकता, लेकिन यह मानसिक दबाव बढ़ाने वाला कारक जरूर हो सकता है।
समस्या कर्ज लेने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब व्यक्ति अपनी आय, ब्याज और भुगतान क्षमता को समझे बिना लगातार वित्तीय दायित्व लेता जाता है। इसलिए वित्तीय साक्षरता अब केवल अर्थशास्त्र का विषय नहीं, बल्कि युवाओं के लिए जरूरी जीवन-कौशल है। इसके साथ कर्ज में फंसे व्यक्ति के साथ व्यवहार भी महत्वपूर्ण है।
वसूली के नाम पर धमकी, अपमान, अनुचित समय पर लगातार फोन या परिजनों को परेशान करना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण वसूली में अनुचित और उत्पीड़नकारी व्यवहार पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं। आर्थिक संकट में फंसे व्यक्ति को समस्या से बाहर निकालने की कोशिश होनी चाहिए, उसे और गहरे मानसिक संकट में धकेलने की नहीं।
सफलता की परिभाषा
युवाओं के मानसिक दबाव का एक बड़ा कारण हमारी सफलता की परिभाषा भी है, अच्छे अंक, प्रतिष्ठित कॉलेज, बड़ा पैकेज, महंगी कार, अपना घर और ऊंचा पद। मानो जीवन का मूल्य उपलब्धियों की इसी सूची से तय होता हो। बच्चों को बचपन से सबसे आगे रहने की सीख दी जाती है, लेकिन यह कम बताया जाता है कि पीछे रह जाना जीवन का अंत नहीं है।
किसी का करियर 22 वर्ष में शुरू होता है, किसी का 30 में। कोई पहली कोशिश में सफल होता है, किसी को कई बार असफल होने के बाद रास्ता मिलता है।
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार परीक्षा में असफलता के कारण दर्ज आत्महत्याएं कुल मामलों का 1.4 प्रतिशत थीं। हर संख्या के पीछे एक परिवार और एक जीवन है। बच्चों को यह समझाना होगा कि परीक्षा के अंक उनका मूल्य तय नहीं करते, नौकरी का पैकेज उनकी पहचान नहीं है और असफलता उनका अंतिम परिचय नहीं है।
शारीरिक बीमारी होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं, लेकिन मानसिक परेशानी की बात आते ही समाज में संकोच और चुप्पी छा जाती है। अवसाद, अत्यधिक चिंता, सामाजिक रूप से कट जाना, व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव, लगातार निराशा या खुद को असहाय महसूस करना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। भारत में केंद्र सरकार की टेली-मानस सेवा 24 घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराती है। इसके लिए 14416 या 1800-891-4416 पर संपर्क किया जा सकता है।
जरूरत इस बात की है कि ऐसी सेवाओं की जानकारी स्कूलों, कॉलेजों, कार्यस्थलों और स्थानीय समुदायों तक पहुंचे और मानसिक स्वास्थ्य सामान्य बातचीत का हिस्सा बने। हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार करती है, लेकिन क्या वह उन्हें असफलता के लिए भी तैयार करती है? क्या उन्हें बताया जाता है कि रिजल्ट उम्मीद के मुताबिक न आए तो क्या करना है? क्या उन्हें यह विश्वास दिया जाता है कि मानसिक परेशानी होने पर वे माता-पिता, शिक्षक या विशेषज्ञ से मदद मांग सकते हैं?
ऊंची इमारतों से गिरती जिंदगियों को केवल उस इमारत की ऊंचाई से नहीं नापा जा सकता। उनके पीछे जमा हुए दबाव होते हैं, अकेलापन, असफलता का भय, आर्थिक चिंता, रिश्तों की टूटन, सामाजिक तुलना और वह चुप्पी जिसमें परेशानी अनकही रह जाती है। इसलिए किसी घटना के बाद केवल 'बहुत दुखद हुआ' कहना पर्याप्त नहीं। कौन चुप है?
कौन लोगों से कट गया है? कौन खुद को असफल बता रहा है? कौन आर्थिक संकट में है? कौन बाहर से सामान्य, लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहा है? हर व्यक्ति विशेषज्ञ नहीं हो सकता, लेकिन हर व्यक्ति इतना जरूर कर सकता है कि किसी परेशान इंसान को अकेला न छोड़े और जरूरत पड़ने पर उसे पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करे।
हमें अपने बच्चों और युवाओं से यह कहना होगा कि रास्ते बंद होना और जीवन खत्म होना एक ही बात नहीं है। करियर फिर बनाया जा सकता है। परीक्षा फिर दी जा सकती है। कर्ज का समाधान खोजा जा सकता है। नौकरी बदली जा सकती है। रिश्तों की चोट से उबरने में समय लग सकता है। लेकिन जीवन को दूसरा अवसर मिलना जरूरी है।
हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जहां मदद मांगना कमजोरी नहीं, संवाद करना शर्म नहीं और असफल होना जीवन का अंत नहीं माना जाए। किसी के चेहरे पर मुस्कान देखकर यह मान लेने के बजाय कि वह ठीक है, कभी पूछें, 'तुम सच में कैसे हो?
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